देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| १२२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| रेमाते मदमत्तौ तौ परस्परस्पृहान्वितौ।<br>दिनानि कतिचित्तत्र जातानि रममाणयोः ॥ ९<br><br>बृहस्पतिस्तु दुःखार्तस्तारामानयितुं गृहम्।<br>प्रेषयामास शिष्यं तु नायाता सा वशीकृता॥ १० | वे दोनों प्रेमोन्मत्त एक-दूसरेको चाहनेकी इच्छासे युक्त हो विहार करने लगे। इस प्रकार उनके कुछ दिन व्यतीत हुए। तब बृहस्पतिने ताराको घर लानेके लिये अपना एक शिष्य भेजा; परंतु वह न आ सकी॥ ९-१०॥ |
| पुनः पुनर्यदा शिष्यं परावर्तत चन्द्रमाः।<br>बृहस्पतिस्तदा क्रुद्धो जगाम स्वयमेव हि॥ ११ | जब चन्द्रमाने बृहस्पतिके शिष्यको कई बार लौटाया, तो वे क्रोधित होकर चन्द्रमाके पास स्वयं गये॥ ११॥ |
| गत्वा सोमगृहं तत्र वाचस्पतिरुदारधीः।<br>उवाच शशिनं क्रुद्धः स्मयमानं मदान्वितम्॥ १२<br><br>किं कृतं किल शीतांशो कर्म धर्मविगर्हितम्।<br>रक्षिता मम भार्येयं सुन्दरी केन हेतुना॥ १३ | चन्द्रमाके घर जाकर उदारचित्त बृहस्पतिने अभिमानके साथ मुसकराते हुए उस चन्द्रमासे कहा—हे चन्द्रमा! तुमने यह धर्मविरुद्ध कार्य क्यों किया और मेरी इस परम सुन्दरी पत्नीको अपने घरमें क्यों रख लिया?॥ १२-१३॥ |
| तव देव गुरुश्चाहं यजमानोऽसि सर्वथा।<br>गुरुभार्यां कथं मूढ भुक्ता किं रक्षिताथवा॥ १४ | हे देव! मैं तुम्हारा गुरु हूँ और तुम मेरे यजमान हो। तब हे मूर्ख! तुमने गुरुपत्नीको अपने घरमें क्यों रख लिया?॥ १४॥ |
| ब्रह्महा हेमहारी च सुरापो गुरुतल्पगः।<br>महापातकिनो ह्येते तत्संसर्गी च पञ्चमः॥ १५<br><br>महापातकयुक्तस्त्वं दुराचारोऽतिगर्हितः।<br>न देवसदनार्होऽसि यदि भुक्तेयमङ्गना॥ १६ | ब्रह्महत्या करनेवाला, सुवर्ण चुरानेवाला, मदिरापान करनेवाला, गुरुपत्नीगामी तथा पाँचवाँ इन पापियोंके साथ संसर्ग रखनेवाला—ये ‘महापातकी’ हैं। तुम महापापी, दुराचारी एवं अत्यन्त निन्दनीय हो। यदि तुमने मेरी पत्नीके साथ अनाचार किया है तो तुम देवलोकमें रहनेयोग्य नहीं हो॥ १५-१६॥ |
| मुञ्चेमामसितापाङ्गीं नयामि सदनं मम।<br>नोचेद्धक्ष्यामि दुष्टात्मन् गुरुदारापहारिणम्॥ १७ | हे दुष्टात्मन्! असितापांगी मेरी इस पत्नीको छोड़ दो जिससे मैं इसे अपने घर ले जाऊँ, अन्यथा गुरुपत्नीका अपहरण करनेवाले तुझको मैं शाप दे दूँगा॥ १७॥ |
| इत्येवं भाषमाणं तमुवाच रोहिणीपतिः।<br>गुरुं क्रोधसमायुक्तं कान्ताविरहदुःखितम्॥ १८ | इस प्रकार बोलते हुए स्त्रीविरहसे कातर तथा क्रोधाकुल देवगुरु बृहस्पतिसे रोहिणीपति चन्द्रमाने कहा॥ १८॥ |
| इन्दुरुवाच<br>क्रोधान्ते तु दुराराध्या ब्राह्मणाः क्रोधवर्जिताः।<br>पूजार्हा धर्मशास्त्रज्ञा वर्जनीयास्ततोऽन्यथा॥ १९ | **चन्द्रमा बोले—**क्रोधके कारण ब्राह्मण अपूजनीय होते हैं। क्रोधरहित तथा धर्मशास्त्रज्ञ विप्र पूजाके योग्य हैं और इन गुणोंसे हीन ब्राह्मण त्याज्य होते हैं॥ १९॥ |
| आगमिष्यति सा कामं गृहं ते वरवर्णिनी।<br>अत्रैव संस्थिता बाला का ते हानिरिहानघ॥ २०<br><br>इच्छया संस्थिता चात्र सुखकामार्थिनी हि सा।<br>दिनानि कतिचित्स्थित्वा स्वेच्छया चागमिष्यति॥ २१ | हे अनघ! वह सुन्दर स्त्री अपनी इच्छासे आपके घर चली जायगी और यदि कुछ दिन यहाँ ठहर भी गयी तो इससे आपकी क्या हानि है? अपनी इच्छासे ही वह यहाँ रहती है। सुखकी इच्छा रखनेवाली वह कुछ दिन यहाँ रहकर अपनी इच्छासे चली जायगी॥ २०-२१॥ |