देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 129, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 129
| १२० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
|---|
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| तदाकर्ण्य वचः श्लक्ष्णं कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥ २१<br><br>शूलपाणिं नमस्कृत्य जगामाश्रममात्मनः ।<br>स गत्वाश्रममेवाशु बहुवर्षश्रमातुरः ॥ २२<br><br>अरणीसहितं गुह्यं मन्थाग्निं चिकीर्षया ।<br>मन्थनं कुर्वतस्तस्य चित्ते चिन्ताभरस्तदा ॥ २३ | तब शूलपाणि शंकरजीका मधुर वचन सुनकर उन्हें प्रणामकर द्वैपायन व्यासजीने अपने आश्रमके लिये प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर कई वर्षोंतक घोर तप करनेके कारण अतिशय श्रान्त महर्षि व्यास अरणीमें समाहित अग्निको प्रकट करनेकी कामनासे अरणि-मन्थन करने लगे। मन्थन कर रहे व्यासजीके मनमें उस समय महान् चिन्ता हो रही थी॥ २१—२३॥ |
| प्रादुर्बभूव सहसा सुतोत्पत्तौ महात्मनः ।<br>मन्थानारणि संयोगान्मन्थनाच्च समुद्भवः ॥ २४<br><br>पावकस्य यथा तद्वत्कथं मे स्यात्सुतोद्भवः ।<br>पुत्रारणिस्तु या ख्याता सा ममाद्य न विद्यते ॥ २५<br><br>तरुणी रूपसम्पन्ना कुलोत्पन्ना पतिव्रता ।<br>कथं करोमि कान्तां च पादयोः शृङ्खलासमाम् ॥ २६<br><br>पुत्रोत्पादनदक्षां च पातिव्रत्ये सदा स्थिताम् ।<br>पतिव्रतापि दक्षापि रूपवत्यपि कामिनी ॥ २७<br><br>सदा बन्धनरूपा च स्वेच्छासुखविधायिनी ।<br>शिवोऽपि वर्तते नित्यं कामिनीपाशसंयुतः ॥ २८ | मन्थन तथा अरणिके पारस्परिक संयोगसे प्रकटित अग्निको देखकर व्यासजीके मनमें अचानक पुत्रोत्पत्तिका विचार आया कि अरणि-मन्थनजनित अग्निकी भाँति मुझे पुत्र कैसे उत्पन्न हो? क्योंकि पुत्र प्रदान करनेवाली अरणी-रूपी वह रूपवती, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा पतिव्रता युवती स्त्री मेरे पास है नहीं, साथ ही पैरोंकी शृंखलाके समान स्त्रीको मैं कैसे अंगीकार करूँ? पुत्र उत्पन्न करनेमें कुशल और पातिव्रत्य धर्ममें सदा तत्पर रहनेवाली पत्नी मुझे कैसे मिले? पतिपरायणा, निपुण, रूपवती—कैसी भी स्त्री हो; वह सदा बन्धनकी कारण ही बनी रहती है। स्त्री सदा अपनी इच्छाके अनुसार सुख प्राप्त करना चाहती है। शंकरजी भी नित्य स्त्रीके मोहपाशमें फँसे हुए रहते हैं। अतः अब मैं अत्यन्त विषम गृहस्थाश्रम-धर्मको किस प्रकार अंगीकार करूँ?॥ २४—२८<sup>१</sup>॥ |
| कथं करोम्यहं चात्र दुर्घटं च गृहाश्रमम् ।<br>एवं चिन्तयतस्तस्य घृताची दिव्यरूपिणी ॥ २९<br><br>प्राप्ता दृष्टिपथं तत्र समीपे गगने स्थिता ।<br>तां दृष्ट्वा चञ्चलापाङ्गीं समीपस्थां वराप्सराम् ॥ ३०<br><br>पञ्चबाणपरीताङ्गस्तूर्णंमासीद् धृतव्रतः ।<br>चिन्तयामास च तदा किं करोम्यद्य संकटे ॥ ३१ | व्यासजी ऐसा विचार कर ही रहे थे कि आकाशमें समीपमें ही स्थित घृताची नामक अप्सरा उन्हें दृष्टि-गोचर हुई। चंचल कटाक्षोंवाली उस श्रेष्ठ अप्सराको पासमें ही स्थित देखकर कठोर नियम-संयम धारण करनेवाले व्यासजी शीघ्र ही कामबाणसे आहत अंगोंवाले हो गये और सोचने लगे कि अब इस विषम संकटके समय मैं क्या करूँ?॥ २९—३१॥ |
| धर्मस्य पुरतः प्राप्ते कामभावे दुरासदे ।<br>अङ्गीकरोमि यद्येनां वञ्चनार्थमिहागताम् ॥ ३२<br><br>हसिष्यन्ति महात्मानस्तापसा मां तु विह्वलम् ।<br>तपस्तप्त्वा महाघोरं पूर्णवर्षशतं त्विह ॥ ३३ | धर्मके समक्ष इस दुर्जय कामवासनाके वशीभूत होकर यदि मैं छलनेके लिये यहाँ उपस्थित हुई इस अप्सराको स्वीकार करता हूँ, तब ऐसी स्थितिमें महात्मा तथा तपस्वीगण मुझ कामासक्तिसे विह्वलका यह उपहास करेंगे कि सौ वर्षोंतक कठिन तपस्या करनेके पश्चात् भी एक अप्सराको देखकर महातपस्वी |