देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| अ० ७ ] | प्रथम स्कन्ध | १०५ |
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| त्वं शक्तिरेव जगतामखिलप्रभावा<br> त्वन्निर्मितं च सकलं खलु भावमात्रम्।<br>त्वं क्रीडसे निजविनिर्मितमोहजाले<br> नाट्ये यथा विहरते स्वकृते नटो वै॥ ४२ | अखिल प्रभाववाली आप ही जगत्की एकमात्र शक्ति हैं और आपके द्वारा रचा गया सब कुछ आपकी लीला ही है। जैसे कोई नट अपने ही द्वारा निर्मित नाट्यमें अभिनय करता है, उसी प्रकार आप भी अपने ही द्वारा निर्मित मोहजालमें नानाविध लीलाएँ करती रहती हैं॥ ४२॥ |
| विष्णुस्त्वया प्रकटितः प्रथमं युगादौ<br> दत्ता च शक्तिरमला खलु पालनाय।<br>त्रातं च सर्वमखिलं विवशीकृतोऽद्य<br> यद्रोचते तव तथाम्ब करोषि नूनम्॥ ४३ | युगके आरम्भमें आपने सर्वप्रथम विष्णुका सृजन किया, सबके पालनके लिये उन्हें निर्मल शक्ति प्रदान की और इस प्रकार समस्त जगत्की रक्षा की। उन्हीं भगवान् विष्णुको निद्राभिभूतकर आपने इस समय सुला दिया है। हे अम्ब! आपको जो उचित जान पड़ता है, आप निश्चितरूपसे वही किया करती हैं॥ ४३॥ |
| सृष्ट्वात्र मां भगवति प्रविनाशितुं चे-<br> न्नेच्छास्ति ते कुरु दयां परिहृत्य मौनम्।<br>कस्मादिमौ प्रकटितौ किल कालरूपौ<br> यद्वा भवानि हसितुं नु किमिच्छसे माम्॥ ४४ | हे भगवति! यदि आप मेरी सृष्टि करके मुझे नष्ट कर देनेकी इच्छा नहीं रखतीं तो अपना यह मौन त्यागकर मेरे ऊपर दया कीजिये। हे भवानि! आपने कालरूप इन दोनों दानवोंको किसलिये उत्पन्न किया है? कहीं आपने मेरे उपहासके लिये तो ऐसा नहीं किया है?॥ ४४॥ |
| ज्ञातं मया तव विचेष्टितमद्भुतं वै<br> कृत्वाखिलं जगदिदं रमसे स्वतन्त्रा।<br>लीनं करोषि सकलं किल मां तथैव<br> हन्तुं त्वमिच्छसि भवानि किमत्र चित्रम्॥ ४५ | हे भवानि! अब मुझे आपके अद्भुत चरित्रका ज्ञान हो गया। समस्त जगत्की रचना करके आप उसीमें स्वेच्छासे विहार करती हैं और पुनः उसे अपनेमें जैसे समाहित कर लेती हैं, उसी प्रकार मुझे नष्ट कर देना चाहती हैं तो इसमें कोई विचित्र बात नहीं है॥ ४५॥ |
| कामं कुरुष्व वधमद्य ममैव मात-<br> र्दुःखं न मे मरणजं जगदम्बिकेऽत्र।<br>कर्ता त्वयैव विहितः प्रथमं स चायं<br> दैत्याहतोऽथ मृत इत्ययशो गरिष्ठम्॥ ४६ | हे माता! यदि आप यही चाहती हैं तो मेरा वध कर दीजिये। हे जगदम्बे! मुझे मरणजनित दुःखकी लेशमात्र भी चिन्ता नहीं है। हाँ, आपको यह महान् कलंक अवश्य लगेगा कि आपने जिसे सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता बनाया, उसे दैत्यने मार डाला॥ ४६॥ |
| उत्तिष्ठ देवि कुरु रूपमिहाद्भुतं त्वं<br> मां वा त्विमौ जहि यथेच्छसि बाललीले।<br>नो चेत्प्रबोधय हरिं निहनेदिमौ य-<br> स्त्वत्साध्यमेतदखिलं किल कार्यजातम्॥ ४७ | हे देवि! अब आप उठिये और अपना अद्भुत रूप धारण कीजिये। हे बाललीलाकारिणि! आप अपने इच्छानुरूप चाहे मुझे मार दें अथवा इन दोनों दैत्योंको मार दें या तो भगवान् विष्णुको जगा दें, जिससे वे इन दोनोंका वध कर दें। यह सारा काम करनेमें आप ही समर्थ हैं॥ ४७॥ |
| १०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| सूत उवाच | |
|---|---|
| एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा।<br>निःसृत्य हरिदेहात्तु संस्थिता पार्श्वतस्तदा॥ ४८ | **सूतजी बोले—**ब्रह्माजीद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर विष्णुके शरीरसे निकलकर तामसीदेवी उनके समीप खड़ी हो गयीं॥ ४८॥ |
| त्यक्त्वाङ्गानि च सर्वाणि विष्णोरतुलतेजसः।<br>निर्गता योगनिद्रा सा नाशाय च तयोस्तदा॥ ४९ | तदनन्तर अतुलित तेजवाले विष्णुके समस्त अंगोंको छोड़कर योगनिद्रा उन दोनोंका संहार करनेके लिये बाहर निकल आयीं॥ ४९॥ |
| विस्पन्दितशरीरोऽसौ यदा जातो जनार्दनः।<br>धाता परमिकां प्राप्तो मुदं दृष्ट्वा हरिं ततः॥ ५० | [योगमायाके प्रभावसे मुक्त हुए] वे जनार्दन जब चेतनायुक्त शरीरवाले हुए तब उन विष्णुको देखकर ब्रह्माजीको परम प्रसन्नता हुई॥ ५०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे<br>विष्णुप्रबोधो नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
अथाष्टमोऽध्यायः
भगवान् विष्णु योगमायाके अधीन क्यों हो गये—ऋषियोंके इस प्रश्नके उत्तरमें सूतजीद्वारा उन्हें आद्याशक्ति भगवतीकी महिमा सुनाना
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| सन्देहोऽत्र महाभाग कथायां तु महाद्भुतः।<br>वेदशास्त्रपुराणैश्च निश्चितं तु सदा बुधैः॥ १<br>ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रयो देवाः सनातनाः।<br>नातः परतरं किञ्चिद् ब्रह्माण्डेऽस्मिन्महामते॥ २ | हे महाभाग! हमें इस कथानकमें महान् अद्भुत संशय है। हे महामते! वेदों, शास्त्रों, पुराणों तथा बुद्धिमान् लोगोंकी सदासे यह अवधारणा रही है कि ब्रह्मा, विष्णु तथा शम्भु—ये तीनों देवता सनातन हैं और इस ब्रह्माण्डमें इनसे बढ़कर अन्य कोई नहीं है॥ १-२॥ |
| ब्रह्मा सृजति लोकान्वै विष्णुः पात्यखिलं जगत्।<br>रुद्रः संहरते काले त्रय एतेऽत्र कारणम्॥ ३ | ब्रह्मा जगत्का सृजन करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शंकर प्रलयकालमें संहार करते हैं। ये तीनों ही इसमें कारण हैं॥ ३॥ |
| एका मूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>रजःसत्त्वतमोभिश्च संयुताः कार्यकारकाः॥ ४ | ब्रह्मा, विष्णु और महेश—ये तीनों देवता एक ही मूर्तिके तीन स्वरूप हैं। ये लोग क्रमशः रज, सत्त्व और तम-गुणोंसे युक्त होकर अपना-अपना कार्य करते हैं॥ ४॥ |
| तेषां मध्ये हरिः श्रेष्ठो माधवः पुरुषोत्तमः।<br>आदिदेवो जगन्नाथः समर्थः सर्वकर्मसु॥ ५<br>नान्यः कोऽपि समर्थोऽस्ति विष्णोरतुलतेजसः।<br>स कथं स्वापितः स्वामी विवशो योगमायया॥ ६ | उन तीनोंमें माधव, पुरुषोत्तम, आदिदेव जगन्नाथ श्रीहरि श्रेष्ठ हैं और वे सभी कार्य सम्पादित करनेमें समर्थ हैं। अनुपम तेजवाले विष्णुसे बढ़कर सर्वसमर्थ अन्य कोई भी नहीं है। उन जगत्पति विष्णुको योगमायाने विवश करके भला कैसे सुला दिया?॥ ५-६॥ |
| क्व गतं तस्य विज्ञानं जीवतश्चेष्टितं कुतः।<br>सन्देहोऽयं महाभाग कथयस्व यथाशुभम्॥ ७ | उस समय उन विष्णुकी चेतना कहाँ चली गयी और उनके जीवनकी चेष्टा कहाँ लुप्त हो गयी? हे महाभाग! यह महान् सन्देह उपस्थित है; आप इस विषयमें यथोचित बतानेकी कृपा करें॥ ७॥ |
| अ० ८ ] | प्रथम स्कन्ध | १०७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| का सा शक्तिः पुरा प्रोक्ता यया विष्णुर्जितः प्रभुः।<br>कुतो जाता कथं शक्ता का शक्तिर्वद सुव्रत॥ ८ | जिस शक्तिके विषयमें आप पहले बता चुके हैं कि उसने भगवान् विष्णुको भी पराभूत कर दिया था, वह कौन-सी शक्ति है? वह शक्ति कहाँसे उद्भूत हुई, शक्तिसम्पन्न कैसे हुई तथा उसका स्वरूप क्या है? हे सुव्रत! यह सब हमें स्पष्टरूपसे बतलाइये॥ ८॥ |
| यस्तु सर्वेश्वरो विष्णुर्वासुदेवो जगद्गुरुः।<br>परमात्मा परानन्दः सच्चिदानन्दविग्रहः॥ ९<br><br>सर्वकृत्सर्वभृत्स्रष्टा विरजः सर्वगः शुचिः।<br>स कथं निद्रया नीतः परतन्त्रः परात्परः॥ १० | जो विष्णु हैं वे तो सबके ईश्वर, वासुदेव, जगत्के गुरु, परमात्मा, परम आनन्दस्वरूप तथा सच्चिदानन्दकी साक्षात् मूर्ति हैं; सब कुछ करनेमें समर्थ, सबका पालन करनेवाले, सभी चराचरका सृजन करनेवाले, रजोगुणसे रहित, सर्वव्यापी और पवित्र हैं। वे परात्पर विष्णु निद्राकी परतन्त्रतामें कैसे आबद्ध हो गये?॥ ९-१०॥ |
| एतदाश्चर्यभूतो हि सन्देहो नः परन्तप।<br>छिन्धि ज्ञानासिना सूत व्यासशिष्य महामते॥ ११ | हे परन्तप! हमें इस प्रकारका आश्चर्यजनक सन्देह है। हे सूत! हे व्यासशिष्य! हे महामते! आप अपने ज्ञानरूपी खड्गसे हमारे इस सन्देहको नष्ट कर दीजिये॥ ११॥ |
| सूत उवाच<br>कः सन्देहं भिनत्त्येनं त्रैलोक्ये सचराचरे।<br>मुह्यन्ति मुनयः कामं ब्रह्मपुत्राः सनातनाः॥ १२<br><br>नारदः कपिलश्चैव प्रश्नेऽस्मिन्मुनिसत्तमाः।<br>किं ब्रवीमि महाभागा दुर्घटेऽस्मिन्विमर्शने॥ १३ | सूतजी बोले— हे मुनिजन! इस चराचर जगत्में कौन ऐसा है, जो इस शंकाका समाधान कर सके, जबकि ब्रह्माके पुत्र सनकादि मुनि तथा नारद, कपिल आदि भी इस विषयमें मोहित हो जाते हैं? हे मुनिश्रेष्ठ! हे महाभाग! तब इस जटिल समस्याके समाधानमें मैं क्या कहूँ?॥ १२-१३॥ |
| देवेषु विष्णुः कथितः सर्वगः सर्वपालकः।<br>यतो विराडिदं सर्वमुत्पन्नं सचराचरम्॥ १४ | देवताओंमें भगवान् विष्णु ही सर्वव्यापी एवं सभी भूतोंके रक्षक कहे गये हैं। उन्हींसे इस चराचर समस्त विराट् संसारकी सृष्टि हुई है॥ १४॥ |
| ते सर्वे समुपासन्ते नत्वा देवं परात्परम्।<br>नारायणं हृषीकेशं वासुदेवं जनार्दनम्॥ १५ | वे सभी देवता परात्पर परमात्माको नमस्कार करके नारायण, हृषीकेश, वासुदेव, जनार्दनरूपमें उनकी उपासना करते हैं॥ १५॥ |
| तथा केचिन्महादेवं शङ्करं शशिशेखरम्।<br>त्रिनेत्रं पञ्चवक्त्रं च शूलपाणिं वृषध्वजम्॥ १६ | कुछ लोग महादेव, शंकर, शशिशेखर, त्रिनेत्र, पंचवक्त्र, शूलपाणि और वृषभध्वजके रूपमें उन्हींकी उपासना करते हैं॥ १६॥ |
| तथा वेदेषु सर्वेषु गीतं नाम्ना त्रियम्बकम्।<br>कपर्द्दिनं पञ्चवक्त्रं गौरीदेहार्धधारिणम्॥ १७<br><br>कैलासवासनिरतं सर्वशक्तिसमन्वितम्।<br>भूतवृन्दयुतं देवं दक्षयज्ञविघातकम्॥ १८ | सभी वेदोंमें भी त्रियम्बक (त्र्यम्बक), कपर्दी, पंचवक्त्र, गौरीदेहार्धधारी, कैलासवासी, सर्वशक्ति-समन्वित, भूतगणोंसे सेवित एवं दक्षयज्ञविध्वंसक आदि नामोंसे उनका गुणगान किया गया है॥ १७-१८॥ |
| १०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| तथा सूर्य वेदविदः सायंप्रातर्दिने दिने।<br>मध्याह्ने तु महाभागाः स्तुवन्ति विविधैः स्तवैः॥ १९ | हे महाभागो! वैदिक विद्वान् लोग सूर्य आदि नामोंसे भी नित्य प्रातः, सायं तथा मध्याह्नकालमें सन्ध्या करते समय विविध प्रकारकी स्तुतियोंसे उन्हींकी प्रार्थना करते हैं॥ १९॥ |
| तथा वेदेषु सर्वेषु सूर्योपासनमुत्तमम्।<br>परमात्मेति विख्यातं नाम तस्य महात्मनः॥ २०<br><br>अग्निः सर्वत्र वेदेषु संस्तुतो वेदवित्तमैः।<br>इन्द्रश्चापि त्रिलोकेशो वरुणश्च तथापरः॥ २१ | सभी वेदोंमें सूर्योपासना श्रेष्ठ कही गयी है तथा उन महात्माका नाम 'परमात्मा' कहा गया है। वेदोंमें सर्वत्र वेदज्ञोंद्वारा अग्निदेवकी भी स्तुति की गयी है। वहाँ त्रिलोकेश इन्द्र, वरुण तथा अन्यान्य देवताओंकी भी स्तुति की गयी है॥ २०-२१॥ |
| यथा गङ्गा प्रवाहैश्च बहुभिः परिवर्तते।<br>तथैव सर्वदेवेषु विष्णुः प्रोक्तो महर्षिभिः॥ २२ | जिस प्रकार गंगा अनेक धाराओंमें विद्यमान रहकर प्रवाहित होती हैं, उसी प्रकार महर्षियोंद्वारा भगवान् विष्णु सभी देवताओंमें विद्यमान बताये गये हैं॥ २२॥ |
| त्रीण्येव हि प्रमाणानि पठितानि सुपण्डितैः।<br>प्रत्यक्षं चानुमानं च शाब्दं चैव तृतीयकम्॥ २३<br><br>चत्वार्येवेतरे प्राहुरुपमानयुतानि च।<br>अर्थापत्तियुतान्यन्ये पञ्च प्राहुर्महाधियः॥ २४ | मनीषी विद्वानोंने तीन प्रकारके मुख्य प्रमाण बताये हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान और तीसरा शब्दप्रमाण। अन्य (न्याय)-के पण्डित चार प्रमाण मानते हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान एवं शब्दप्रमाण। परंतु अन्य (मीमांसाके) विद्वान् लोग अर्थापत्तिको लेकर पाँच प्रमाण मानते हैं॥ २३-२४॥ |
| सप्त पौराणिकाश्चैव प्रवदन्ति मनीषिणः।<br>एतैः प्रमाणैर्दुर्ज्ञेयं यद् ब्रह्म परमं च तत्॥ २५ | पौराणिक विद्वान् सात प्रमाण बताते हैं—इन प्रमाणोंसे भी जो दुर्ज्ञेय है, वह है—परब्रह्म॥ २५॥ |
| वितर्कश्चात्र कर्तव्यो बुद्ध्या चैवागमेन च।<br>निश्चयात्मिकया युक्त्या विचार्य च पुनः पुनः॥ २६<br><br>प्रत्यक्षतस्तु विज्ञानं चिन्त्यं मतिमता सदा।<br>दृष्टान्तेनापि सततं शिष्टमार्गानुसारिणा॥ २७ | इसलिये इस विषयमें बुद्धि, शास्त्र एवं निश्चयात्मिका युक्तिसे बार-बार विचार करके अनुमान करना चाहिये। साथ ही सन्मार्गका अनुसरण करनेवाले दृष्टान्तद्वारा इस प्रत्यक्ष विज्ञानका चिन्तन बुद्धिमान् मनुष्यको सर्वदा करते रहना चाहिये॥ २६-२७॥ |
| विद्वांसोऽपि वदन्त्येवं पुराणैः परिगीयते।<br>द्रुहिणे सृष्टिशक्तिश्च हरौ पालनशक्तिता॥ २८<br><br>हरे संहारशक्तिश्च सूर्ये शक्तिः प्रकाशिका।<br>धराधारणशक्तिश्च शेषे कूर्मे तथैव च॥ २९ | प्रायः सभी पुराण तथा विद्वान् ऐसा कहते हैं कि ब्रह्मामें सृष्टि करनेकी शक्ति, विष्णुमें पालन करनेकी शक्ति, शिवमें संहार करनेकी शक्ति, सूर्यमें प्रकाश करनेकी शक्ति तथा शेष और कच्छपमें पृथ्वीको धारण करनेकी शक्ति स्वभावतः विद्यमान रहती है॥ २८-२९॥ |
| साद्या शक्तिः परिणता सर्वस्मिन्त्या प्रतिष्ठिता।<br>दाहशक्तिस्तथा वह्नौ समीरे प्रेरणात्मिका॥ ३० | इस प्रकार एकमात्र वे आद्याशक्ति ही स्वरूपभेदसे सभीमें व्याप्त रहती हैं। वे ही अग्निमें दाहकत्व शक्ति तथा वायुमें संचारशक्ति हैं॥ ३०॥ |
| शिवोऽपि शवतां याति कुण्डलिन्या विवर्जितः।<br>शक्तिहीनस्तु यः कश्चिदसमर्थः स्मृतो बुधैः॥ ३१ | कुण्डलिनी शक्तिके बिना शिव भी 'शव' बन जाते हैं। विद्वान् लोग शक्तिहीन जीवको निर्जीव एवं असमर्थ कहते हैं॥ ३१॥ |
| अ० ८ ] | प्रथम स्कन्ध | १०९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं सर्वत्र भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं ब्रह्माण्डेऽस्मिन्महातपाः॥ ३२<br>शक्तिहीनं तु निन्द्यं स्याद्वस्तुमात्रं चराचरम्।<br>अशक्तः शत्रुविजये गमने भोजने तथा॥ ३३ | अतएव हे मुनिजनो! ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सभी पदार्थ इस संसारमें शक्तिके बिना सर्वथा हेय हैं; क्योंकि स्थावर-जंगम सभी जीवोंमें वह शक्ति ही काम करती है। यहाँतक कि शक्तिहीन पुरुष शत्रुपर विजयी होने, चलने-फिरने तथा भोजन करनेमें भी सर्वथा असमर्थ रहता है॥ ३२-३३॥ |
| एवं सर्वगता शक्तिः सा ब्रह्मेति विविच्यते।<br>सोपास्या विविधैः सम्यग्विचार्या सुधिया सदा॥ ३४ | वह सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली आदिशक्ति ही 'ब्रह्म' कहलाती है। बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि वह अनेक प्रकारके यत्नोंद्वारा सम्यक् रूपसे उसकी उपासना करे तथा उसका चिन्तन करे॥ ३४॥ |
| विष्णौ च सात्त्विकी शक्तिस्तया हीनोऽप्यकर्मकृत्।<br>द्रुहिणे राजसी शक्तिर्यया हीनो ह्यसृष्टिकृत्॥ ३५<br>शिवे च तामसी शक्तिस्तया संहारकारकः।<br>इत्यूह्यं मनसा सर्वं विचार्य च पुनः पुनः॥ ३६ | भगवान् विष्णुमें सात्त्विकी शक्ति रहती है, जिसके बिना वे अकर्मण्य हो जाते हैं। ब्रह्मामें राजसी शक्ति है, वे भी शक्तिहीन होकर सृष्टिकार्य नहीं कर सकते और शिवमें तामसी शक्ति रहती है, जिसके बलपर वे संहार-कृत्य सम्पादित करते हैं। इस विषयपर मनसे बार-बार विचार करके तर्क-वितर्क करते रहना चाहिये॥ ३५-३६॥ |
| शक्तिः करोति ब्रह्माण्डं सा वै पालयतेऽखिलम्।<br>इच्छया संहरत्येषा जगदेतच्चराचरम्॥ ३७ | शक्ति ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी रचना करती है, सबका पालन करती है और इच्छानुसार इस चराचर जगत्का संहार करती है॥ ३७॥ |
| न विष्णुर्न हरः शक्रो न ब्रह्मा न च पावकः।<br>न सूर्यो वरुणः शक्तः स्वे स्वे कार्ये कथञ्चन॥ ३८ | उसके बिना विष्णु, शिव, इन्द्र, ब्रह्मा, अग्नि, सूर्य और वरुण कोई भी अपने-अपने कार्यमें किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हो सकते॥ ३८॥ |
| तया युक्ता हि कुर्वन्ति स्वानि कार्याणि ते सुराः।<br>सैव कारणकार्येषु प्रत्यक्षेणावगम्यते॥ ३९ | वे देवगण शक्तियुक्त होनेपर ही अपने-अपने कार्योंको सम्पादित करते रहते हैं। प्रत्येक कार्य-कारणमें वही शक्ति प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है॥ ३९॥ |
| सगुणा निर्गुणा सा तु द्विधा प्रोक्ता मनीषिभिः।<br>सगुणा रागिभिः सेव्या निर्गुणा तु विरागिभिः॥ ४० | मनीषी पुरुषोंने शक्तिको सगुणा और निर्गुणा भेदसे दो प्रकारका बताया है। सगुणा शक्तिकी उपासना आसक्तजनों और निर्गुणा शक्तिकी उपासना अनासक्तजनोंको करनी चाहिये॥ ४०॥ |
| धर्मार्थकाममोक्षाणां स्वामिनी सा निराकुला।<br>ददाति वाञ्छितान्कामान्पूजिता विधिपूर्वकम्॥ ४१ | धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पदार्थोंकी स्वामिनी वे ही निर्विकार शक्ति हैं। विधिवत् पूजा करनेसे वे सब प्रकारके मनोरथ पूर्ण करती हैं॥ ४१॥ |
| न जानन्ति जना मूढास्तां सदा माययावृताः।<br>जानन्तोऽपि नराः केचिन्मोहयन्ति परानपि॥ ४२<br>पण्डिताः स्वोदरार्थं वै पाखण्डानि पृथक्पृथक्।<br>प्रवर्तयन्ति कलिना प्रेरिता मन्दचेतसः॥ ४३ | सदा मायासे घिरे हुए अज्ञानी लोग उस महाशक्तिको जान नहीं पाते। यहाँतक कि कुछ विद्वान् पुरुष उन्हें जानते हुए भी दूसरोंको भ्रममें डालते हैं। कुछ मन्दबुद्धि पण्डित अपने उदरकी पूर्तिके लिये कलिसे प्रेरित होकर अनेक प्रकारके पाखण्ड करते हैं॥ ४२-४३॥ |
| ११० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
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| कलावस्मिन्महाभागा नानाभेदसमुत्थिताः।<br>नान्ये युगे तथा धर्मा वेदबाह्याः कथञ्चन॥ ४४ | हे महाभागो! इस कलिमें बहुत प्रकारके अवैदिक तथा भेदमूलक धर्म उत्पन्न होते हैं; दूसरे युगोंमें नहीं होते॥ ४४॥ |
|---|---|
| विष्णुश्चरत्यसावुग्रं तपो वर्षाण्यनेकंशः।<br>ब्रह्मा हरस्त्रयो देवा ध्यायन्तः कमपि ध्रुवम्॥ ४५ | स्वयं भगवान् विष्णु भी अनेक वर्षोंतक कठोर तप करते हैं और ब्रह्मा तथा शिवजी भी ऐसा ही करते हैं। ये तीनों देवता निश्चित ही किसीका ध्यान करते हुए कठिन तपस्या करते रहते हैं॥ ४५॥ |
| कामयानाः सदा कामं ते त्रयः सर्वदैव हि।<br>यजन्ति यज्ञान्विविधान्ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः॥ ४६ | इसी प्रकार अपनी इच्छाओंकी पूर्तिके लिये ब्रह्मा, विष्णु, महेश—ये तीनों ही देवता अनेक प्रकारके यज्ञ सदा करते हैं। वे उन पराशक्ति, ब्रह्म नामवाली परमात्मिका देवीको नित्य एवं सनातन मानकर सर्वदा मनसे उन्हींका ध्यान करते हैं॥ ४६-४७॥ |
| ते वै शक्तिं परां देवीं ब्रह्माख्यां परमात्मिकाम्।<br>ध्यायन्ति मनसा नित्यं नित्यां मत्वा सनातनीम्॥ ४७ | |
| तस्माच्छक्तिः सदा सेव्या विद्वद्भिः कृतनिश्चयैः।<br>निश्चयः सर्वशास्त्राणां ज्ञातव्यो मुनिसत्तमाः॥ ४८ | हे मुनिश्रेष्ठ! सब शास्त्रोंका यही निश्चय जानना चाहिये कि दृढनिश्चयी विद्वानोंके द्वारा वे आदिशक्ति ही सदा सेवनीय हैं॥ ४८॥ |
| कृष्णाच्छ्रुतं मया चैतत्तेन ज्ञातं तु नारदात्।<br>पितुः सकाशात्तेनापि ब्रह्मणा विष्णुवाक्यतः॥ ४९ | यह गुप्त रहस्य मैंने कृष्णद्वैपायनसे सुना है जिसे उन्होंने नारदजीसे, नारदजीने अपने पिता ब्रह्माजीसे और ब्रह्माजीने भी भगवान् विष्णुके मुखसे सुना था॥ ४९॥ |
| न श्रोतव्यं न मन्तव्यमन्येषां वचनं बुधैः।<br>शक्तिरेव सदा सेव्या विद्वद्भिः कृतनिश्चयैः॥ ५० | इसलिये विद्वान् पुरुषोंको चाहिये कि वे न तो किसी अन्यकी बात सुनें और न मानें तथा दृढप्रतिज्ञ होकर सर्वदा शक्तिकी ही उपासना करें॥ ५०॥ |
| प्रत्यक्षमपि द्रष्टव्यमशक्तस्य विचेष्टितम्।<br>अतः सर्वेषु भूतेषु ज्ञातव्या शक्तिरेव हि॥ ५१ | शक्तिहीन असमर्थ पुरुषका व्यवहार तो प्रत्यक्ष ही देखा जाता है [कि वह कुछ कर नहीं पाता]। इसलिये सर्वव्यापिनी आदिशक्ति जगज्जननी भगवतीको ही जाननेका प्रयत्न करना चाहिये॥ ५१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां प्रथमस्कन्धे
आराध्यनिर्णयवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
$\sim\sim\circ\sim\sim$
अथ नवमोऽध्यायः
भगवान् विष्णुका मधु-कैटभसे पाँच हजार वर्षोंतक युद्ध करना, विष्णुद्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीद्वारा मोहित मधु-कैटभका विष्णुद्वारा वध
| सूत उवाच<br>यदा विनिर्गता निद्रा देहातस्य जगद्गुरोः।<br>नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ॥ १ | सूतजी बोले—[हे मुनिजनो!] जब जगद्गुरु भगवान् विष्णुके शरीरसे निद्रादेवी निकलीं; उस समय उनके नेत्र, मुख, नासिका, भुजा, हृदय तथा वक्षःस्थलसे |
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| अ० ९ ] | प्रथम स्कन्ध | १११ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निःसृत्य गगने तस्थौ तामसी शक्तिरुत्तमा।<br>उदतिष्ठज्जगन्नाथो जृम्भमाणः पुनः पुनः॥ २ | निकलकर वे श्रेष्ठ तामसी शक्ति आकाशमें स्थित हो गयीं, तब भगवान् विष्णु भी बार-बार जम्हाई लेते हुए उठ खड़े हुए॥ १-२॥ |
| तदापश्यत् स्थितं तत्र भयत्रस्तं प्रजापतिम्।<br>उवाच च महातेजा मेघगम्भीरया गिरा॥ ३ | तब वहाँ भगवान् विष्णुने भयसे काँपते हुए ब्रह्माको देखा और उन महातेजस्वी विष्णुने मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा॥ ३॥ |
| विष्णुरुवाच<br>किमागतोऽसि भगवंस्तपस्त्यक्त्वात्र पद्मज।<br>कस्माच्चिन्तातुरोऽसि त्वं भयाकुलितमानसः॥ ४ | विष्णु बोले—हे कमलोद्भव ब्रह्माजी! आप तपस्या छोड़कर यहाँ कैसे आ गये हैं? आप इतने चिन्तित एवं भयभीत क्यों हो रहे हैं?॥ ४॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>त्वत्कर्णमलजौ देव दैत्यौ च मधुकैटभौ।<br>हन्तुं मां समुपायातौ घोररूपौ महाबलौ॥ ५<br><br>भयात्तयोः समायातस्त्वत्समीपं जगत्पते।<br>त्राहि मां वासुदेवाद्य भयत्रस्तं विचेतनम्॥ ६ | ब्रह्माजी बोले—हे देव! आपके कानोंके मैलसे दो महादानव पैदा हो गये हैं, जो महाभयंकर एवं महाबली हैं, जिनका नाम मधु और कैटभ है। उन्हीं दोनोंके भयसे मैं आपके पास आया हूँ। हे जगत्पते! हे वासुदेव! आप मुझ भयभीत तथा किंकर्तव्यविमूढ़की रक्षा कीजिये॥ ५-६॥ |
| विष्णुरुवाच<br>तिष्ठाद्य निर्भयो जातस्तौ हनिष्याम्यहं किल।<br>युद्धायाजग्मतुर्मूढौ मत्समीपं गतायुषौ॥ ७ | विष्णु बोले—ब्रह्मन्! अब आप निर्भय हो जाइये। उनकी मृत्यु निकट है, इसीलिये वे यहाँ युद्ध करनेके लिये आयेंगे और मैं उन दोनों दैत्योंका वध करूँगा॥ ७॥ |
| सूत उवाच<br>एवं वदति देवेशे दानवौ तौ महाबलौ।<br>विचिन्वानावजं चोभौ संप्राप्तौ मदगर्वितौ॥ ८<br><br>निराधारौ जले तत्र संस्थितौ विगतज्वरौ।<br>तावूचतुर्मदोन्मत्तौ ब्रह्माणं मुनिसत्तमाः॥ ९<br><br>पलायित्वा समायातः सन्निधावस्य किं ततः।<br>युद्धं कुरु हनिष्यावः पश्यतोऽस्यैव सन्निधौ॥ १०<br><br>पश्चादेनं हनिष्यावः सर्पभोगोपरिस्थितम्।<br>त्वमद्य कुरु संग्रामं दासोऽस्मीति च वा वद॥ ११ | सूतजी बोले—इस प्रकार भगवान् विष्णु ब्रह्मासे कह ही रहे थे कि वे दोनों मतवाले महाबली दैत्य ब्रह्माजीको ढूँढ़ते हुए वहाँ आ पहुँचे॥ ८॥<br><br>हे श्रेष्ठ मुनियो! वे दैत्य उस महासागरके जलमें बिना किसी अवलम्बके निश्चिन्त होकर खड़े थे। उन अहंकारी राक्षसोंने ब्रह्माजीसे कहा—'तुम भागकर इनके पास क्यों आये? अब तुम युद्ध करो। इनके देखते-देखते ही हमलोग तुम्हें मार डालेंगे'॥ ९-१०॥<br><br>तत्पश्चात् शेषशय्यापर सोनेवाले इस पुरुषको भी मार डालेंगे। इसलिये तुम हम दोनों भाइयोंसे या तो युद्ध करो अथवा यह कहो कि 'मैं तुम्हारा सेवक हूँ'॥ ११॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णुस्तावुवाच जनार्दनः।<br>कुरुतं समरं कामं मया दानवपुङ्गवौ॥ १२<br><br>हरिष्यामि मदं चाहं युवयोर्मत्तयोः किल।<br>आगच्छतं महाभागौ श्रद्धा चेद्वां महाबलौ॥ १३ | सूतजी बोले—उन दैत्योंका वचन सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—अरे दानवेन्द्रो! तुम दोनों मेरे साथ यथेच्छ युद्ध करो। मैं तुम दोनों दैत्योंका घमण्ड चूर-चूर कर डालूँगा। हे महाभागो! तुम दोनोंकी लड़नेकी इच्छा है और अपनेको महायोद्धा समझ रहे हो तो आ जाओ॥ १२-१३॥ |
११२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९
| सूत उवाच | |
|---|---|
| श्रुत्वा तद्वचनं चोभौ क्रोधव्याकुललोचनौ।<br>निराधारौ जलस्थौ च युद्धोद्युक्तौ बभूवतुः॥ १४ | सूतजी बोले— भगवान्का यह वचन सुनते ही उन दैत्योंके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और जलमें खड़े निराधार वे दोनों भयंकर दानव युद्ध करनेको तैयार हो गये॥ १४॥ |
| मधुश्च कुपितस्तत्र हरिणा सह संयुगम्।<br>कर्तुं प्रचलितस्तूर्णं कैटभस्तु तथा स्थितः॥ १५ | इनमें मधुदैत्य कुपित होकर विष्णुसे युद्ध करनेके लिये शीघ्र ही चल पड़ा और कैटभ वहीं खड़ा रहा॥ १५॥ |
| बाहुयुद्धं तयोरासीन्मल्लयोरिव मत्तयोः।<br>श्रान्ते मधौ कैटभस्तु संग्राममकरोत्तदा॥ १६ | दो मतवाले वीरोंके समान मधु और विष्णुमें बाहुयुद्ध होने लगा। जब मधु थक गया तब कैटभ उनसे लड़ने लगा॥ १६॥ |
| पुनर्मधुः कैटभश्च युयुधाते पुनः पुनः।<br>बाहुयुद्धेन रागान्धौ विष्णुना प्रभविष्णुना॥ १७ | इस प्रकार क्रमशः कुपित एवं मदान्ध दोनों दैत्य परम प्रतापी भगवान् विष्णुके साथ बारी-बारीसे बाहुयुद्ध करते रहे॥ १७॥ |
| प्रेक्षकस्तु तदा ब्रह्मा देवी चैवान्तरिक्षगा।<br>न मम्लतुस्तदा तौ तु विष्णुस्तु ग्लानिमाप्तवान्॥ १८ | उस समय वहाँ उस युद्धके द्रष्टा ब्रह्मा और आकाशमें स्थित आदिशक्ति देवी थीं। बहुत दिनोंतक युद्ध करते-करते भी वे दैत्य नहीं थके तब भगवान् विष्णुको ग्लानि होने लगी। इस प्रकार जब युद्ध करते हुए पाँच हजार वर्ष बीत गये तब भगवान् विष्णु उन दैत्योंकी मृत्युका उपाय सोचने लगे॥ १८-१९॥ |
| पञ्चवर्षसहस्राणि यदा जातानि युद्ध्यता।<br>हरिणा चिन्तितं तत्र कारणं मरणे तयोः॥ १९ | |
| पञ्चवर्षसहस्राणि मया युद्धं कृतं किल।<br>न श्रान्तौ दानवौ घोरौ श्रान्तोऽहं चैतदद्भुतम्॥ २० | उनके विचारमें आया कि मैंने पाँच हजार वर्षतक इनके साथ युद्ध किया, किंतु ये भयानक दानव थके नहीं और मैं थक गया; यह बड़े आश्चर्यकी बात है॥ २०॥ |
| क्व गतं मे बलं शौर्यं कस्माच्चेमावनामयौ।<br>किमत्र कारणं चिन्त्यं विचार्य मनसा त्विह॥ २१ | मेरा वह पराक्रम और बल कहाँ चला गया? ये दोनों मुझसे लड़ते हुए भी स्वस्थ हैं। इसका कारण क्या है? अब मुझे अच्छी तरह विचार करना चाहिये॥ २१॥ |
| इति चिन्तापरं दृष्ट्वा हरिं हर्षपरावुभौ।<br>ऊचतुस्तौ मदोन्मत्तौ मेघगम्भीरनिःस्वनौ॥ २२ | इस प्रकार चिन्तामें पड़े हुए विष्णुको देखकर ये दोनों मतवाले दैत्य अत्यन्त हर्षित हुए और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले—हे विष्णो! यदि तुझमें अब बल न हो अथवा युद्धसे थक गये हो तो सिरपर हाथ जोड़कर कह दो कि मैं तुम दोनोंका सेवक हूँ अथवा यदि सामर्थ्य हो तो हे महामते! आओ, हमारे साथ युद्ध करो। आज हमलोग तुम्हें मारकर इस चार मुखवाले पुरुष (ब्रह्मा)-को भी मार डालेंगे॥ २२—२४॥ |
| तव नोचेद् बलं विष्णो यदि श्रान्तोऽसि युद्धतः।<br>ब्रूहि दासोऽस्मि वां नूनं कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्॥ २३ | |
| न चेद्युद्धं कुरुष्वाद्य समर्थोऽसि महामते।<br>हत्वा त्वां निहनिष्यावः पुरुषं च चतुर्मुखम्॥ २४ | |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| श्रुत्वा तद्भाषितं विष्णुस्तयोस्तस्मिन्महोदधौ।<br>उवाच वचनं श्लक्ष्णं सामपूर्वं महामनाः॥ २५ | उस महासागरमें उपस्थित महामना विष्णुने उनके वचन सुनकर सामनीतिके अनुसार मधुर शब्दोंमें कहा— ॥ २५॥ |
| अ० ९ ] | प्रथम स्कन्ध | ११३ | | :--- | :--- |
| हरिरुवाच | विष्णु बोले—यह सनातनधर्म है कि थके हुए, डरे हुए, शस्त्र त्यागे हुए, गिरे हुए एवं बालकपर वीर लोग प्रहार नहीं करते॥ २६॥ | | श्रान्ते भीते त्यक्तशस्त्रे पतिते बालके तथा।<br>प्रहरन्ति न वीरास्ते धर्म एष सनातनः॥ २६ | | | पञ्चवर्षसहस्त्राणि कृतं युद्धं मया त्विह।<br>एकोऽहं भ्रातरौ वां च बलिनौ सदृशौ तथा॥ २७ | मैंने तो यहाँ पाँच हजार वर्षोंतक युद्ध किया। मैं अकेला हूँ और तुम दोनों भाई समान बलवाले वीर हो और दोनों बीच-बीचमें बारी-बारीसे विश्राम भी करते रहे हो। अब मुझे भी थोड़ा विश्राम कर लेने दो। तत्पश्चात् मैं पुनः लडूँगा, इसमें सन्देह नहीं है॥ २७-२८॥ | | कृतं विश्रमणं मध्ये युवाभ्यां च पुनः पुनः।<br>तथा विश्रमणं कृत्वा युध्येऽहं नात्र संशयः॥ २८ | | | तिष्ठतं हि युवां तावद् बलवन्तौ मदोत्कटौ।<br>विश्रम्याहं करिष्यामि युद्धं वा न्यायमार्गतः॥ २९ | बली एवं मदोन्मत्त तुम दोनों भी कुछ विश्राम कर लो, तब मैं विश्राम करके न्यायधर्मानुसार युद्ध करूँगा॥ २९॥ | | सूत उवाच | सूतजी बोले—भगवान् विष्णुकी बात सुनकर दोनों दानव भी युद्ध करनेकी इच्छासे कुछ दूर जाकर विश्राम करने लगे। उन्हें बहुत दूर बैठे देखकर चतुर्भुज भगवान् विष्णु उनके मरनेका उपाय सोचने लगे॥ ३०-३१॥ | | इति श्रुत्वा वचस्तस्य विश्रब्धौ दानवोत्तमौ।<br>संस्थितौ दूरतस्तत्र संग्रामे कृतनिश्चयौ॥ ३० | | | अतिदूरे च तौ दृष्ट्वा वासुदेवश्चतुर्भुजः।<br>दध्यौ च मनसा तत्र कारणं मरणे तयोः॥ ३१ | | | चिन्तनाज्ज्ञानमुत्पन्नं देवीदत्तवरावुभौ।<br>कामं वाञ्छितमरणौ न मम्लतुरतस्त्विमौ॥ ३२ | ध्यानकी अवस्थामें होकर विचार करनेपर उन्हें ज्ञात हो गया कि इन दोनोंको देवीके द्वारा इच्छामृत्युका वरदान प्राप्त है, इसी कारण ये थकते नहीं॥ ३२॥ | | वृथा मया कृतं युद्धं श्रमोऽयं मे वृथा गतः।<br>करोमि च कथं युद्धमेवं ज्ञात्वा विनिश्चयम्॥ ३३ | वे सोचने लगे कि मैंने व्यर्थ ही युद्ध किया, मेरा सब परिश्रम व्यर्थ गया। इस (वरदानकी) बातको जानकर भी अब मैं कैसे युद्ध करूँ?॥ ३३॥ | | अकृते च तथा युद्धे कथमेतौ गमिष्यतः।<br>विनाशं दुःखदौ नित्यं दानवौ वरदर्पितौ॥ ३४ | यदि युद्ध न भी करूँ तो भी ये दैत्य यहाँसे हटेंगे कैसे? यदि इनका विनाश न होगा तो वरप्राप्त दोनों दुर्धर्ष दैत्य सबको दुःख देते रहेंगे॥ ३४॥ | | भगवत्या वरो दत्तस्तया सोऽपि च दुर्घटः।<br>मरणं चेच्छया कामं दुःखितोऽपि न वाञ्छति॥ ३५ | देवीने जो वरदान इन्हें दिया है, वह भी अत्यन्त कठिन है। अत्यन्त दुःखी, रोगी और दीन-हीन प्राणी भी स्वेच्छाया कभी नहीं मरना चाहता, तब भला वे दोनों मदोन्मत्त दैत्य क्यों मरना चाहेंगे?॥ ३५-३६॥ | | रोगग्रस्तोऽपि दीनोऽपि न मुमूर्षति कश्चन।<br>कथं चेमौ मदोन्मत्तौ मर्तुकामौ भविष्यतः॥ ३६ | | | नन्वद्य शरणं यामि विद्यां शक्तिं सुकामदाम्।<br>विना तया न सिध्यन्ति कामाः सम्यक्प्रसन्नया॥ ३७ | अतएव अब मैं सब चिन्ता छोड़कर उन आदिशक्ति भगवती विद्यादेवीकी शरणमें जाऊँ, जो सबकी मनोकामनाएँ सिद्ध करनेवाली हैं; क्योंकि बिना उनके प्रसन्न हुए कोई कामनाएँ पूर्ण नहीं होतीं॥ ३७॥ | | एवं सञ्चिन्त्यमानस्तु गगने संस्थितां शिवाम्।<br>अपश्यद्भगवाग्विष्णुर्योगनिद्रां मनोहराम्॥ ३८ | ऐसा मनमें विचार करते ही भगवान् विष्णुने आकाशमें स्थित परम सुन्दर स्वरूपवाली योगनिद्रा भगवती ‘शिवा’ को देखा। उन्हें देखते ही योगेश्वर |
| ११४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
|---|
| कृताञ्जलिरमेयात्मा तां च तुष्टाव योगवित्।<br>विनाशार्थं तयोस्तत्र वरदां भुवनेश्वरीम्॥ ३९ | अनन्त भगवान् विष्णु उन दोनों दैत्योंके विनाशके लिये हाथ जोड़कर वरप्रदायिनी भगवती ‘भुवनेश्वरी’ की स्तुति करने लगे॥ ३८-३९॥ |
| विष्णुरुवाच<br>नमो देवि महामाये सृष्टिसंहारकारिणि।<br>अनादिनिधने चण्डि भुक्तिमुक्तिप्रदे शिवे॥ ४० | विष्णु बोले—हे देवि! हे महामाये! हे सृष्टि-संहारकारिणि! हे आदि-अन्तरहित! हे चण्डि! हे भुक्तिमुक्ति-प्रदायिनी शिवे! आपको नमस्कार है॥ ४०॥ |
| न ते रूपं विजानामि सगुणं निर्गुणं तथा।<br>चरित्राणि कुतो देवि संख्यातीतानि यानि ते॥ ४१ | हे देवि! मैं आपके सगुण तथा निर्गुण रूपको नहीं जानता, फिर आपके जो असंख्य अद्भुत चरित्र हैं, उन्हें कैसे जान पाऊँगा? मैंने आपके अत्यन्त दुर्घट प्रभावको आज जाना है जबकि मैं आपके द्वारा प्रेरित योगनिद्रामें विलीन होकर अचेत हो गया था॥ ४१-४२॥ |
| अनुभूतो मया तेऽद्य प्रभावश्चातिदुर्घटना।<br>यदहं निद्रया लीनः सञ्जातोऽस्मि विचेतनः॥ ४२ | |
| ब्रह्मणा चातियत्नेन बोधितोऽपि पुनः पुनः।<br>न प्रबुद्धः सर्वथाहं सङ्कोचितषडिन्द्रियः॥ ४३ | ब्रह्माने मुझे बड़े यत्नसे बार-बार जगाया था, किंतु मैं अपनी छहों इन्द्रियोंके संकुचित होनेके कारण जाग न सका॥ ४३॥ |
| अचेतनत्वं सम्प्राप्तः प्रभावात्तव चाम्बिके।<br>त्वया मुक्तः प्रबुद्धोऽहं युद्धं च बहुधा कृतम्॥ ४४ | हे अम्बिके! उस समय मैं आपके प्रभावसे अचेत हो गया था। जब आपने अपना वह प्रभाव हटा लिया तब मैं जगा और मैंने उन दानवोंके साथ अनेक प्रकारसे युद्ध किया। उस युद्धमें मैं तो थक गया, किंतु वे नहीं थके; क्योंकि उन्हें आपका वरदान प्राप्त था। जब वे मदोन्मत्त दानव ब्रह्माजीको मारने दौड़े, तब मैंने भी पुनः द्वन्द्व युद्धके लिये उनका आह्वान किया। हे मानप्रदायिनि! उस समय मैंने उनके साथ महासागरमें घोर युद्ध किया॥ ४४-४६॥ |
| श्रान्तोऽहं न च तौ श्रान्तौ त्वया दत्तवरौ वरौ।<br>ब्रह्माणं हन्तुमायाताै दानवौ मदगर्वितौ॥ ४५ | |
| आहूतौ च मया कामं द्वन्द्वयुद्धाय मानदे।<br>कृतं युद्धं महाघोरं मया ताभ्यां महार्णवे॥ ४६ | |
| मरणे वरदानं ते ततो ज्ञातं महाद्भुतम्।<br>ज्ञात्वाहं शरणं प्राप्तस्त्वामद्य शरणप्रदाम्॥ ४७ | बादमें मुझे ज्ञात हुआ कि आपने उन्हें इच्छामरणका अद्भुत वरदान दिया है। यह जानकर आज मैं शरणदायिनी आपकी शरणमें आया हूँ॥ ४७॥ |
| साहाय्यं कुरु मे मातः खिन्नोऽहं युद्धकर्मणा।<br>दृप्तौ तौ वरदानेन तव देवार्तिनाशने॥ ४८ | अतएव हे माता! अब मेरी सहायता आप ही करें; क्योंकि मैं युद्ध करते-करते बहुत ही खिन्न हो गया हूँ। हे देवताओंकी पीड़ा हरनेवाली! आपके वरदानसे दोनों दानव मदोन्मत्त हो गये हैं॥ ४८॥ |
| हन्तुं मामुद्यतौ पापौ किं करोमि क्व यामि च।<br>इत्युक्ता सा तदा देवी स्मितपूर्वमुवाच ह॥ ४९ | वे दोनों पापी दैत्य मुझे मार डालना चाहते हैं। अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? प्रणाम करते हुए उन जगन्नाथ सनातन वासुदेव विष्णुके ऐसा कहनेपर मुसकराती हुई उन देवीने उनसे कहा— |
| प्रणमन्तं जगन्नाथं वासुदेवं सनातनम्।<br>देवदेव हरे विष्णो कुरु युद्धं पुनः स्वयम्॥ ५० | हे देवदेव! हे हरे! हे विष्णो! आप पुनः उनसे युद्ध कीजिये॥ ४९-५०॥ |
| अ० ९ ] | प्रथम स्कन्ध | ११५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वञ्चयित्वा त्विमौ शूरौ हन्तव्यौ च विमोहितौ।<br>मोहयिष्याम्यहं नूनं दानवौ वक्रया दृशा॥ ५१<br>जहि नारायणाशु त्वं मम मायाविमोहितौ। | इन दोनों वीरोंको छलपूर्वक मोहित करके ही मारा जा सकता है। मैं अपनी वक्रदृष्टिसे उन्हें मोहित कर दूँगी। हे नारायण! अपनी मायासे जब मैं इन्हें मोहित कर दूँगी तब आप शीघ्र ही इन दोनोंका वध कर डालियेगा॥ ५१ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णुस्तस्याः प्रीतिरसान्वितम्॥ ५२<br>संग्रामस्थलमासाद्य तस्थौ तत्र महार्णवे।<br>तदायातौ च तौ वीरौ युद्धकामौ महाबलौ॥ ५३ | सूतजी बोले— देवीके प्रीतिरससे पूर्ण वचनोंको सुनकर भगवान् विष्णु उस सागरमें युद्धस्थलमें आकर खड़े हो गये। तब विष्णुको आते देख वे दोनों युद्धके अभिलाषी महाबली दैत्य भी वहाँ आ डटे॥ ५२-५३॥ |
| वीक्ष्य विष्णुं स्थितं तत्र हर्षयुक्तौ बभूवतुः।<br>तिष्ठ तिष्ठ महाकाम कुरु युद्धं चतुर्भुज॥ ५४<br>दैवाधीनौ विदित्वाद्य नूनं जयपराजयौ।<br>सबलो जयमाप्नोति दैवाज्जयति दुर्बलः॥ ५५ | भगवान् विष्णुको अपने सामने देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए और कहने लगे—हे महाकाम! हे चतुर्भुज! ठहरो-ठहरो; हार और जीतको प्रारब्धके अधीन समझकर अब तुम हमारे साथ युद्ध करो। बलवान् व्यक्ति विजय प्राप्त करता है, किंतु कभी-कभी भाग्यवश दुर्बल व्यक्ति भी जीत जाता है॥ ५४-५५॥ |
| सर्वथैव न कर्तव्यौ हर्षशोकौ महात्मना।<br>पुरा वै बहवो दैत्या जिता दानववैरिणा॥ ५६<br>अधुना चावयोः सार्धं युध्यमानः पराजितः। | आप जैसे महापुरुषको जय या पराजयमें हर्ष या शोक कभी नहीं करना चाहिये। आपने दानवशत्रु होकर पूर्वकालमें बहुत-से दैत्योंको अनेक बार हराया है, परंतु इस समय तो हम दोनोंके साथ लड़ते हुए आप पराजित हो गये हैं॥ ५६ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा तौ महाबाहू युद्धाय समुपस्थितौ॥ ५७<br>वीक्ष्य विष्णुर्जघानाशु मुष्टिनाद्भुतकर्मणा।<br>तावप्यतिबलोन्मत्तौ जघ्नतुर्मुष्टिना हरिम्॥ ५८ | सूतजी बोले— ऐसा कहकर वे दोनों महाबाहु दैत्य युद्ध करनेको तत्पर हो गये। तब वहाँ अवसर देखकर ज्यों ही विचित्रकर्मा विष्णुने उन दोनोंपर मुष्टिसे प्रहार किया, त्यों ही उन दोनों बलोन्मत्त दैत्योंने भी विष्णुपर मुष्टिप्रहार किया॥ ५७-५८॥ |
| एवं परस्परं जातं युद्धं परमदारुणम्।<br>युध्यमानौ महावीर्यौ दृष्ट्वा नारायणस्तदा॥ ५९<br>अपश्यत्सम्मुखं देव्याः कृत्वा दीनां दृशं हरिः। | इस प्रकार उनमें परस्पर महाभयंकर युद्ध होने लगा। उन दोनों महाबलशाली दानवोंको युद्धरत देखकर नारायण श्रीहरिने दीन दृष्टिसे भगवतीकी ओर देखा॥ ५९ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>तं वीक्ष्य तादृशं विष्णुं करुणारससंयुतम्॥ ६०<br>जहासातीव ताम्राक्षी वीक्षमाणा तदासुरौ।<br>तौ जघान कटाक्षैश्च कामबाणैरिवापरैः॥ ६१<br>मन्दस्मितयुतैः कामं प्रेमभावयुतैरनु।<br>दृष्ट्वा मुमुहतुः पापौ देव्या वक्रवलोकनम्॥ ६२ | सूतजी बोले— विष्णुकी ऐसी करुणाजनक दीन दशा देखकर अरुण नेत्रोंवाली भगवती उन दोनों दैत्योंकी ओर देखकर हँसने लगीं और उन्होंने दूसरे कामबाणोंके समान, मन्द मुसकानयुक्त तथा प्रेमभावसे भरे अपने कटाक्षोंसे उनपर प्रहार किया। इस प्रकार देवीके कटाक्षको देखकर वे पापी मधु-कैटभ अत्यन्त मोहित हो गये। वे कामान्ध दानव अपने ऊपर भगवतीकी विशेष अनुकम्पा जानकर |
| ११६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विशेषमिति मन्वानौ कामबाणातिपीडितौ।<br>वीक्षमाणौ स्थितौ तत्र तां देवीं विशदप्रभाम्॥ ६३ | कामबाणसे अत्यन्त पीड़ित होने लगे और अपूर्व शोभाशालिनी भगवतीको देखते हुए वे वहीं खड़े हो गये॥ ६०—६३॥ |
| हरिणापि च तद् दृष्टं देव्यास्तत्र चिकीर्षितम्।<br>मोहितौ तौ परिज्ञाय भगवान्कार्यवित्तमः॥ ६४<br><br>उवाच तौ हसन् श्लक्ष्णं मेघगम्भीरया गिरा।<br>वरं वरयतां वीरौ युवयोर्योऽभिवाञ्छितः॥ ६५ | भगवान् विष्णु भी देवीके उस प्रयत्नको समझ गये। दोनों कामी दानवोंको देवीकी मायासे विमोहित जानकर स्वकार्यसाधक भगवान् विष्णुने वहाँ मेघके समान गम्भीर एवं मधुर वचनोंके द्वारा उन दोनोंका उपहास करते हुए कहा—हे वीरो! तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँगो॥ ६४-६५॥ |
| ददामि परमप्रीतो युद्धेन युवयोः किल।<br>दानवा बहवो दृष्टा युध्यमाना मया पुरा॥ ६६<br><br>युवयोः सदृशः कोऽपि न दृष्टो न च वै श्रुतः।<br>तस्मात्तुष्टोऽस्मि कामं वै निस्तुलेन बलेन च॥ ६७<br><br>भ्रात्रोश्च वाञ्छितं कामं प्रयच्छामि महाबलौ। | तुम दोनोंके युद्धसे मैं अत्यन्त हर्षित हूँ, अतः मैं तुम्हें मनोभिलषित वर दूँगा। यद्यपि पूर्वकालमें भी मेरेद्वारा अनेक दानव युद्ध करते हुए देखे गये हैं, किंतु तुम दोनों भाइयोंके समान मैंने किसीको देखा-सुना नहीं। तुम दोनोंके अतुलनीय बलको देखकर मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। हे महाबली दानवो! मैं तुम दोनों भाइयोंकी वांछित कामनाएँ पूर्ण करूँगा॥ ६६-६७३/२॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णोः साभिमानौ स्मरातुरौ॥ ६८<br><br>वीक्षमाणौ महामायां जगदानन्दकारिणीम्।<br>तमूचतुश्च कामार्तौ विष्णुं कमललोचनौ॥ ६९ | **सूतजी बोले—**विष्णुका यह वचन सुनकर कमलके समान नेत्रवाले कामपीड़ित वे दोनों दैत्य जगदानन्ददायिनी भगवती महामायाको देखते हुए विष्णुसे अभिमानपूर्वक बोले॥ ६८-६९॥ |
| हरे न याचकावावां त्वं किं दातुमिहेच्छसि।<br>ददाव तुल्यं देवेश दातारौ नौ न याचकौ॥ ७०<br><br>प्रार्थय त्वं हृषीकेश मनोऽभिलषितं वरम्।<br>तुष्टौ स्वस्तव युद्धेन वासुदेवाद्भुतेन च॥ ७१ | हे विष्णो! हमलोग याचक नहीं हैं, अतः आप हमलोगोंको देना क्यों चाहते हैं? हे देवेश! यदि आप लेना चाहें तो आप जो माँगिये हम दे सकते हैं; क्योंकि हमलोग भिक्षुक नहीं हैं, दाता हैं। हे हृषीकेश! आप अपना मनोभिलषित वरदान माँगिये। हे वासुदेव! आपके अद्भुत युद्धसे हमलोग आपपर अत्यन्त प्रसन्न हैं॥ ७०-७१॥ |
| तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच जनार्दनः।<br>भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि॥ ७२ | उन दोनोंका वचन सुनकर भगवान् विष्णुने उत्तर दिया—'यदि तुम दोनों मेरे ऊपर प्रसन्न हो तो यही वरदान दो कि तुम दोनों भाई अब मेरे ही हाथों मारे जाओ'॥ ७२॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णोर्दानवौ चातिविस्मितौ।<br>वञ्चिताविति मन्वानौ तस्थतुः शोकसंयुतौ॥ ७३ | **सूतजी बोले—**विष्णुका वचन सुनकर दोनों भाई चकित हो गये और अपनेको उनके द्वारा ठगा हुआ समझकर शोकसे चिन्तित हो गये॥ ७३॥ |
| विचार्य मनसा तौ तु दानवौ विष्णुमूचतुः।<br>प्रेक्ष्य सर्वं जलमयं भूमिं स्थलविवर्जिताम्॥ ७४ | कुछ देरके बाद मनमें विचारकर सम्पूर्ण भूमिको स्थलरहित तथा वहाँ सर्वत्र जल-ही-जल देखकर उन्होंने विष्णुसे कहा—हे जनार्दन विष्णो! आपने |
| अ० ९ ] | प्रथम स्कन्ध | ११७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हरे योऽयं वरो दत्तस्त्वया पूर्वं जनार्दन।<br>सत्यवागसि देवेश देहि तं वाञ्छितं वरम्॥ ७५ | हम-लोगोंको पहले जो वरदान देनेको कहा था, यदि आप सत्यवादी हैं तो पहले उस वांछित वरको प्रदान कीजिये॥ ७४-७५॥ |
| निर्जले विपुले देशे हनस्व मधुसूदन।<br>वध्यावावां तु भवतः सत्यवाग्भव माधव॥ ७६ | हे मधुसूदन! आप हमें किसी निर्जल प्रदेशकी सुविस्तृत भूमिपर मारिये तभी हम आपसे मारे जा सकेंगे, अन्यथा नहीं। अतः हे माधव अब आप सत्यवादी बनिये॥ ७६॥ |
| स्मृत्वा चक्रं तदा विष्णुस्तावुवाच हसन्हरिः।<br>हन्म्यद्य वां महाभागौ निर्जले विपुले स्थले॥ ७७ | तब भगवान् विष्णुने अपने सुदर्शन चक्रका स्मरण करके उन दानवोंसे हँसते हुए कहा—'हे महाभागो! [तुम्हारे कथनानुसार] निर्जल तथा सुविस्तृत भूमिपर ही मैं आज तुम दोनोंको मारूँगा'॥ ७७॥ |
| इत्युक्त्वा देवदेवेश ऊरू कृत्वातिविस्तरौ।<br>दर्शयामास तौ तत्र निर्जलं च जलोपरि॥ ७८<br><br>नास्त्यत्र दानवौ वारि शिरसी मुञ्चतामिह।<br>सत्यवागहमद्यैव भविष्यामि च वां तथा॥ ७९ | ऐसा कहकर देवताओंके आराध्य भगवान् विष्णुने अपनी दोनों जाँघोंको सुविस्तृत करके जलके ऊपर ही स्थल दिखा दिया और उनसे कहा—'दैत्यो! [देखो,] यहाँ जल नहीं है, पृथ्वी है। अतः यहींपर तुम दोनों अपना सिर रखो। ऐसा करनेसे ही आज हम और तुम दोनों सत्यवादी सिद्ध होंगे'॥ ७८-७९॥ |
| तदाकर्ण्य वचस्तथ्यं विचिन्त्य मनसा च तौ।<br>वर्धयामासतुर्देहं योजनानां सहस्रकम्॥ ८० | उस समय विष्णुका तथ्यपूर्ण वचन सुनकर तथा अपने मनमें विचार करके उन दोनों दैत्योंने अपना शरीर बढ़ाकर हजारों योजन लम्बा-चौड़ा कर लिया॥ ८०॥ |
| भगवान्द्विगुणं चक्रे जघनं विस्मितौ तदा।<br>शीर्षे सन्दधतां तत्र जघने परमाद्भुते॥ ८१<br><br>रथांगेन तदा छिन्ने विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>जघनोपरि वेगेन प्रकृष्टे शिरसी तयोः॥ ८२ | तब भगवान् विष्णुने भी अपनी दोनों जाँघोंको बढ़ाकर उससे भी द्विगुणित कर दिया। यह देखकर वे दोनों दैत्य बड़े विस्मयमें पड़ गये, [परंतु अपनी बात सत्य प्रमाणित करनेके लिये] उन्होंने अपने-अपने मस्तक उस अत्यन्त अद्भुत जंघेपर रख दिये। उसी समय प्रतापी भगवान् विष्णुने अपने सुदर्शन चक्रसे जंघेपर स्थित उनके विशाल सिरोंको वेगपूर्वक धड़से अलग कर दिया॥ ८१-८२॥ |
| गतप्राणौ तदा जातौ दानवौ मधुकैटभौ।<br>सागरः सकलो व्याप्तस्तदा वै मेदसा तयोः॥ ८३<br><br>मेदिनीति ततो जातं नाम पृथ्व्याः समन्ततः।<br>अभक्ष्या मृत्तिका तेन कारणेन मुनीश्वराः॥ ८४ | जब दोनों दैत्य मधु और कैटभ मर गये, तब उन्हींकी मेद (चर्बी)-से सम्पूर्ण सागर पट गया। हे मुनीश्वरो! तभीसे पृथ्वीका नाम 'मेदिनी' पड़ गया और इसीलिये मृत्तिका भी अभक्ष्य मानी जाने लगी॥ ८३-८४॥ |
| इति वः कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽस्मि सुनिश्चितम्।<br>महाविद्या महामाया सेवनीया सदा बुधैः॥ ८५ | आपलोगोंने जो प्रश्न किया था, उसका ठीक-ठीक उत्तर मैंने दे दिया। बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये कि वे महामाया महाविद्याकी सर्वदा उपासना करते |
११८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०
११८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०
| आराध्या परमा शक्तिः सर्वैरपि सुरासुरैः।<br>नातः परतरं किञ्चिदधिकं भुवनत्रये॥ ८६ | रहें; क्योंकि वे पराशक्ति ही समस्त देव-दानवोंद्वारा आराध्य हैं। उनसे बढ़कर कोई दूसरा देवता तीनों लोकोंमें नहीं है॥ ८५-८६॥ |
|---|---|
| सत्यं सत्यं पुनः सत्यं वेदशास्त्रार्थनिर्णयः।<br>पूजनीया परा शक्तिर्निर्गुणा सगुणाथवा॥ ८७ | यह बात सर्वदा सत्य है एवं वेदों तथा शास्त्रोंका निष्कर्ष है कि सगुण अथवा निर्गुणरूपमें सर्वदा उस पराशक्तिका ही पूजन करते रहना चाहिये॥ ८७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे<br>हरिकृतमधुकैटभवधवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
अथ दशमोऽध्यायः
व्यासजीकी तपस्या और वर-प्राप्ति
| ऋषय ऊचुः | |
|---|---|
| सूत पूर्वं त्वया प्रोक्तं व्यासेनामिततेजसा।<br>कृत्वा पुराणमखिलं शुकायाध्यापितं शुभम्॥ १ | ऋषिगण बोले— हे सूतजी! आपने हमें पहले ही बतला दिया है कि असीम तेजवाले व्यासजीने कल्याणकारी समस्त पुराणोंकी रचना करके उन्हें शुकदेवजीको पढ़ाया॥ १॥ |
| व्यासेन तु तपस्तप्त्वा कथमुत्पादितः शुकः।<br>विस्तरं ब्रूहि सकलं यच्छ्रुतं कृष्णतस्त्वया॥ २ | व्यासजीने घोर तप करके शुकदेवजीको किस प्रकार पुत्ररूपमें प्राप्त किया? व्यासजीके मुखसे आपने जो कुछ सुना है, वह सब हमसे विस्तारपूर्वक कहिये॥ २॥ |
| सूत उवाच | |
| प्रवक्ष्यामि शुकोत्पत्तिं व्यासात्सत्यवतीसुतात्।<br>यथोत्पन्नः शुकः साक्षाद्योगिनां प्रवरो मुनिः॥ ३ | सूतजी बोले— सत्यवतीपुत्र व्यासजीसे जिस प्रकार योगिजनोंमें श्रेष्ठ साक्षात् मुनिस्वरूप शुकदेवजी उत्पन्न हुए, उत्पत्तिके उस इतिहासको मैं आपलोगोंको बता रहा हूँ॥ ३॥ |
| मेरुशृङ्गे महारम्ये व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>तपश्चचार सोऽत्युग्रं पुत्रार्थं कृतनिश्चयः॥ ४ | सत्यवतीके पुत्र महर्षि व्यास पुत्र-प्राप्तिके लिये दृढ़ संकल्पकर अत्यन्त मनोहर सुमेरुपर्वतके शिखरपर कठोर तपस्या करने लगे॥ ४॥ |
| जपन्नेकाक्षरं मन्त्रं वाग्बीजं नारदाच्छ्रुतम्।<br>ध्यायन्परां महामायां पुत्रकामस्तपोनिधिः॥ ५<br><br>अग्नेर्भूमेस्तथा वायोरन्तरिक्षस्य चाप्ययम्।<br>वीर्येण संमितः पुत्रो मम भूयादिति स्म ह॥ ६ | नारदजीसे सुने गये एकाक्षर वाग्बीज मन्त्रका जप करते हुए तपोनिधि व्यासजी पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे परात्परा महामायामें अपना ध्यान केन्द्रित किये हुए मन-ही-मन सोच रहे थे कि अग्नि, भूमि, वायु एवं आकाश—इनकी शक्तिसे सम्पन्न पुत्रकी मुझे प्राप्ति हो॥ ५-६॥ |
| अतिष्ठत्स गताहारः शतसंवत्सरं प्रभुः।<br>आराधयन्महादेवं तथैव च सदाशिवाम्॥ ७ | इस प्रकार प्रभुतासम्पन्न वे व्यासजी निराहार रहते हुए सौ वर्षोंतक शंकर एवं सदाशिवा भगवतीकी आराधनामें लीन रहे॥ ७॥ |
अ० १० ] प्रथम स्कन्ध ११ ९
| शक्तिः सर्वत्र पूज्येति विचार्य च पुनः पुनः।<br>अशक्तो निन्द्यते लोके शक्तस्तु परिपूज्यते॥ ८<br><br>यत्र पर्वतशृङ्गे वै कर्णिकारवनाद्भुते।<br>क्रीडन्ति देवताः सर्वे मुनयश्च तपोऽधिकाः॥ ९<br><br>आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विनौ तथा।<br>वसन्ति मुनयो यत्र ये चान्ये ब्रह्मवित्तमाः॥ १०<br><br>तत्र हेमगिरेः शृङ्गे संगीतध्वनिनादिते।<br>तपश्चचार धर्मात्मा व्यासः सत्यवतीसुतः॥ ११ | अनेकशः विचार करते हुए महर्षि व्यास इस निष्कर्षपर पहुँचे कि शक्ति ही सर्वत्र पूजनीया है। निर्बल प्राणी लोकमें निन्दाका पात्र होता है और शक्तिशालीकी पूजा की जाती है॥ ८॥<br><br>जहाँ पर्वत-शिखरपर कर्णिकार पुष्पके अद्भुत वनमें देवता एवं महातपस्वी मुनिवृन्द विहार करते हैं; जहाँ सूर्य, वसु, रुद्र, पवन, अश्विनीकुमारद्वय एवं ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ अन्य मुनिजन निवास करते हैं; मधुर संगीतकी ध्वनिसे मुखरित उसी सुमेरुपर्वतकी चोटीपर सत्यवतीनन्दन धर्मात्मा व्यासजीने तपस्या की॥ ९—११॥ | | ततोऽस्य तेजसा व्याप्तं विश्वं सर्वं चराचरम्।<br>अग्निवर्णा जटा जाता पाराशर्यस्य धीमतः॥ १२ | उनके इस तपश्चरणके प्रभावसे समग्र चराचर जगत् व्याप्त हो गया और महामेधासम्पन्न पराशरपुत्र व्यासजीकी जटा अग्निवर्ण हो गयी॥ १२॥ | | ततोऽस्य तेज आलक्ष्य भयमाप शचीपतिः।<br>तुरासाहं तदा दृष्ट्वा भयत्रस्तं श्रमातुरम्॥ १३<br><br>उवाच भगवान् रुद्रो मघवन्तं तथास्थितम्। | तदनन्तर व्यासजीका यह तेज देखकर इन्द्र भयभीत हो गये। तब इन्द्रको भयाक्रान्त तथा व्याकुल देखकर भगवान् शंकरजी उनसे कहने लगे—॥ १३ १/२॥ | | शङ्कर उवाच<br>कथमिन्द्राद्य भीतोऽसि किं दुःखं ते सुरेश्वर॥ १४<br><br>अमर्षो नैव कर्तव्यस्तापसेषु कदाचन।<br>तपश्चरन्ति मुनयो ज्ञात्वा मां शक्तिसंयुतम्॥ १५<br><br>न त्वेतेऽहितमिच्छन्ति तापसाः सर्वथैव हि।<br>इत्युक्तवचनः शक्रस्तमुवाच वृषध्वजम्॥ १६<br><br>कस्मात्तपस्यति व्यासः कोऽर्थस्तस्य मनोगतः। | शंकरजी बोले—हे सुरेश्वर! आपको क्या दुःख है? हे इन्द्र! आज आप इस तरह भयग्रस्त क्यों हैं? तपस्वियोंसे कभी भी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये; क्योंकि मुनिगण मुझे शक्तिसम्पन्न जानकर ही तपस्या करते हैं। ये तपस्वी मुनिलोग कभी भी किसीका अपकार नहीं चाहते हैं। शंकरजीके ऐसा कहनेपर इन्द्र उनसे बोले—व्यासजी ऐसा तप किसलिये कर रहे हैं, उनकी क्या मनोकामना है?॥ १४—१६ १/२॥ | | शिव उवाच<br>पाराशर्यस्तु पुत्रार्थी तपश्चरति दुश्चरम्॥ १७<br><br>पूर्णवर्षशतं जातं ददाम्यद्य सुतं शुभम्। | शिवजी बोले—व्यासजी पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे यह कठोर तप कर रहे हैं। इन्हें तपस्या करते हुए पूरे एक सौ वर्ष हो चुके हैं, अतः मैं इन्हें कल्याणकारी पुत्र प्रदान करूँगा॥ १७ १/२॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा वासवं रुद्रो दयया मुदिताननः॥ १८<br><br>गत्वा ऋषिसमीपं तु तमुवाच जगद्गुरुः।<br>उत्तिष्ठ वासवीपुत्र पुत्रस्ते भविता शुभः॥ १९<br><br>सर्वतेजोमयो ज्ञानी कीर्तिकर्ता तवानघ।<br>अखिलस्य जनस्यात्र वल्लभस्ते सुतः सदा॥ २०<br><br>भविष्यति गुणैः पूर्णः सात्त्विकैः सत्यविक्रमः। | सूतजी बोले—दयाभावसे युक्त प्रसन्न मुखवाले जगद्गुरु भगवान् शंकर इन्द्रसे ऐसा कहकर मुनि व्यासजीके पास जाकर बोले—हे वासवीपुत्र! उठो, तुम्हें कल्याणकारी पुत्र अवश्य प्राप्त होगा। हे निष्पाप! तुम्हारा वह पुत्र सभी प्रकारके तेजोंसे सम्पन्न, ज्ञानवान्, यशस्वी और सभी लोगोंका सदा अतिशय प्रिय, समस्त सात्त्विक गुणोंसे सम्पन्न तथा सत्यरूपी पराक्रमसे युक्त होगा॥ १८—२० १/२॥ |
| १२० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
|---|
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| तदाकर्ण्य वचः श्लक्ष्णं कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥ २१<br><br>शूलपाणिं नमस्कृत्य जगामाश्रममात्मनः ।<br>स गत्वाश्रममेवाशु बहुवर्षश्रमातुरः ॥ २२<br><br>अरणीसहितं गुह्यं मन्थाग्निं चिकीर्षया ।<br>मन्थनं कुर्वतस्तस्य चित्ते चिन्ताभरस्तदा ॥ २३ | तब शूलपाणि शंकरजीका मधुर वचन सुनकर उन्हें प्रणामकर द्वैपायन व्यासजीने अपने आश्रमके लिये प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर कई वर्षोंतक घोर तप करनेके कारण अतिशय श्रान्त महर्षि व्यास अरणीमें समाहित अग्निको प्रकट करनेकी कामनासे अरणि-मन्थन करने लगे। मन्थन कर रहे व्यासजीके मनमें उस समय महान् चिन्ता हो रही थी॥ २१—२३॥ |
| प्रादुर्बभूव सहसा सुतोत्पत्तौ महात्मनः ।<br>मन्थानारणि संयोगान्मन्थनाच्च समुद्भवः ॥ २४<br><br>पावकस्य यथा तद्वत्कथं मे स्यात्सुतोद्भवः ।<br>पुत्रारणिस्तु या ख्याता सा ममाद्य न विद्यते ॥ २५<br><br>तरुणी रूपसम्पन्ना कुलोत्पन्ना पतिव्रता ।<br>कथं करोमि कान्तां च पादयोः शृङ्खलासमाम् ॥ २६<br><br>पुत्रोत्पादनदक्षां च पातिव्रत्ये सदा स्थिताम् ।<br>पतिव्रतापि दक्षापि रूपवत्यपि कामिनी ॥ २७<br><br>सदा बन्धनरूपा च स्वेच्छासुखविधायिनी ।<br>शिवोऽपि वर्तते नित्यं कामिनीपाशसंयुतः ॥ २८ | मन्थन तथा अरणिके पारस्परिक संयोगसे प्रकटित अग्निको देखकर व्यासजीके मनमें अचानक पुत्रोत्पत्तिका विचार आया कि अरणि-मन्थनजनित अग्निकी भाँति मुझे पुत्र कैसे उत्पन्न हो? क्योंकि पुत्र प्रदान करनेवाली अरणी-रूपी वह रूपवती, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा पतिव्रता युवती स्त्री मेरे पास है नहीं, साथ ही पैरोंकी शृंखलाके समान स्त्रीको मैं कैसे अंगीकार करूँ? पुत्र उत्पन्न करनेमें कुशल और पातिव्रत्य धर्ममें सदा तत्पर रहनेवाली पत्नी मुझे कैसे मिले? पतिपरायणा, निपुण, रूपवती—कैसी भी स्त्री हो; वह सदा बन्धनकी कारण ही बनी रहती है। स्त्री सदा अपनी इच्छाके अनुसार सुख प्राप्त करना चाहती है। शंकरजी भी नित्य स्त्रीके मोहपाशमें फँसे हुए रहते हैं। अतः अब मैं अत्यन्त विषम गृहस्थाश्रम-धर्मको किस प्रकार अंगीकार करूँ?॥ २४—२८<sup>१</sup>॥ |
| कथं करोम्यहं चात्र दुर्घटं च गृहाश्रमम् ।<br>एवं चिन्तयतस्तस्य घृताची दिव्यरूपिणी ॥ २९<br><br>प्राप्ता दृष्टिपथं तत्र समीपे गगने स्थिता ।<br>तां दृष्ट्वा चञ्चलापाङ्गीं समीपस्थां वराप्सराम् ॥ ३०<br><br>पञ्चबाणपरीताङ्गस्तूर्णंमासीद् धृतव्रतः ।<br>चिन्तयामास च तदा किं करोम्यद्य संकटे ॥ ३१ | व्यासजी ऐसा विचार कर ही रहे थे कि आकाशमें समीपमें ही स्थित घृताची नामक अप्सरा उन्हें दृष्टि-गोचर हुई। चंचल कटाक्षोंवाली उस श्रेष्ठ अप्सराको पासमें ही स्थित देखकर कठोर नियम-संयम धारण करनेवाले व्यासजी शीघ्र ही कामबाणसे आहत अंगोंवाले हो गये और सोचने लगे कि अब इस विषम संकटके समय मैं क्या करूँ?॥ २९—३१॥ |
| धर्मस्य पुरतः प्राप्ते कामभावे दुरासदे ।<br>अङ्गीकरोमि यद्येनां वञ्चनार्थमिहागताम् ॥ ३२<br><br>हसिष्यन्ति महात्मानस्तापसा मां तु विह्वलम् ।<br>तपस्तप्त्वा महाघोरं पूर्णवर्षशतं त्विह ॥ ३३ | धर्मके समक्ष इस दुर्जय कामवासनाके वशीभूत होकर यदि मैं छलनेके लिये यहाँ उपस्थित हुई इस अप्सराको स्वीकार करता हूँ, तब ऐसी स्थितिमें महात्मा तथा तपस्वीगण मुझ कामासक्तिसे विह्वलका यह उपहास करेंगे कि सौ वर्षोंतक कठिन तपस्या करनेके पश्चात् भी एक अप्सराको देखकर महातपस्वी |
अ० ११ ] प्रथम स्कन्ध १२१
अ० ११ ] प्रथम स्कन्ध १२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दृष्ट्वाप्सरां च विवशः कथं जातो महातपाः।<br>कामं निन्दापि भवतु यदि स्यादतुलं सुखम्॥ ३४ | व्यास इतने विवश कैसे हो गये? और फिर यदि इसमें अतुलनीय सुख हो तो ऐसी निन्दा भी होती रहे। अर्थात् उसकी उपेक्षा भी की जा सकती है॥ ३२—३४॥ |
| गृहस्थाश्रमसम्भूतं सुखदं पुत्रकामदम्।<br>स्वर्गदं च तथा प्रोक्तं ज्ञानिनां मोक्षदं तथा॥ ३५<br><br>न भविष्यति तन्नूनमनया देवकन्यया।<br>नारदाच्च मया पूर्वं श्रुतमस्ति कथानकम्।<br>यथोर्वशीवशो राजा पराभूतः पुरूरवाः॥ ३६ | गृहस्थाश्रम पुत्र-प्राप्तिकी कामना पूर्ण करनेवाला, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा ज्ञानियोंको मोक्ष देनेवाला कहा गया है। किंतु वैसा सुख इस देवकन्यासे नहीं प्राप्त होगा। पूर्वकालमें मैंने नारदजीसे एक कथा सुनी थी जिसमें राजा पुरूरवा उर्वशीके वशीभूत होकर अत्यन्त संकटमें पड़ गये थे॥ ३५–३६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शिववरदानवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
# अथैकादशोऽध्यायः
### बुधके जन्मकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
| :--- | :--- |
| **ऋषय ऊचुः**<br>कोऽसौ पुरूरवा राजा कोर्वशी देवकन्यका।<br>कथं कष्टं च सम्प्राप्तं तेन राज्ञा महात्मना॥ १ | **ऋषिगण बोले**—हे सूतजी! वे राजा पुरूरवा कौन थे तथा वह देवकन्या उर्वशी कौन थी? उस मनस्वी राजाने किस प्रकार संकट प्राप्त किया?॥ १॥ |
| सर्वं कथानकं ब्रूहि लोमहर्षणजाधुना।<br>श्रोतुकामा वयं सर्वे त्वन्मुखाब्जच्युतं रसम्॥ २ | हे लोमहर्षणतनय! आप इस समय पूरा कथानक विस्तारपूर्वक कहें। हम सभी लोग आपके मुखारविन्दसे निःसृत रसमयी वाणीको सुननेके इच्छुक हैं॥ २॥ |
| अमृतादपि मिष्टा ते वाणी सूत रसात्मिका।<br>न तृप्यामो वयं सर्वे सुधया च यथामराः॥ ३ | हे सूतजी! आपकी वाणी अमृतसे भी बढ़कर मधुर एवं रसमयी है। जिस प्रकार देवगण अमृत-पानसे कभी तृप्त नहीं होते, उसी प्रकार आपके कथा-श्रवणसे हम तृप्त नहीं होते॥ ३॥ |
| **सूत उवाच**<br>शृणुध्वं मुनयः सर्वे कथां दिव्यां मनोरमाम्।<br>वक्ष्याम्यहं यथाबुद्ध्या श्रुतां व्यासवरोत्तमात्॥ ४ | **सूतजी बोले**—हे मुनियो! अब आपलोग उस दिव्य तथा मनोहर कथाको सुनिये, जिसे मैंने परम श्रेष्ठ व्यासजीके मुखसे सुना है। मैं उसे अपनी बुद्धिके अनुसार वैसा ही कहूँगा॥ ४॥ |
| गुरोस्तु दयिता भार्या तारा नामेति विश्रुता।<br>रूपयौवनयुक्ता सा चार्वङ्गी मदविह्वला॥ ५ | सुरगुरु बृहस्पतिकी पत्नीका नाम 'तारा' था। वह रूप-यौवनसे सम्पन्न तथा सुन्दर अंगोंवाली थी॥ ५॥ |
| गतैकदा विधोर्धाम यजमानस्य भामिनी।<br>दृष्टा च शशिनात्यर्थं रूपयौवनशालिनी॥ ६<br><br>कामातुरस्तदा जातः शशी शशिमुखीं प्रति।<br>सापि वीक्ष्य विधुं कामं जाता मदनपीडिता॥ ७<br><br>तावन्योन्यं प्रेमयुक्तौ स्मरार्तौ च बभूवतुः।<br>तारा शशी मदोन्मत्तौ कामबाणप्रपीडितौ॥ ८ | एक बार वह सुन्दरी अपने यजमान चन्द्रमाके घर गयी। उस रूप तथा यौवनसे सम्पन्न चन्द्रमुखी कामिनीको देखते ही चन्द्रमा उसपर आसक्त हो गये। तारा भी चन्द्रमाको देखकर आसक्त हो गयी। इस प्रकार वे दोनों तारा तथा चन्द्रमा एक-दूसरेको देखकर प्रेमविभोर हो गये॥ ६—८॥ |
| १२२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रेमाते मदमत्तौ तौ परस्परस्पृहान्वितौ।<br>दिनानि कतिचित्तत्र जातानि रममाणयोः ॥ ९<br><br>बृहस्पतिस्तु दुःखार्तस्तारामानयितुं गृहम्।<br>प्रेषयामास शिष्यं तु नायाता सा वशीकृता॥ १० | वे दोनों प्रेमोन्मत्त एक-दूसरेको चाहनेकी इच्छासे युक्त हो विहार करने लगे। इस प्रकार उनके कुछ दिन व्यतीत हुए। तब बृहस्पतिने ताराको घर लानेके लिये अपना एक शिष्य भेजा; परंतु वह न आ सकी॥ ९-१०॥ |
| पुनः पुनर्यदा शिष्यं परावर्तत चन्द्रमाः।<br>बृहस्पतिस्तदा क्रुद्धो जगाम स्वयमेव हि॥ ११ | जब चन्द्रमाने बृहस्पतिके शिष्यको कई बार लौटाया, तो वे क्रोधित होकर चन्द्रमाके पास स्वयं गये॥ ११॥ |
| गत्वा सोमगृहं तत्र वाचस्पतिरुदारधीः।<br>उवाच शशिनं क्रुद्धः स्मयमानं मदान्वितम्॥ १२<br><br>किं कृतं किल शीतांशो कर्म धर्मविगर्हितम्।<br>रक्षिता मम भार्येयं सुन्दरी केन हेतुना॥ १३ | चन्द्रमाके घर जाकर उदारचित्त बृहस्पतिने अभिमानके साथ मुसकराते हुए उस चन्द्रमासे कहा—हे चन्द्रमा! तुमने यह धर्मविरुद्ध कार्य क्यों किया और मेरी इस परम सुन्दरी पत्नीको अपने घरमें क्यों रख लिया?॥ १२-१३॥ |
| तव देव गुरुश्चाहं यजमानोऽसि सर्वथा।<br>गुरुभार्यां कथं मूढ भुक्ता किं रक्षिताथवा॥ १४ | हे देव! मैं तुम्हारा गुरु हूँ और तुम मेरे यजमान हो। तब हे मूर्ख! तुमने गुरुपत्नीको अपने घरमें क्यों रख लिया?॥ १४॥ |
| ब्रह्महा हेमहारी च सुरापो गुरुतल्पगः।<br>महापातकिनो ह्येते तत्संसर्गी च पञ्चमः॥ १५<br><br>महापातकयुक्तस्त्वं दुराचारोऽतिगर्हितः।<br>न देवसदनार्होऽसि यदि भुक्तेयमङ्गना॥ १६ | ब्रह्महत्या करनेवाला, सुवर्ण चुरानेवाला, मदिरापान करनेवाला, गुरुपत्नीगामी तथा पाँचवाँ इन पापियोंके साथ संसर्ग रखनेवाला—ये ‘महापातकी’ हैं। तुम महापापी, दुराचारी एवं अत्यन्त निन्दनीय हो। यदि तुमने मेरी पत्नीके साथ अनाचार किया है तो तुम देवलोकमें रहनेयोग्य नहीं हो॥ १५-१६॥ |
| मुञ्चेमामसितापाङ्गीं नयामि सदनं मम।<br>नोचेद्धक्ष्यामि दुष्टात्मन् गुरुदारापहारिणम्॥ १७ | हे दुष्टात्मन्! असितापांगी मेरी इस पत्नीको छोड़ दो जिससे मैं इसे अपने घर ले जाऊँ, अन्यथा गुरुपत्नीका अपहरण करनेवाले तुझको मैं शाप दे दूँगा॥ १७॥ |
| इत्येवं भाषमाणं तमुवाच रोहिणीपतिः।<br>गुरुं क्रोधसमायुक्तं कान्ताविरहदुःखितम्॥ १८ | इस प्रकार बोलते हुए स्त्रीविरहसे कातर तथा क्रोधाकुल देवगुरु बृहस्पतिसे रोहिणीपति चन्द्रमाने कहा॥ १८॥ |
| इन्दुरुवाच<br>क्रोधान्ते तु दुराराध्या ब्राह्मणाः क्रोधवर्जिताः।<br>पूजार्हा धर्मशास्त्रज्ञा वर्जनीयास्ततोऽन्यथा॥ १९ | **चन्द्रमा बोले—**क्रोधके कारण ब्राह्मण अपूजनीय होते हैं। क्रोधरहित तथा धर्मशास्त्रज्ञ विप्र पूजाके योग्य हैं और इन गुणोंसे हीन ब्राह्मण त्याज्य होते हैं॥ १९॥ |
| आगमिष्यति सा कामं गृहं ते वरवर्णिनी।<br>अत्रैव संस्थिता बाला का ते हानिरिहानघ॥ २०<br><br>इच्छया संस्थिता चात्र सुखकामार्थिनी हि सा।<br>दिनानि कतिचित्स्थित्वा स्वेच्छया चागमिष्यति॥ २१ | हे अनघ! वह सुन्दर स्त्री अपनी इच्छासे आपके घर चली जायगी और यदि कुछ दिन यहाँ ठहर भी गयी तो इससे आपकी क्या हानि है? अपनी इच्छासे ही वह यहाँ रहती है। सुखकी इच्छा रखनेवाली वह कुछ दिन यहाँ रहकर अपनी इच्छासे चली जायगी॥ २०-२१॥ |
| अ० ११ ] | प्रथम स्कन्ध | १२३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| त्वयैवोदाहृतं पूर्वं धर्मशास्त्रमतं तथा।<br>न स्त्री दुष्यति चोरेण न विप्रो वेदकर्मणा॥ २२ | आपने ही तो पूर्वमें धर्मशास्त्रके इस मतका उल्लेख किया है कि संसर्गसे स्त्री और वेदकर्मसे ब्राह्मण कभी दूषित नहीं होते॥ २२॥ |
| इत्युक्तः शशिना तत्र गुरुरत्यन्तदुःखितः।<br>जगाम स्वगृहं तूर्णं चिन्ताविष्टः स्मरातुरः॥ २३ | चन्द्रमाके ऐसा कहनेपर बृहस्पति अत्यन्त दुखी हुए एवं चिन्तामग्न होकर शीघ्र ही अपने घर चले गये॥ २३॥ |
| दिनानि कतिचित्तत्र स्थित्वा चिन्तातुरो गुरुः।<br>ययावथ गृहं तस्य त्वरितश्चौषधीपतेः॥ २४<br>स्थितः क्षत्रा निषिद्धोऽसौ द्वारदेशे रुषान्वितः।<br>नाजगाम शशी तत्र चुकोपाति बृहस्पतिः॥ २५ | कुछ दिन अपने घर रहकर चिन्तासे व्याकुल गुरु बृहस्पति पुनः उन औषधिपति चन्द्रमाके यहाँ शीघ्र जा पहुँचे। वहाँ द्वारपालने उन्हें भीतर जानेसे रोका, तब वे क्रुद्ध होकर द्वारपर ही रुक गये। [कुछ देरतक प्रतीक्षा करनेपर] जब चन्द्रमा वहाँ नहीं आये, तब बृहस्पति अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे॥ २४-२५॥ |
| अयं मे शिष्यतां यातो गुरुपत्नीं तु मातरम्।<br>जग्राह बलतोऽधर्मी शिक्षणीयो मयाऽधुना॥ २६ | [वे विचार करने लगे] मेरा शिष्य होते हुए भी इसने माताके समान आदरणीया गुरुपत्नीको बलपूर्वक हर लिया है। इसलिये अब मुझे इस अधर्मीको दण्डित करना चाहिये॥ २६॥ |
| उवाच वाचं कोपात्तु द्वारदेशस्थितो बहिः।<br>किं शेषे भवने मन्द पापाचार सुराधम॥ २७<br>देहि मे कामिनीं शीघ्रं नोचेच्छापं ददाम्यहम्।<br>करोमि भस्मसान्नूनं न ददासि प्रियां मम॥ २८ | तब बाहर द्वारपर खड़े बृहस्पतिने क्रोधके साथ चन्द्रमासे कहा—अरे नीच! पापी! देवाधम! तुम अपने घरमें निश्चिन्त होकर क्यों पड़े हो? मेरी स्त्री शीघ्र मुझे लौटा दो, अन्यथा मैं तुम्हें शाप दे दूँगा। यदि तुम मेरी पत्नी नहीं दोगे तो मैं तुझे अभी अवश्य भस्म कर दूँगा॥ २७-२८॥ |
| सूत उवाच<br>क्रूराणि चैवमादीनि भाषणानि बृहस्पतेः।<br>श्रुत्वा द्विजपतिः शीघ्रं निर्गतः सदनाद् बहिः॥ २९<br>तमुवाच हसन्सोमः किमिदं बहु भाषसे।<br>न ते योग्यासितापाङ्गी सर्वलक्षणसंयुता॥ ३० | **सूतजी बोले—**बृहस्पतिके इस प्रकारके क्रोधभरे वचन सुनकर द्विजराज चन्द्रमा शीघ्र घरसे बाहर निकले और हँसते हुए उनसे बोले—आप इतना अधिक क्यों बोल रहे हैं? सर्वलक्षणसम्पन्न वह असितापांगी आपके योग्य नहीं है॥ २९-३०॥ |
| कुरूपां च स्वसदृशीं गृहाणान्यां स्त्रियं द्विज।<br>भिक्षुकस्य गृहे योग्या नेदृशी वरवर्णिनी॥ ३१<br>रतिः स्वसदृशे कान्ते नार्याः किल निगद्यते।<br>त्वं न जानासि मन्दात्मन् कामशास्त्रविनिर्णयम्॥ ३२<br>यथेष्टं गच्छ दुर्बुद्धे नाहं दास्यामि कामिनीम्।<br>यच्छक्यं कुरु तत्कामं न देया वरवर्णिनी॥ ३३<br>कामार्तस्य च ते शापो न मां बाधितुमर्हति।<br>नाहं ददे गुरो कान्तां यथेच्छसि तथा कुरु॥ ३४ | हे विप्र! आप अपने समान किसी अन्य स्त्रीको ग्रहण कर लीजिये; ऐसी सुन्दरी भिक्षुकके घरमें रहनेयोग्य नहीं है। यह प्रायः कहा जाता है कि अपने समान गुणसम्पन्न पतिपर ही पत्नीका प्रेम स्थिर रहता है। अपने इच्छानुसार अब आप चाहे जहाँ चले जायँ। मैं इसे नहीं दूँगा। आपका शाप मेरे ऊपर नहीं लग सकता। हे गुरो! मैं यह रमणी आपको नहीं दूँगा, अब आप जैसा चाहें वैसा करें॥ ३१-३४॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्तः शशिना चेज्यश्चिन्तामाप रुषान्वितः।<br>जगाम तरसा सद्य क्रोधयुक्तः शचीपतेः॥ ३५ | **सूतजी बोले—**चन्द्रमाके ऐसा कहनेपर देवगुरु बृहस्पति रुष्ट होकर चिन्तामें पड़ गये और वे कुपित हो शीघ्रतासे इन्द्रके भवन चले गये॥ ३५॥ |
| १२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दृष्ट्वा शतक्रतुस्तत्र गुरुं दुःखातुरं स्थितम्।<br>पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः पूजयित्वा सुसंस्थितः॥ ३६ | वहाँ स्थित देवगुरु बृहस्पतिवारको दुःखसे व्याकुल देखकर इन्द्रने पाद्य, अर्घ्य तथा आचमनीय आदिसे उनकी विधिवत् पूजा करके बैठाया॥ ३६॥ |
| पप्रच्छ परमोदारस्तं तथावस्थितं गुरुम्।<br>का चिन्ता ते महाभाग शोकार्तोऽसि महामुने॥ ३७ | जब बृहस्पति आसनपर बैठकर स्वस्थ हो गये, तब परम उदार इन्द्रने उनसे पूछा—'हे महाभाग! आपको कौन-सी चिन्ता है? हे मुनिवर! आप इतने शोकाकुल किसलिये हैं?॥ ३७॥ |
| केनापमानितोऽसि त्वं मम राज्ये गुरुश्च मे।<br>त्वदधीनमिदं सर्वं सैन्यं लोकाधिपैः सह॥ ३८<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा शम्भुर्यै चान्ये देवसत्तमाः।<br>करिष्यन्ति च साहाय्यं का चिन्ता वद साम्प्रतम्॥ ३९ | मेरे राज्यमें आपका अपमान किसने किया है? आप मेरे गुरु हैं, अतः हमारी सारी सेना एवं लोकपाल सभी आपके अधीन हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा अन्य देवता भी आपकी सहायता करेंगे। आपको कौन-सी चिन्ता है; इस समय उसे बताइये॥ ३८-३९॥ |
| गुरुरुवाच<br>शशिनापहृता भार्या तारा मम सुलोचना।<br>न ददाति स दुष्टात्मा प्रार्थितोऽपि पुनः पुनः॥ ४०<br>किं करोमि सुरेशान त्वमेव शरणं मम।<br>साहाय्यं कुरु देवेश दुःखितोऽस्मि शतक्रतो॥ ४१ | बृहस्पति बोले—चन्द्रमाने मेरी सुन्दर नेत्रोंवाली पत्नी ताराका हरण कर लिया और वह दुष्ट मेरे बार-बार प्रार्थना करनेपर भी उसे लौटाता नहीं है। हे देवराज! अब मैं क्या करूँ? अब तो केवल आप ही मेरी शरण हैं। हे शतक्रतो! मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। हे देवेश! आप मेरी सहायता कीजिये॥ ४०-४१॥ |
| इन्द्र उवाच<br>मा शोकं कुरु धर्मज्ञ दासोऽस्मि तव सुव्रत।<br>आनयिष्याम्यहं नूनं भार्या तव महामते॥ ४२<br>प्रेषिते चेन्मया दूते न दास्यति मदाकुलः।<br>ततो युद्धं करिष्यामि देवसैन्यैः समावृतः॥ ४३ | इन्द्र बोले—हे धर्मात्मन्! आप शोक न करें, हे सुव्रत! मैं आपका सेवक हूँ, मैं आपकी पत्नीको अवश्य लाऊँगा। हे महामते! यदि दूत भेजनेपर भी वह मदोन्मत्त चन्द्रमा आपकी स्त्रीको नहीं देगा तो देवसेनाओंसहित मैं स्वयं युद्ध करूँगा॥ ४२-४३॥ |
| इत्याश्वास्य गुरुं शक्रो दूतं वक्तृविचक्षणम्।<br>प्रेषयामास सोमाय वार्ताशंसिनमद्भुतम्॥ ४४ | इस प्रकार गुरु बृहस्पतिको आश्वासन देकर इन्द्रने अपनी बातको सही ढंगसे कहनेवाले, विलक्षण तथा वाक्पटु दूतको चन्द्रमाके पास भेजा॥ ४४॥ |
| स गत्वा शशिलोकं तु त्वरितः सुविचक्षणः।<br>उवाच वचनेनैव वचनं रोहिणीपतिम्॥ ४५<br>प्रेषितोऽहं महाभाग शक्रेण त्वां विवक्षया।<br>कथितं प्रभुणा यच्च तद् ब्रवीमि महामते॥ ४६ | शीघ्र ही वह चतुर दूत चन्द्रलोक गया और रोहिणीपति चन्द्रमासे यह सन्देश-वचन कहने लगा—हे महाभाग! हे महामते! इन्द्रने आपसे कुछ कहनेके लिये मुझे भेजा है। अतः उनके द्वारा जो कुछ कहा गया है, वही ज्यों-का-त्यों मैं आपसे कह रहा हूँ॥ ४५-४६॥ |
| धर्मज्ञोऽसि महाभाग नीतिं जानासि सुव्रत।<br>अत्रिः पिता ते धर्मात्मा न निन्द्यं कर्तुमर्हसि॥ ४७<br>भार्या रक्ष्या सर्वभूतैर्यथाशक्ति ह्यतन्द्रितैः।<br>तदर्थे कलहः कामं भविता नात्र संशयः॥ ४८ | हे महाभाग! हे सुव्रत! आप धर्मज्ञ हैं, नीति जानते हैं तथा धर्मात्मा अत्रिमुनि आपके पिता हैं, अतएव आपको कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये जिससे आप निन्दनीय हो जायें। आलस्यरहित होकर यथाशक्ति अपनी स्त्रीकी रक्षा सभी प्राणी करते हैं। अतः इस (तारा)-के लिये बड़ा कलह होगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४७-४८॥ |