भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 126
अ० ९ ]प्रथम स्कन्ध११७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हरे योऽयं वरो दत्तस्त्वया पूर्वं जनार्दन।<br>सत्यवागसि देवेश देहि तं वाञ्छितं वरम्॥ ७५हम-लोगोंको पहले जो वरदान देनेको कहा था, यदि आप सत्यवादी हैं तो पहले उस वांछित वरको प्रदान कीजिये॥ ७४-७५॥
निर्जले विपुले देशे हनस्व मधुसूदन।<br>वध्यावावां तु भवतः सत्यवाग्भव माधव॥ ७६हे मधुसूदन! आप हमें किसी निर्जल प्रदेशकी सुविस्तृत भूमिपर मारिये तभी हम आपसे मारे जा सकेंगे, अन्यथा नहीं। अतः हे माधव अब आप सत्यवादी बनिये॥ ७६॥
स्मृत्वा चक्रं तदा विष्णुस्तावुवाच हसन्हरिः।<br>हन्म्यद्य वां महाभागौ निर्जले विपुले स्थले॥ ७७तब भगवान् विष्णुने अपने सुदर्शन चक्रका स्मरण करके उन दानवोंसे हँसते हुए कहा—'हे महाभागो! [तुम्हारे कथनानुसार] निर्जल तथा सुविस्तृत भूमिपर ही मैं आज तुम दोनोंको मारूँगा'॥ ७७॥
इत्युक्त्वा देवदेवेश ऊरू कृत्वातिविस्तरौ।<br>दर्शयामास तौ तत्र निर्जलं च जलोपरि॥ ७८<br><br>नास्त्यत्र दानवौ वारि शिरसी मुञ्चतामिह।<br>सत्यवागहमद्यैव भविष्यामि च वां तथा॥ ७९ऐसा कहकर देवताओंके आराध्य भगवान् विष्णुने अपनी दोनों जाँघोंको सुविस्तृत करके जलके ऊपर ही स्थल दिखा दिया और उनसे कहा—'दैत्यो! [देखो,] यहाँ जल नहीं है, पृथ्वी है। अतः यहींपर तुम दोनों अपना सिर रखो। ऐसा करनेसे ही आज हम और तुम दोनों सत्यवादी सिद्ध होंगे'॥ ७८-७९॥
तदाकर्ण्य वचस्तथ्यं विचिन्त्य मनसा च तौ।<br>वर्धयामासतुर्देहं योजनानां सहस्रकम्॥ ८०उस समय विष्णुका तथ्यपूर्ण वचन सुनकर तथा अपने मनमें विचार करके उन दोनों दैत्योंने अपना शरीर बढ़ाकर हजारों योजन लम्बा-चौड़ा कर लिया॥ ८०॥
भगवान्द्विगुणं चक्रे जघनं विस्मितौ तदा।<br>शीर्षे सन्दधतां तत्र जघने परमाद्भुते॥ ८१<br><br>रथांगेन तदा छिन्ने विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>जघनोपरि वेगेन प्रकृष्टे शिरसी तयोः॥ ८२तब भगवान् विष्णुने भी अपनी दोनों जाँघोंको बढ़ाकर उससे भी द्विगुणित कर दिया। यह देखकर वे दोनों दैत्य बड़े विस्मयमें पड़ गये, [परंतु अपनी बात सत्य प्रमाणित करनेके लिये] उन्होंने अपने-अपने मस्तक उस अत्यन्त अद्भुत जंघेपर रख दिये। उसी समय प्रतापी भगवान् विष्णुने अपने सुदर्शन चक्रसे जंघेपर स्थित उनके विशाल सिरोंको वेगपूर्वक धड़से अलग कर दिया॥ ८१-८२॥
गतप्राणौ तदा जातौ दानवौ मधुकैटभौ।<br>सागरः सकलो व्याप्तस्तदा वै मेदसा तयोः॥ ८३<br><br>मेदिनीति ततो जातं नाम पृथ्व्याः समन्ततः।<br>अभक्ष्या मृत्तिका तेन कारणेन मुनीश्वराः॥ ८४जब दोनों दैत्य मधु और कैटभ मर गये, तब उन्हींकी मेद (चर्बी)-से सम्पूर्ण सागर पट गया। हे मुनीश्वरो! तभीसे पृथ्वीका नाम 'मेदिनी' पड़ गया और इसीलिये मृत्तिका भी अभक्ष्य मानी जाने लगी॥ ८३-८४॥
इति वः कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽस्मि सुनिश्चितम्।<br>महाविद्या महामाया सेवनीया सदा बुधैः॥ ८५आपलोगोंने जो प्रश्न किया था, उसका ठीक-ठीक उत्तर मैंने दे दिया। बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये कि वे महामाया महाविद्याकी सर्वदा उपासना करते