देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 15, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| १४ | श्रीमद्देवीभागवत |
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| श्रुत्वैतत्तु महादेव्याः पुराणं परमाद्भुतम्।<br>कृतकृत्यो भवेन्मर्त्यो देव्याः प्रियतमो हि सः॥ | [ महर्षि व्यासने राजा जनमेजयसे कहा— ]<br>महादेवीका यह परम अद्भुत पुराण सुनकर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है और वह भगवतीका प्रियतम हो जाता है। हे | | मूलप्रकृतिरेवैषा यत्र तु प्रतिपाद्यते।<br>समं तेन पुराणं स्यात्कथमन्यन्नृपोत्तम॥ | नृपश्रेष्ठ! जिस देवीभागवतमें साक्षात् मूलप्रकृतिका ही प्रतिपादन किया गया है, उसके समान अन्य कोई पुराण भला कैसे हो सकता है? हे जनमेजय! जिस | | पाठे वेदसमं पुण्यं यस्य स्याज्जनमेजय।<br>पठितव्यं प्रयत्नेन तदेव विबुधोत्तमैः॥ | देवीभागवतपुराणका पाठ करनेसे वेद-पाठके समान पुण्य प्राप्त होता है, उसका पाठ श्रेष्ठ विद्वानोंको प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। [ श्रीसूतजी मुनियोंसे बोले— ] जो इस | | नित्यं यः शृणुयाद्भक्त्या देवीभागवतं परम्।<br>न तस्य दुर्लभं किञ्चित्कदाचित्क्वचिदस्ति हि॥ | श्रेष्ठ श्रीमद्देवीभागवतका नित्य भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, उसके लिये कुछ भी कहीं और कभी दुर्लभ नहीं है। | | अपुत्रो लभते पुत्रान्धनार्थी धनमाप्नुयात्।<br>विद्यार्थी प्राप्नुयाद्विद्यां कीर्तिमण्डितभूतलः॥ | इसके श्रवणसे पुत्रहीन व्यक्तिको पुत्र, धन चाहनेवालेको धन और विद्याके अभिलाषीको विद्याकी प्राप्ति हो जाती है, साथ ही सम्पूर्ण पृथ्वीलोकमें वह कीर्तिमान् हो जाता | | वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवन्ध्या च याङ्गना।<br>श्रवणादस्य तद्दोषान्निवर्तेत न संशयः॥ | है। जो स्त्री वन्ध्या, काकवन्ध्या अथवा मृतवन्ध्या हो; वह इस पुराणके श्रवणसे उस दोषसे मुक्त हो जाती है; इसमें सन्देह नहीं है। यह पुराण जिस घरमें विधिपूर्वक पूजित | | यद्गेहे पुस्तकं चैतत्पूजितं यदि तिष्ठति।<br>तद्गेहं न त्यजेन्नित्यं रमा चैव सरस्वती॥ | होकर स्थित रहता है, उस घरको लक्ष्मी तथा सरस्वती कभी नहीं छोड़तीं और वेताल, डाकिनी तथा राक्षस आदि | | नेक्षन्ते तत्र वेतालडाकिनीराक्षसादयः।<br>ज्वरितं तु नरं स्पृष्ट्वा पठेदेतत्समाहितः॥ | वहाँ झाँकतेतक नहीं। यदि ज्वरग्रस्त मनुष्यको स्पर्श करके एकाग्रचित्त होकर इस पुराणका पाठ किया जाय तो दाहक | | मण्डलान्नाशमाप्नोति ज्वरो दाहसमन्वितः।<br>शतावृत्त्यास्य पठनात्क्षयरोगो विनश्यति॥ | ज्वर उसके मण्डलको छोड़कर भाग जाता है। इसकी एक सौ आवृत्तिके पाठसे क्षयरोग समाप्त हो जाता है। जो मनुष्य | | प्रतिसन्ध्यं पठेद्यस्तु सन्ध्यां कृत्वा समाहितः।<br>एकैकमस्य चाध्यायं स नरो ज्ञानवान्भवेत्॥ | प्रत्येक सन्ध्याके अवसरपर दत्तचित्त होकर सन्ध्या-विधि सम्पन्न करके इस पुराणके एक-एक अध्यायका पाठ करता है, वह ज्ञानवान् हो जाता है। शारदीय नवरात्रमें परम भक्तिसे | | नवरात्रे पठेन्नित्यं शारदीयेऽतिभक्तितः।<br>तस्याम्बिका तु सन्तुष्टा ददातीच्छाधिकं फलम्॥ | इस पुराणका नित्य पाठ करना चाहिये। इससे जगदम्बा उस व्यक्तिपर प्रसन्न होकर उसकी अभिलाषासे भी अधिक फल प्रदान करती हैं। वैष्णव, शैव, सौर तथा गाणपत्यजनोंको | | वैष्णवैश्चैव शैवैश्च रमोमा प्रीयते सदा।<br>सौरैश्च गाणपत्यैश्च स्वेष्टशक्तेश्च तुष्टये॥ | अपने-अपने इष्टदेवकी शक्तिकी सन्तुष्टिके लिये चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ—इन मासोंके चारों नवरात्रोंमें इस पुराणका प्रयत्नपूर्वक पाठ करना चाहिये; इससे रमा, | | पठितव्यं प्रयत्नेन नवरात्रचतुष्टये।<br>वैदिकैर्निजगायत्रीप्रीतये नित्यशो मुने॥ | उमा आदि शक्तियाँ उसपर सदा प्रसन्न रहती हैं। हे मुने! इसी प्रकार वैदिकोंको भी अपनी गायत्रीकी प्रसन्नताके लिये इसका नित्य पाठ करना चाहिये। हे श्रेष्ठ | | वेदसारमिदं पुण्यं पुराणं द्विजसत्तमाः।<br>वेदपाठसमं पाठे श्रवणे च तथैव हि॥ | मुनियो! यह पुराण परम पवित्र तथा वेदोंका सारस्वरूप है। इसके पढ़ने तथा सुननेसे वेदपाठके समान फल प्राप्त होता है। [ श्रीमद्देवीभागवत ] |