भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अर्धश्लोकी देवीभागवत १५


अर्धश्लोकी देवीभागवत

जिस प्रकार सप्तश्लोकी दुर्गा^१, सप्तश्लोकी गीता^२, पंचश्लोकी गणेशपुराण,^३ चतुःश्लोकी भागवत,^४ एकश्लोकी भागवत^५, एकश्लोकी रामायण^६, एकश्लोकी योगवासिष्ठ^७, सार्धश्लोकी दुर्गा^८ तथा एकश्लोकी महाभारत^९ प्राप्त होता है; उसी प्रकार अर्धश्लोकी देवीभागवत भी प्राप्त होता है, जो तात्त्विक दृष्टिसे बड़े ही महत्त्वका है। पुराण-वाङ्मयमें देवीभागवतका अत्यन्त महनीय स्थान है। इसमें भगवती जगदम्बाका पराशक्तिके रूपमें निरूपण हुआ है। इस पुराणके प्राकट्यके विषयमें इसी पुराणमें बताया गया है कि जब भगवान् वेदव्यासने अपने पुत्र श्रीशुकदेवजीको गृहस्थाश्रम ग्रहण करनेका परामर्श दिया तो ज्ञानमार्गके उपासक श्रीशुकदेवजीने प्रवृत्तिमार्गको स्वीकार नहीं किया, तब वेदव्यासजीने मोक्षमार्गाभिलाषी अपने पुत्रसे कहा— हे महाभाग! तुम मेरे द्वारा रचित वेदतुल्य श्रीमद्देवी-भागवतपुराणको पढ़ो, इसमें बारह स्कन्ध हैं, यह पुराण सभी पुराणोंका आभूषण है और इसके सुननेमात्रसे सत् और असत् वस्तुओंका यथार्थ ज्ञान हो जाता है— ‘सदसज्ज्ञानविज्ञानं श्रुतमात्रेण जायते।’ (श्रीमद्देवीभा० १।१५।४९) व्यासजीने इस पुराणके प्राकट्यकी कथा बताते हुए आगे कहा— हे महामते! एक समयकी बात है, जब महाप्रलयावस्थामें एकार्णवके मध्य वटपत्रपर भगवान् विष्णु बालरूपमें शयन कर रहे थे और बड़े ही विचारमग्न थे कि किस चिदात्मा शक्तिने मुझे इस बालरूपमें उत्पन्न किया है, मैं उन्हें कैसे जानूँ? उसी समय आदिशक्ति भगवतीने आकाशवाणीके रूपमें आधे श्लोकमें ही सम्पूर्ण अर्थको प्रदान करनेवाले ज्ञानको बताते हुए कहा—

‘सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्॥’ (श्रीमद्देवीभा० १।१५।५२)

अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ और दूसरा कोई भी सनातन नहीं है।

भगवान् बालमुकुन्द सोचने लगे कि इस सत्य वचनका उच्चारण किसने किया, उस कहनेवालेको मैं कैसे जानूँ, वह स्त्री है या पुरुष? तब उन्होंने उस श्लोकार्धरूपी भागवतको अपने हृदयमें धारण कर लिया। वे उसके अर्थपर चिन्तन करने लगे और बार-बार उसका उच्चारण करने लगे। बालमुकुन्दको चिन्तातुर देखकर उसी समय भगवती पराशक्ति शंख, चक्र धारण किये चतुर्भुजा महादेवीके रूपमें अपनी सखियोंसहित


१. ‘ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि०’ इत्यादि सात श्लोक।
२. ‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म०’ इत्यादि सात श्लोक।
३. श्रीविघ्नेशपुराणसारमुदितम्० इत्यादि पाँच श्लोक।
४. अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥
ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः॥
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु। प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्॥
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः। अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा॥
(श्रीमद्भा० २।९।३२—३५)
५. आदौ देवकिदेवगर्भजननं गोपीगृहे वर्धनम् मायापूतनजीवतापहरणं गोवर्धनोद्धारणम्।
कंसच्छेदनकौरवादिहननं कुन्तीसुतापालनम् एतद् भागवतं पुराणकथितं श्रीकृष्णलीलामृतम्॥
६. आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनं वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम्।
वालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लङ्कापुरीदाहनं पश्चाद् रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि रामायणम्॥
७. तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः। स जीवति मनो यस्य मननेनोपजीवति॥
८. मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम्। शक्रादिस्तुतिकं चैव दूतसंवाद एव च॥
शुम्भराजवधश्चैव नारायणीस्तुतिस्तथा। सार्धपाठमिदं प्रोक्तं नवपाठफलप्रदम्॥
९. आदौ पाण्डवधार्तराष्ट्रजननं लाक्षागृहे दाहनं द्यूते श्रीहरणं वने विचरणं मत्स्यालये वर्तनम्।
लीलागोग्रहणं रणे विहरणं सन्धिक्रियाजृम्भणं पश्चाद् भीष्मसुयोधनादिहननं चैतन्महाभारतम्॥