भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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११८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०

आराध्या परमा शक्तिः सर्वैरपि सुरासुरैः।<br>नातः परतरं किञ्चिदधिकं भुवनत्रये॥ ८६रहें; क्योंकि वे पराशक्ति ही समस्त देव-दानवोंद्वारा आराध्य हैं। उनसे बढ़कर कोई दूसरा देवता तीनों लोकोंमें नहीं है॥ ८५-८६॥
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं वेदशास्त्रार्थनिर्णयः।<br>पूजनीया परा शक्तिर्निर्गुणा सगुणाथवा॥ ८७यह बात सर्वदा सत्य है एवं वेदों तथा शास्त्रोंका निष्कर्ष है कि सगुण अथवा निर्गुणरूपमें सर्वदा उस पराशक्तिका ही पूजन करते रहना चाहिये॥ ८७॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे<br>हरिकृतमधुकैटभवधवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥


अथ दशमोऽध्यायः

व्यासजीकी तपस्या और वर-प्राप्ति

ऋषय ऊचुः
सूत पूर्वं त्वया प्रोक्तं व्यासेनामिततेजसा।<br>कृत्वा पुराणमखिलं शुकायाध्यापितं शुभम्॥ १ऋषिगण बोले— हे सूतजी! आपने हमें पहले ही बतला दिया है कि असीम तेजवाले व्यासजीने कल्याणकारी समस्त पुराणोंकी रचना करके उन्हें शुकदेवजीको पढ़ाया॥ १॥
व्यासेन तु तपस्तप्त्वा कथमुत्पादितः शुकः।<br>विस्तरं ब्रूहि सकलं यच्छ्रुतं कृष्णतस्त्वया॥ २व्यासजीने घोर तप करके शुकदेवजीको किस प्रकार पुत्ररूपमें प्राप्त किया? व्यासजीके मुखसे आपने जो कुछ सुना है, वह सब हमसे विस्तारपूर्वक कहिये॥ २॥
सूत उवाच
प्रवक्ष्यामि शुकोत्पत्तिं व्यासात्सत्यवतीसुतात्।<br>यथोत्पन्नः शुकः साक्षाद्योगिनां प्रवरो मुनिः॥ ३सूतजी बोले— सत्यवतीपुत्र व्यासजीसे जिस प्रकार योगिजनोंमें श्रेष्ठ साक्षात् मुनिस्वरूप शुकदेवजी उत्पन्न हुए, उत्पत्तिके उस इतिहासको मैं आपलोगोंको बता रहा हूँ॥ ३॥
मेरुशृङ्गे महारम्ये व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>तपश्चचार सोऽत्युग्रं पुत्रार्थं कृतनिश्चयः॥ ४सत्यवतीके पुत्र महर्षि व्यास पुत्र-प्राप्तिके लिये दृढ़ संकल्पकर अत्यन्त मनोहर सुमेरुपर्वतके शिखरपर कठोर तपस्या करने लगे॥ ४॥
जपन्नेकाक्षरं मन्त्रं वाग्बीजं नारदाच्छ्रुतम्।<br>ध्यायन्परां महामायां पुत्रकामस्तपोनिधिः॥ ५<br><br>अग्नेर्भूमेस्तथा वायोरन्तरिक्षस्य चाप्ययम्।<br>वीर्येण संमितः पुत्रो मम भूयादिति स्म ह॥ ६नारदजीसे सुने गये एकाक्षर वाग्बीज मन्त्रका जप करते हुए तपोनिधि व्यासजी पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे परात्परा महामायामें अपना ध्यान केन्द्रित किये हुए मन-ही-मन सोच रहे थे कि अग्नि, भूमि, वायु एवं आकाश—इनकी शक्तिसे सम्पन्न पुत्रकी मुझे प्राप्ति हो॥ ५-६॥
अतिष्ठत्स गताहारः शतसंवत्सरं प्रभुः।<br>आराधयन्महादेवं तथैव च सदाशिवाम्॥ ७इस प्रकार प्रभुतासम्पन्न वे व्यासजी निराहार रहते हुए सौ वर्षोंतक शंकर एवं सदाशिवा भगवतीकी आराधनामें लीन रहे॥ ७॥