देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १० ] प्रथम स्कन्ध ११ ९
| शक्तिः सर्वत्र पूज्येति विचार्य च पुनः पुनः।<br>अशक्तो निन्द्यते लोके शक्तस्तु परिपूज्यते॥ ८<br><br>यत्र पर्वतशृङ्गे वै कर्णिकारवनाद्भुते।<br>क्रीडन्ति देवताः सर्वे मुनयश्च तपोऽधिकाः॥ ९<br><br>आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विनौ तथा।<br>वसन्ति मुनयो यत्र ये चान्ये ब्रह्मवित्तमाः॥ १०<br><br>तत्र हेमगिरेः शृङ्गे संगीतध्वनिनादिते।<br>तपश्चचार धर्मात्मा व्यासः सत्यवतीसुतः॥ ११ | अनेकशः विचार करते हुए महर्षि व्यास इस निष्कर्षपर पहुँचे कि शक्ति ही सर्वत्र पूजनीया है। निर्बल प्राणी लोकमें निन्दाका पात्र होता है और शक्तिशालीकी पूजा की जाती है॥ ८॥<br><br>जहाँ पर्वत-शिखरपर कर्णिकार पुष्पके अद्भुत वनमें देवता एवं महातपस्वी मुनिवृन्द विहार करते हैं; जहाँ सूर्य, वसु, रुद्र, पवन, अश्विनीकुमारद्वय एवं ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ अन्य मुनिजन निवास करते हैं; मधुर संगीतकी ध्वनिसे मुखरित उसी सुमेरुपर्वतकी चोटीपर सत्यवतीनन्दन धर्मात्मा व्यासजीने तपस्या की॥ ९—११॥ | | ततोऽस्य तेजसा व्याप्तं विश्वं सर्वं चराचरम्।<br>अग्निवर्णा जटा जाता पाराशर्यस्य धीमतः॥ १२ | उनके इस तपश्चरणके प्रभावसे समग्र चराचर जगत् व्याप्त हो गया और महामेधासम्पन्न पराशरपुत्र व्यासजीकी जटा अग्निवर्ण हो गयी॥ १२॥ | | ततोऽस्य तेज आलक्ष्य भयमाप शचीपतिः।<br>तुरासाहं तदा दृष्ट्वा भयत्रस्तं श्रमातुरम्॥ १३<br><br>उवाच भगवान् रुद्रो मघवन्तं तथास्थितम्। | तदनन्तर व्यासजीका यह तेज देखकर इन्द्र भयभीत हो गये। तब इन्द्रको भयाक्रान्त तथा व्याकुल देखकर भगवान् शंकरजी उनसे कहने लगे—॥ १३ १/२॥ | | शङ्कर उवाच<br>कथमिन्द्राद्य भीतोऽसि किं दुःखं ते सुरेश्वर॥ १४<br><br>अमर्षो नैव कर्तव्यस्तापसेषु कदाचन।<br>तपश्चरन्ति मुनयो ज्ञात्वा मां शक्तिसंयुतम्॥ १५<br><br>न त्वेतेऽहितमिच्छन्ति तापसाः सर्वथैव हि।<br>इत्युक्तवचनः शक्रस्तमुवाच वृषध्वजम्॥ १६<br><br>कस्मात्तपस्यति व्यासः कोऽर्थस्तस्य मनोगतः। | शंकरजी बोले—हे सुरेश्वर! आपको क्या दुःख है? हे इन्द्र! आज आप इस तरह भयग्रस्त क्यों हैं? तपस्वियोंसे कभी भी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये; क्योंकि मुनिगण मुझे शक्तिसम्पन्न जानकर ही तपस्या करते हैं। ये तपस्वी मुनिलोग कभी भी किसीका अपकार नहीं चाहते हैं। शंकरजीके ऐसा कहनेपर इन्द्र उनसे बोले—व्यासजी ऐसा तप किसलिये कर रहे हैं, उनकी क्या मनोकामना है?॥ १४—१६ १/२॥ | | शिव उवाच<br>पाराशर्यस्तु पुत्रार्थी तपश्चरति दुश्चरम्॥ १७<br><br>पूर्णवर्षशतं जातं ददाम्यद्य सुतं शुभम्। | शिवजी बोले—व्यासजी पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे यह कठोर तप कर रहे हैं। इन्हें तपस्या करते हुए पूरे एक सौ वर्ष हो चुके हैं, अतः मैं इन्हें कल्याणकारी पुत्र प्रदान करूँगा॥ १७ १/२॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा वासवं रुद्रो दयया मुदिताननः॥ १८<br><br>गत्वा ऋषिसमीपं तु तमुवाच जगद्गुरुः।<br>उत्तिष्ठ वासवीपुत्र पुत्रस्ते भविता शुभः॥ १९<br><br>सर्वतेजोमयो ज्ञानी कीर्तिकर्ता तवानघ।<br>अखिलस्य जनस्यात्र वल्लभस्ते सुतः सदा॥ २०<br><br>भविष्यति गुणैः पूर्णः सात्त्विकैः सत्यविक्रमः। | सूतजी बोले—दयाभावसे युक्त प्रसन्न मुखवाले जगद्गुरु भगवान् शंकर इन्द्रसे ऐसा कहकर मुनि व्यासजीके पास जाकर बोले—हे वासवीपुत्र! उठो, तुम्हें कल्याणकारी पुत्र अवश्य प्राप्त होगा। हे निष्पाप! तुम्हारा वह पुत्र सभी प्रकारके तेजोंसे सम्पन्न, ज्ञानवान्, यशस्वी और सभी लोगोंका सदा अतिशय प्रिय, समस्त सात्त्विक गुणोंसे सम्पन्न तथा सत्यरूपी पराक्रमसे युक्त होगा॥ १८—२० १/२॥ |