देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 130, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 130
अ० ११ ] प्रथम स्कन्ध १२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दृष्ट्वाप्सरां च विवशः कथं जातो महातपाः।<br>कामं निन्दापि भवतु यदि स्यादतुलं सुखम्॥ ३४ | व्यास इतने विवश कैसे हो गये? और फिर यदि इसमें अतुलनीय सुख हो तो ऐसी निन्दा भी होती रहे। अर्थात् उसकी उपेक्षा भी की जा सकती है॥ ३२—३४॥ |
| गृहस्थाश्रमसम्भूतं सुखदं पुत्रकामदम्।<br>स्वर्गदं च तथा प्रोक्तं ज्ञानिनां मोक्षदं तथा॥ ३५<br><br>न भविष्यति तन्नूनमनया देवकन्यया।<br>नारदाच्च मया पूर्वं श्रुतमस्ति कथानकम्।<br>यथोर्वशीवशो राजा पराभूतः पुरूरवाः॥ ३६ | गृहस्थाश्रम पुत्र-प्राप्तिकी कामना पूर्ण करनेवाला, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा ज्ञानियोंको मोक्ष देनेवाला कहा गया है। किंतु वैसा सुख इस देवकन्यासे नहीं प्राप्त होगा। पूर्वकालमें मैंने नारदजीसे एक कथा सुनी थी जिसमें राजा पुरूरवा उर्वशीके वशीभूत होकर अत्यन्त संकटमें पड़ गये थे॥ ३५–३६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शिववरदानवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
# अथैकादशोऽध्यायः
### बुधके जन्मकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| **ऋषय ऊचुः**<br>कोऽसौ पुरूरवा राजा कोर्वशी देवकन्यका।<br>कथं कष्टं च सम्प्राप्तं तेन राज्ञा महात्मना॥ १ | **ऋषिगण बोले**—हे सूतजी! वे राजा पुरूरवा कौन थे तथा वह देवकन्या उर्वशी कौन थी? उस मनस्वी राजाने किस प्रकार संकट प्राप्त किया?॥ १॥ |
| सर्वं कथानकं ब्रूहि लोमहर्षणजाधुना।<br>श्रोतुकामा वयं सर्वे त्वन्मुखाब्जच्युतं रसम्॥ २ | हे लोमहर्षणतनय! आप इस समय पूरा कथानक विस्तारपूर्वक कहें। हम सभी लोग आपके मुखारविन्दसे निःसृत रसमयी वाणीको सुननेके इच्छुक हैं॥ २॥ |
| अमृतादपि मिष्टा ते वाणी सूत रसात्मिका।<br>न तृप्यामो वयं सर्वे सुधया च यथामराः॥ ३ | हे सूतजी! आपकी वाणी अमृतसे भी बढ़कर मधुर एवं रसमयी है। जिस प्रकार देवगण अमृत-पानसे कभी तृप्त नहीं होते, उसी प्रकार आपके कथा-श्रवणसे हम तृप्त नहीं होते॥ ३॥ |
| **सूत उवाच**<br>शृणुध्वं मुनयः सर्वे कथां दिव्यां मनोरमाम्।<br>वक्ष्याम्यहं यथाबुद्ध्या श्रुतां व्यासवरोत्तमात्॥ ४ | **सूतजी बोले**—हे मुनियो! अब आपलोग उस दिव्य तथा मनोहर कथाको सुनिये, जिसे मैंने परम श्रेष्ठ व्यासजीके मुखसे सुना है। मैं उसे अपनी बुद्धिके अनुसार वैसा ही कहूँगा॥ ४॥ |
| गुरोस्तु दयिता भार्या तारा नामेति विश्रुता।<br>रूपयौवनयुक्ता सा चार्वङ्गी मदविह्वला॥ ५ | सुरगुरु बृहस्पतिकी पत्नीका नाम 'तारा' था। वह रूप-यौवनसे सम्पन्न तथा सुन्दर अंगोंवाली थी॥ ५॥ |
| गतैकदा विधोर्धाम यजमानस्य भामिनी।<br>दृष्टा च शशिनात्यर्थं रूपयौवनशालिनी॥ ६<br><br>कामातुरस्तदा जातः शशी शशिमुखीं प्रति।<br>सापि वीक्ष्य विधुं कामं जाता मदनपीडिता॥ ७<br><br>तावन्योन्यं प्रेमयुक्तौ स्मरार्तौ च बभूवतुः।<br>तारा शशी मदोन्मत्तौ कामबाणप्रपीडितौ॥ ८ | एक बार वह सुन्दरी अपने यजमान चन्द्रमाके घर गयी। उस रूप तथा यौवनसे सम्पन्न चन्द्रमुखी कामिनीको देखते ही चन्द्रमा उसपर आसक्त हो गये। तारा भी चन्द्रमाको देखकर आसक्त हो गयी। इस प्रकार वे दोनों तारा तथा चन्द्रमा एक-दूसरेको देखकर प्रेमविभोर हो गये॥ ६—८॥ |