देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 122, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० ९ ] | प्रथम स्कन्ध | ११३ | | :--- | :--- |
| हरिरुवाच | विष्णु बोले—यह सनातनधर्म है कि थके हुए, डरे हुए, शस्त्र त्यागे हुए, गिरे हुए एवं बालकपर वीर लोग प्रहार नहीं करते॥ २६॥ | | श्रान्ते भीते त्यक्तशस्त्रे पतिते बालके तथा।<br>प्रहरन्ति न वीरास्ते धर्म एष सनातनः॥ २६ | | | पञ्चवर्षसहस्त्राणि कृतं युद्धं मया त्विह।<br>एकोऽहं भ्रातरौ वां च बलिनौ सदृशौ तथा॥ २७ | मैंने तो यहाँ पाँच हजार वर्षोंतक युद्ध किया। मैं अकेला हूँ और तुम दोनों भाई समान बलवाले वीर हो और दोनों बीच-बीचमें बारी-बारीसे विश्राम भी करते रहे हो। अब मुझे भी थोड़ा विश्राम कर लेने दो। तत्पश्चात् मैं पुनः लडूँगा, इसमें सन्देह नहीं है॥ २७-२८॥ | | कृतं विश्रमणं मध्ये युवाभ्यां च पुनः पुनः।<br>तथा विश्रमणं कृत्वा युध्येऽहं नात्र संशयः॥ २८ | | | तिष्ठतं हि युवां तावद् बलवन्तौ मदोत्कटौ।<br>विश्रम्याहं करिष्यामि युद्धं वा न्यायमार्गतः॥ २९ | बली एवं मदोन्मत्त तुम दोनों भी कुछ विश्राम कर लो, तब मैं विश्राम करके न्यायधर्मानुसार युद्ध करूँगा॥ २९॥ | | सूत उवाच | सूतजी बोले—भगवान् विष्णुकी बात सुनकर दोनों दानव भी युद्ध करनेकी इच्छासे कुछ दूर जाकर विश्राम करने लगे। उन्हें बहुत दूर बैठे देखकर चतुर्भुज भगवान् विष्णु उनके मरनेका उपाय सोचने लगे॥ ३०-३१॥ | | इति श्रुत्वा वचस्तस्य विश्रब्धौ दानवोत्तमौ।<br>संस्थितौ दूरतस्तत्र संग्रामे कृतनिश्चयौ॥ ३० | | | अतिदूरे च तौ दृष्ट्वा वासुदेवश्चतुर्भुजः।<br>दध्यौ च मनसा तत्र कारणं मरणे तयोः॥ ३१ | | | चिन्तनाज्ज्ञानमुत्पन्नं देवीदत्तवरावुभौ।<br>कामं वाञ्छितमरणौ न मम्लतुरतस्त्विमौ॥ ३२ | ध्यानकी अवस्थामें होकर विचार करनेपर उन्हें ज्ञात हो गया कि इन दोनोंको देवीके द्वारा इच्छामृत्युका वरदान प्राप्त है, इसी कारण ये थकते नहीं॥ ३२॥ | | वृथा मया कृतं युद्धं श्रमोऽयं मे वृथा गतः।<br>करोमि च कथं युद्धमेवं ज्ञात्वा विनिश्चयम्॥ ३३ | वे सोचने लगे कि मैंने व्यर्थ ही युद्ध किया, मेरा सब परिश्रम व्यर्थ गया। इस (वरदानकी) बातको जानकर भी अब मैं कैसे युद्ध करूँ?॥ ३३॥ | | अकृते च तथा युद्धे कथमेतौ गमिष्यतः।<br>विनाशं दुःखदौ नित्यं दानवौ वरदर्पितौ॥ ३४ | यदि युद्ध न भी करूँ तो भी ये दैत्य यहाँसे हटेंगे कैसे? यदि इनका विनाश न होगा तो वरप्राप्त दोनों दुर्धर्ष दैत्य सबको दुःख देते रहेंगे॥ ३४॥ | | भगवत्या वरो दत्तस्तया सोऽपि च दुर्घटः।<br>मरणं चेच्छया कामं दुःखितोऽपि न वाञ्छति॥ ३५ | देवीने जो वरदान इन्हें दिया है, वह भी अत्यन्त कठिन है। अत्यन्त दुःखी, रोगी और दीन-हीन प्राणी भी स्वेच्छाया कभी नहीं मरना चाहता, तब भला वे दोनों मदोन्मत्त दैत्य क्यों मरना चाहेंगे?॥ ३५-३६॥ | | रोगग्रस्तोऽपि दीनोऽपि न मुमूर्षति कश्चन।<br>कथं चेमौ मदोन्मत्तौ मर्तुकामौ भविष्यतः॥ ३६ | | | नन्वद्य शरणं यामि विद्यां शक्तिं सुकामदाम्।<br>विना तया न सिध्यन्ति कामाः सम्यक्प्रसन्नया॥ ३७ | अतएव अब मैं सब चिन्ता छोड़कर उन आदिशक्ति भगवती विद्यादेवीकी शरणमें जाऊँ, जो सबकी मनोकामनाएँ सिद्ध करनेवाली हैं; क्योंकि बिना उनके प्रसन्न हुए कोई कामनाएँ पूर्ण नहीं होतीं॥ ३७॥ | | एवं सञ्चिन्त्यमानस्तु गगने संस्थितां शिवाम्।<br>अपश्यद्भगवाग्विष्णुर्योगनिद्रां मनोहराम्॥ ३८ | ऐसा मनमें विचार करते ही भगवान् विष्णुने आकाशमें स्थित परम सुन्दर स्वरूपवाली योगनिद्रा भगवती ‘शिवा’ को देखा। उन्हें देखते ही योगेश्वर |