भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 123
११४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९
कृताञ्जलिरमेयात्मा तां च तुष्टाव योगवित्।<br>विनाशार्थं तयोस्तत्र वरदां भुवनेश्वरीम्॥ ३९अनन्त भगवान् विष्णु उन दोनों दैत्योंके विनाशके लिये हाथ जोड़कर वरप्रदायिनी भगवती ‘भुवनेश्वरी’ की स्तुति करने लगे॥ ३८-३९॥
विष्णुरुवाच<br>नमो देवि महामाये सृष्टिसंहारकारिणि।<br>अनादिनिधने चण्डि भुक्तिमुक्तिप्रदे शिवे॥ ४०विष्णु बोले—हे देवि! हे महामाये! हे सृष्टि-संहारकारिणि! हे आदि-अन्तरहित! हे चण्डि! हे भुक्तिमुक्ति-प्रदायिनी शिवे! आपको नमस्कार है॥ ४०॥
न ते रूपं विजानामि सगुणं निर्गुणं तथा।<br>चरित्राणि कुतो देवि संख्यातीतानि यानि ते॥ ४१हे देवि! मैं आपके सगुण तथा निर्गुण रूपको नहीं जानता, फिर आपके जो असंख्य अद्भुत चरित्र हैं, उन्हें कैसे जान पाऊँगा? मैंने आपके अत्यन्त दुर्घट प्रभावको आज जाना है जबकि मैं आपके द्वारा प्रेरित योगनिद्रामें विलीन होकर अचेत हो गया था॥ ४१-४२॥
अनुभूतो मया तेऽद्य प्रभावश्चातिदुर्घटना।<br>यदहं निद्रया लीनः सञ्जातोऽस्मि विचेतनः॥ ४२
ब्रह्मणा चातियत्नेन बोधितोऽपि पुनः पुनः।<br>न प्रबुद्धः सर्वथाहं सङ्कोचितषडिन्द्रियः॥ ४३ब्रह्माने मुझे बड़े यत्नसे बार-बार जगाया था, किंतु मैं अपनी छहों इन्द्रियोंके संकुचित होनेके कारण जाग न सका॥ ४३॥
अचेतनत्वं सम्प्राप्तः प्रभावात्तव चाम्बिके।<br>त्वया मुक्तः प्रबुद्धोऽहं युद्धं च बहुधा कृतम्॥ ४४हे अम्बिके! उस समय मैं आपके प्रभावसे अचेत हो गया था। जब आपने अपना वह प्रभाव हटा लिया तब मैं जगा और मैंने उन दानवोंके साथ अनेक प्रकारसे युद्ध किया। उस युद्धमें मैं तो थक गया, किंतु वे नहीं थके; क्योंकि उन्हें आपका वरदान प्राप्त था। जब वे मदोन्मत्त दानव ब्रह्माजीको मारने दौड़े, तब मैंने भी पुनः द्वन्द्व युद्धके लिये उनका आह्वान किया। हे मानप्रदायिनि! उस समय मैंने उनके साथ महासागरमें घोर युद्ध किया॥ ४४-४६॥
श्रान्तोऽहं न च तौ श्रान्तौ त्वया दत्तवरौ वरौ।<br>ब्रह्माणं हन्तुमायाताै दानवौ मदगर्वितौ॥ ४५
आहूतौ च मया कामं द्वन्द्वयुद्धाय मानदे।<br>कृतं युद्धं महाघोरं मया ताभ्यां महार्णवे॥ ४६
मरणे वरदानं ते ततो ज्ञातं महाद्भुतम्।<br>ज्ञात्वाहं शरणं प्राप्तस्त्वामद्य शरणप्रदाम्॥ ४७बादमें मुझे ज्ञात हुआ कि आपने उन्हें इच्छामरणका अद्भुत वरदान दिया है। यह जानकर आज मैं शरणदायिनी आपकी शरणमें आया हूँ॥ ४७॥
साहाय्यं कुरु मे मातः खिन्नोऽहं युद्धकर्मणा।<br>दृप्तौ तौ वरदानेन तव देवार्तिनाशने॥ ४८अतएव हे माता! अब मेरी सहायता आप ही करें; क्योंकि मैं युद्ध करते-करते बहुत ही खिन्न हो गया हूँ। हे देवताओंकी पीड़ा हरनेवाली! आपके वरदानसे दोनों दानव मदोन्मत्त हो गये हैं॥ ४८॥
हन्तुं मामुद्यतौ पापौ किं करोमि क्व यामि च।<br>इत्युक्ता सा तदा देवी स्मितपूर्वमुवाच ह॥ ४९वे दोनों पापी दैत्य मुझे मार डालना चाहते हैं। अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? प्रणाम करते हुए उन जगन्नाथ सनातन वासुदेव विष्णुके ऐसा कहनेपर मुसकराती हुई उन देवीने उनसे कहा—
प्रणमन्तं जगन्नाथं वासुदेवं सनातनम्।<br>देवदेव हरे विष्णो कुरु युद्धं पुनः स्वयम्॥ ५०हे देवदेव! हे हरे! हे विष्णो! आप पुनः उनसे युद्ध कीजिये॥ ४९-५०॥
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