देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 124, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 124
| अ० ९ ] | प्रथम स्कन्ध | ११५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वञ्चयित्वा त्विमौ शूरौ हन्तव्यौ च विमोहितौ।<br>मोहयिष्याम्यहं नूनं दानवौ वक्रया दृशा॥ ५१<br>जहि नारायणाशु त्वं मम मायाविमोहितौ। | इन दोनों वीरोंको छलपूर्वक मोहित करके ही मारा जा सकता है। मैं अपनी वक्रदृष्टिसे उन्हें मोहित कर दूँगी। हे नारायण! अपनी मायासे जब मैं इन्हें मोहित कर दूँगी तब आप शीघ्र ही इन दोनोंका वध कर डालियेगा॥ ५१ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णुस्तस्याः प्रीतिरसान्वितम्॥ ५२<br>संग्रामस्थलमासाद्य तस्थौ तत्र महार्णवे।<br>तदायातौ च तौ वीरौ युद्धकामौ महाबलौ॥ ५३ | सूतजी बोले— देवीके प्रीतिरससे पूर्ण वचनोंको सुनकर भगवान् विष्णु उस सागरमें युद्धस्थलमें आकर खड़े हो गये। तब विष्णुको आते देख वे दोनों युद्धके अभिलाषी महाबली दैत्य भी वहाँ आ डटे॥ ५२-५३॥ |
| वीक्ष्य विष्णुं स्थितं तत्र हर्षयुक्तौ बभूवतुः।<br>तिष्ठ तिष्ठ महाकाम कुरु युद्धं चतुर्भुज॥ ५४<br>दैवाधीनौ विदित्वाद्य नूनं जयपराजयौ।<br>सबलो जयमाप्नोति दैवाज्जयति दुर्बलः॥ ५५ | भगवान् विष्णुको अपने सामने देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए और कहने लगे—हे महाकाम! हे चतुर्भुज! ठहरो-ठहरो; हार और जीतको प्रारब्धके अधीन समझकर अब तुम हमारे साथ युद्ध करो। बलवान् व्यक्ति विजय प्राप्त करता है, किंतु कभी-कभी भाग्यवश दुर्बल व्यक्ति भी जीत जाता है॥ ५४-५५॥ |
| सर्वथैव न कर्तव्यौ हर्षशोकौ महात्मना।<br>पुरा वै बहवो दैत्या जिता दानववैरिणा॥ ५६<br>अधुना चावयोः सार्धं युध्यमानः पराजितः। | आप जैसे महापुरुषको जय या पराजयमें हर्ष या शोक कभी नहीं करना चाहिये। आपने दानवशत्रु होकर पूर्वकालमें बहुत-से दैत्योंको अनेक बार हराया है, परंतु इस समय तो हम दोनोंके साथ लड़ते हुए आप पराजित हो गये हैं॥ ५६ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा तौ महाबाहू युद्धाय समुपस्थितौ॥ ५७<br>वीक्ष्य विष्णुर्जघानाशु मुष्टिनाद्भुतकर्मणा।<br>तावप्यतिबलोन्मत्तौ जघ्नतुर्मुष्टिना हरिम्॥ ५८ | सूतजी बोले— ऐसा कहकर वे दोनों महाबाहु दैत्य युद्ध करनेको तत्पर हो गये। तब वहाँ अवसर देखकर ज्यों ही विचित्रकर्मा विष्णुने उन दोनोंपर मुष्टिसे प्रहार किया, त्यों ही उन दोनों बलोन्मत्त दैत्योंने भी विष्णुपर मुष्टिप्रहार किया॥ ५७-५८॥ |
| एवं परस्परं जातं युद्धं परमदारुणम्।<br>युध्यमानौ महावीर्यौ दृष्ट्वा नारायणस्तदा॥ ५९<br>अपश्यत्सम्मुखं देव्याः कृत्वा दीनां दृशं हरिः। | इस प्रकार उनमें परस्पर महाभयंकर युद्ध होने लगा। उन दोनों महाबलशाली दानवोंको युद्धरत देखकर नारायण श्रीहरिने दीन दृष्टिसे भगवतीकी ओर देखा॥ ५९ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>तं वीक्ष्य तादृशं विष्णुं करुणारससंयुतम्॥ ६०<br>जहासातीव ताम्राक्षी वीक्षमाणा तदासुरौ।<br>तौ जघान कटाक्षैश्च कामबाणैरिवापरैः॥ ६१<br>मन्दस्मितयुतैः कामं प्रेमभावयुतैरनु।<br>दृष्ट्वा मुमुहतुः पापौ देव्या वक्रवलोकनम्॥ ६२ | सूतजी बोले— विष्णुकी ऐसी करुणाजनक दीन दशा देखकर अरुण नेत्रोंवाली भगवती उन दोनों दैत्योंकी ओर देखकर हँसने लगीं और उन्होंने दूसरे कामबाणोंके समान, मन्द मुसकानयुक्त तथा प्रेमभावसे भरे अपने कटाक्षोंसे उनपर प्रहार किया। इस प्रकार देवीके कटाक्षको देखकर वे पापी मधु-कैटभ अत्यन्त मोहित हो गये। वे कामान्ध दानव अपने ऊपर भगवतीकी विशेष अनुकम्पा जानकर |