देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 17, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ श्रीमद्देवीभागवत
वहाँ प्रकट हो गयीं, वे दिव्य वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत थीं और उनका स्वरूप बड़ा ही शान्त था। वे मन्द-मन्द मुस्करा रही थीं।
उनका दर्शनकर भगवान् विष्णु बड़े ही विस्मयमें पड़ गये और उन्होंने पूछा हे देवि! कुछ समय पूर्व मैंने जो आधा श्लोक सुना, वह परम रहस्यमय वचन किसने कहा था, मुझे बतानेकी कृपा करें। इसपर देवीने कहा—मैं सगुणरूपा चतुर्भुजा भगवती हूँ। सब गुणोंका आलय होते हुए मैं निर्गुणा भी हूँ। वह आधा श्लोक निर्गुणा पराशक्तिने ही कहा था, आप इसे सब वेदोंका तत्त्वस्वरूप, कल्याणकारी और पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवत समझिये। 'पुण्यं भागवतं विद्धि वेदसारं शुभावहम्।' (श्रीमद्देवीभा० १।१६।१५) आप इसे सदा अपने चित्तमें रखिये और कभी विस्मृत न कीजिये। यह सब शास्त्रोंका सार है तथा भगवती महाविद्याके द्वारा प्रकाशित किया गया है। तीनों लोकोंमें इससे बढ़कर अन्य कुछ भी ज्ञातव्य नहीं है। ऐसा कहकर देवी अन्तर्धान हो गयीं और भगवान् विष्णुने वह श्लोकार्ध—देवीभागवतरूपी मन्त्र अपने हृदयदेशमें सदाके लिये धारण कर लिया। कुछ समय बाद जब ब्रह्माजी दैत्योंके भयसे डरकर भगवान् विष्णुकी शरणमें गये तो भगवान्को ध्यानमें स्थित होकर मन्त्र-जप करते हुए देखकर ब्रह्माजी बोले—हे देवेश! आप किस देवताका जप कर रहे हैं, आपसे भी बढ़कर कोई है क्या? तब विष्णुजी बोले—हे महाभाग! हम सभीमें जो कार्यकारणरूपा शक्ति विद्यमान है, जिनके द्वारा यह संसार पालित-पोषित और तिरोहित किया जाता है, वे ही सनातनी पराविद्या हैं, वे ही सभी ईश्वरोंकी भी स्वामिनी हैं। उन भगवतीने आधे श्लोकमें जो कहा, वही वास्तविक श्रीमद्देवीभागवत है। प्रत्येक द्वापरयुगमें उसीका विस्तार होगा—
श्लोकार्थेन तया प्रोक्तं तद्वै भागवतं किल।
विस्तरो भविता तस्य द्वापरादौ युगे तथा॥
(श्रीमद्देवीभा० १।१६।२९)
इतना कहनेके अनन्तर व्यासजीने शुकदेवजीसे फिर कहा—हे महाभाग! तब ब्रह्माजीने उस भागवतका संग्रह किया और उन्होंने इसे अपने पुत्र नारदजीको सुनाया। पूर्वकालमें वही भागवत देवर्षि नारदजीने मुझे दिया और फिर मैंने इसे बारह स्कन्धोंमें विस्तृत किया। हे पुत्र! यह पुराण वेदतुल्य है; सर्ग, प्रतिसर्ग आदि पाँच लक्षणोंसे युक्त है तथा भगवतीके उत्तम चरित्रोंसे ओत-प्रोत है। यह तत्त्वज्ञानके रससे परिपूर्ण, वेदार्थका उपबृंहण करनेवाला, ब्रह्मविद्याका निधान एवं भवसागरसे पार करनेवाला है। यह पुराण अत्यन्त पुण्यप्रद है। तुम इसके अठारह हजार श्लोकोंको हृदयंगम कर लो। यह पुराण पाठ तथा श्रवण करनेवालेके लिये अज्ञानका नाश करनेवाला, दिव्य, ज्ञानरूपी सूर्यका बोध करानेवाला, सुखप्रद, शान्तिदायक, धन्य, दीर्घ आयु प्रदान करनेवाला, कल्याणकारी तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला है—
गृहाण त्वं महाभाग योग्योऽसि मतिमत्तरः।
पुण्यं भागवतं नाम पुराणं पुरुषर्षभ॥
अष्टादशसहस्त्राणां श्लोकानां कुरु संग्रहम्।
अज्ञाननाशनं दिव्यं ज्ञानभास्करबोधकम्॥
सुखदं शान्तिदं धन्यं दीर्घायुष्यकरं शिवम्।
शृण्वतां पठतां चेदं पुत्रपौत्रविवर्धनम्॥
(श्रीमद्देवीभा० १।१६।३५—३७)
इस प्रकार वेदव्यासजीके द्वारा प्रेरित किये जानेपर व्यासजीके शिष्य सूतजीने तथा श्रीशुकदेवजीने श्लोकार्धसे विस्तृत हुए श्रीमद्देवीभागवतपुराणका अध्ययन किया।
भगवतीकी कृपासे भगवान् बालमुकुन्दको जो आधे श्लोकमें देवीभागवत प्राप्त हुआ, उसे ब्रह्माजीने ग्रहण किया और फिर उसीको व्यासजीने बारह स्कन्धोंमें विस्तृत किया,* वही देवीभागवत हम सबको प्राप्त हुआ। यह भगवती आदिशक्ति तथा भगवान् वेदव्यासजीका जीवोंपर महान् अनुग्रह है।
* अर्धश्लोकात्मकं यन्नु देवीवक्त्राब्जनिर्गतम्। श्रीमद्भागवतं नाम वेदसिद्धान्तबोधकम्॥
उपदिष्टं विष्णवे यद्वटपत्रनिवासिने। शतकोटिप्रविस्तीर्णं तत्कृतं ब्रह्मणा पुरा॥
तत्सारमेकतः कृत्वा व्यासेन शुकहेतवे। अष्टादशसहस्रं तु द्वादशस्कन्धसंयुतम्॥ (श्रीमद्देवीभा० १२।१४।१—३)