भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 889 में से

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पृष्ठ 125
११६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विशेषमिति मन्वानौ कामबाणातिपीडितौ।<br>वीक्षमाणौ स्थितौ तत्र तां देवीं विशदप्रभाम्॥ ६३कामबाणसे अत्यन्त पीड़ित होने लगे और अपूर्व शोभाशालिनी भगवतीको देखते हुए वे वहीं खड़े हो गये॥ ६०—६३॥
हरिणापि च तद् दृष्टं देव्यास्तत्र चिकीर्षितम्।<br>मोहितौ तौ परिज्ञाय भगवान्कार्यवित्तमः॥ ६४<br><br>उवाच तौ हसन् श्लक्ष्णं मेघगम्भीरया गिरा।<br>वरं वरयतां वीरौ युवयोर्योऽभिवाञ्छितः॥ ६५भगवान् विष्णु भी देवीके उस प्रयत्नको समझ गये। दोनों कामी दानवोंको देवीकी मायासे विमोहित जानकर स्वकार्यसाधक भगवान् विष्णुने वहाँ मेघके समान गम्भीर एवं मधुर वचनोंके द्वारा उन दोनोंका उपहास करते हुए कहा—हे वीरो! तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँगो॥ ६४-६५॥
ददामि परमप्रीतो युद्धेन युवयोः किल।<br>दानवा बहवो दृष्टा युध्यमाना मया पुरा॥ ६६<br><br>युवयोः सदृशः कोऽपि न दृष्टो न च वै श्रुतः।<br>तस्मात्तुष्टोऽस्मि कामं वै निस्तुलेन बलेन च॥ ६७<br><br>भ्रात्रोश्च वाञ्छितं कामं प्रयच्छामि महाबलौ।तुम दोनोंके युद्धसे मैं अत्यन्त हर्षित हूँ, अतः मैं तुम्हें मनोभिलषित वर दूँगा। यद्यपि पूर्वकालमें भी मेरेद्वारा अनेक दानव युद्ध करते हुए देखे गये हैं, किंतु तुम दोनों भाइयोंके समान मैंने किसीको देखा-सुना नहीं। तुम दोनोंके अतुलनीय बलको देखकर मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। हे महाबली दानवो! मैं तुम दोनों भाइयोंकी वांछित कामनाएँ पूर्ण करूँगा॥ ६६-६७३/२॥
सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णोः साभिमानौ स्मरातुरौ॥ ६८<br><br>वीक्षमाणौ महामायां जगदानन्दकारिणीम्।<br>तमूचतुश्च कामार्तौ विष्णुं कमललोचनौ॥ ६९**सूतजी बोले—**विष्णुका यह वचन सुनकर कमलके समान नेत्रवाले कामपीड़ित वे दोनों दैत्य जगदानन्ददायिनी भगवती महामायाको देखते हुए विष्णुसे अभिमानपूर्वक बोले॥ ६८-६९॥
हरे न याचकावावां त्वं किं दातुमिहेच्छसि।<br>ददाव तुल्यं देवेश दातारौ नौ न याचकौ॥ ७०<br><br>प्रार्थय त्वं हृषीकेश मनोऽभिलषितं वरम्।<br>तुष्टौ स्वस्तव युद्धेन वासुदेवाद्भुतेन च॥ ७१हे विष्णो! हमलोग याचक नहीं हैं, अतः आप हमलोगोंको देना क्यों चाहते हैं? हे देवेश! यदि आप लेना चाहें तो आप जो माँगिये हम दे सकते हैं; क्योंकि हमलोग भिक्षुक नहीं हैं, दाता हैं। हे हृषीकेश! आप अपना मनोभिलषित वरदान माँगिये। हे वासुदेव! आपके अद्भुत युद्धसे हमलोग आपपर अत्यन्त प्रसन्न हैं॥ ७०-७१॥
तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच जनार्दनः।<br>भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि॥ ७२उन दोनोंका वचन सुनकर भगवान् विष्णुने उत्तर दिया—'यदि तुम दोनों मेरे ऊपर प्रसन्न हो तो यही वरदान दो कि तुम दोनों भाई अब मेरे ही हाथों मारे जाओ'॥ ७२॥
सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णोर्दानवौ चातिविस्मितौ।<br>वञ्चिताविति मन्वानौ तस्थतुः शोकसंयुतौ॥ ७३**सूतजी बोले—**विष्णुका वचन सुनकर दोनों भाई चकित हो गये और अपनेको उनके द्वारा ठगा हुआ समझकर शोकसे चिन्तित हो गये॥ ७३॥
विचार्य मनसा तौ तु दानवौ विष्णुमूचतुः।<br>प्रेक्ष्य सर्वं जलमयं भूमिं स्थलविवर्जिताम्॥ ७४कुछ देरके बाद मनमें विचारकर सम्पूर्ण भूमिको स्थलरहित तथा वहाँ सर्वत्र जल-ही-जल देखकर उन्होंने विष्णुसे कहा—हे जनार्दन विष्णो! आपने
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