देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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११८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०
| आराध्या परमा शक्तिः सर्वैरपि सुरासुरैः।<br>नातः परतरं किञ्चिदधिकं भुवनत्रये॥ ८६ | रहें; क्योंकि वे पराशक्ति ही समस्त देव-दानवोंद्वारा आराध्य हैं। उनसे बढ़कर कोई दूसरा देवता तीनों लोकोंमें नहीं है॥ ८५-८६॥ |
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| सत्यं सत्यं पुनः सत्यं वेदशास्त्रार्थनिर्णयः।<br>पूजनीया परा शक्तिर्निर्गुणा सगुणाथवा॥ ८७ | यह बात सर्वदा सत्य है एवं वेदों तथा शास्त्रोंका निष्कर्ष है कि सगुण अथवा निर्गुणरूपमें सर्वदा उस पराशक्तिका ही पूजन करते रहना चाहिये॥ ८७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे<br>हरिकृतमधुकैटभवधवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
अथ दशमोऽध्यायः
व्यासजीकी तपस्या और वर-प्राप्ति
| ऋषय ऊचुः | |
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| सूत पूर्वं त्वया प्रोक्तं व्यासेनामिततेजसा।<br>कृत्वा पुराणमखिलं शुकायाध्यापितं शुभम्॥ १ | ऋषिगण बोले— हे सूतजी! आपने हमें पहले ही बतला दिया है कि असीम तेजवाले व्यासजीने कल्याणकारी समस्त पुराणोंकी रचना करके उन्हें शुकदेवजीको पढ़ाया॥ १॥ |
| व्यासेन तु तपस्तप्त्वा कथमुत्पादितः शुकः।<br>विस्तरं ब्रूहि सकलं यच्छ्रुतं कृष्णतस्त्वया॥ २ | व्यासजीने घोर तप करके शुकदेवजीको किस प्रकार पुत्ररूपमें प्राप्त किया? व्यासजीके मुखसे आपने जो कुछ सुना है, वह सब हमसे विस्तारपूर्वक कहिये॥ २॥ |
| सूत उवाच | |
| प्रवक्ष्यामि शुकोत्पत्तिं व्यासात्सत्यवतीसुतात्।<br>यथोत्पन्नः शुकः साक्षाद्योगिनां प्रवरो मुनिः॥ ३ | सूतजी बोले— सत्यवतीपुत्र व्यासजीसे जिस प्रकार योगिजनोंमें श्रेष्ठ साक्षात् मुनिस्वरूप शुकदेवजी उत्पन्न हुए, उत्पत्तिके उस इतिहासको मैं आपलोगोंको बता रहा हूँ॥ ३॥ |
| मेरुशृङ्गे महारम्ये व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>तपश्चचार सोऽत्युग्रं पुत्रार्थं कृतनिश्चयः॥ ४ | सत्यवतीके पुत्र महर्षि व्यास पुत्र-प्राप्तिके लिये दृढ़ संकल्पकर अत्यन्त मनोहर सुमेरुपर्वतके शिखरपर कठोर तपस्या करने लगे॥ ४॥ |
| जपन्नेकाक्षरं मन्त्रं वाग्बीजं नारदाच्छ्रुतम्।<br>ध्यायन्परां महामायां पुत्रकामस्तपोनिधिः॥ ५<br><br>अग्नेर्भूमेस्तथा वायोरन्तरिक्षस्य चाप्ययम्।<br>वीर्येण संमितः पुत्रो मम भूयादिति स्म ह॥ ६ | नारदजीसे सुने गये एकाक्षर वाग्बीज मन्त्रका जप करते हुए तपोनिधि व्यासजी पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे परात्परा महामायामें अपना ध्यान केन्द्रित किये हुए मन-ही-मन सोच रहे थे कि अग्नि, भूमि, वायु एवं आकाश—इनकी शक्तिसे सम्पन्न पुत्रकी मुझे प्राप्ति हो॥ ५-६॥ |
| अतिष्ठत्स गताहारः शतसंवत्सरं प्रभुः।<br>आराधयन्महादेवं तथैव च सदाशिवाम्॥ ७ | इस प्रकार प्रभुतासम्पन्न वे व्यासजी निराहार रहते हुए सौ वर्षोंतक शंकर एवं सदाशिवा भगवतीकी आराधनामें लीन रहे॥ ७॥ |