देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 178, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 178
| अ० १९ ] | प्रथम स्कन्ध | १६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पितॄणां सुभगा कन्या पीवरी नाम सुन्दरी।<br>शुकश्चकार पत्नीं तां योगमार्गस्थितोऽपि हि॥ ४०<br>स तस्यां जनयामास पुत्रांश्चतुर एव हि।<br>कृष्णं गौरप्रभं चैव भूरिं देवश्रुतं तथा॥ ४१<br>कन्यां कीर्तिं समुत्पाद्य व्यासपुत्रः प्रतापवान्।<br>ददौ विभ्राजपुत्राय त्वणुहाय महात्मने॥ ४२ | योगमार्गमें स्थित रहते हुए भी शुकदेवजीने पितरोंकी पीवरी नामकी सौभाग्यवती सुन्दर कन्याको पत्नीरूपमें स्वीकार कर लिया। उन्होंने उससे कृष्ण, गौरप्रभ, भूरि और देवश्रुत नामक चार पुत्र उत्पन्न किये। साथ ही उन प्रतापी व्याससुत शुकदेवजीने कीर्ति नामकी एक कन्या उत्पन्न करके उस कन्याका विवाह विभ्राजके पुत्र महात्मा अणुहके साथ कर दिया॥ ४०—४२॥ |
| अणुहस्य सुतः श्रीमान्ब्रह्मदत्तः प्रतापवान्।<br>ब्रह्मज्ञः पृथिवीपालः शुककन्यासमुद्भवः॥ ४३<br>कालेन कियता तत्र नारदस्योपदेशतः।<br>ज्ञानं परमकं प्राप्य योगमार्गमनुत्तमम्॥ ४४<br>पुत्रे राज्यं निधायाथ गतो बदरिकाश्रमम्।<br>मायाबीजोपदेशेन तस्य ज्ञानं निर्गलम्॥ ४५ | शुकदेवजीकी कन्यासे उत्पन्न अणुहके पुत्र श्रीमान् ब्रह्मदत्त हुए जो बड़े प्रतापी, ब्रह्मज्ञानी एवं पृथ्वीके रक्षक थे। वे कुछ समयके बाद देवर्षि नारदके उपदेशसे और परमश्रेष्ठ ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान पाकर योगमार्गका आश्रय लेकर राज्यका भार अपने पुत्रको सौंपकर बदरिकाश्रम चले गये। वहाँ नारदजीके कृपाप्रसादसे प्राप्त मायाबीजके उपदेशसे उन्हें निर्बाध तथा तत्क्षण मुक्तिदायक ज्ञान उत्पन्न हुआ॥ ४३—४५ १/२॥ |
| नारदस्य प्रसादेन जातं सद्यो विमुक्तिदम्।<br>कैलासशिखरे रम्ये त्यक्त्वा सङ्गं पितुः शुकः॥ ४६<br>ध्यानमास्थाय विपुलं स्थितः सङ्गपराङ्मुखः।<br>उत्पपात गिरेः शृङ्गात्सिद्धिं च परमां गतः॥ ४७<br>आकाशगो महातेजा विरराज यथा रविः।<br>गिरेः शृङ्गं द्विधा जातं शुकस्योत्पतने तदा॥ ४८<br>उत्पाता बहवो जाताः शुकश्चाकाशगोऽभवत्।<br>अन्तरिक्षे यथा वायुः स्तूयमानः सुरर्षिभिः॥ ४९<br>तेजसातिविराजन्वै द्वितीय इव भास्करः। | उधर शुकदेवजी भी अपने पिताका साथ त्यागकर कैलासके सुरम्य शिखरपर चले गये और निःसंग भावसे अविचल ध्यान लगाकर स्थित हो गये। कुछ ही दिनोंमें उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो गयी और वे पर्वतके शिखरसे उड़ गये तथा महातेजस्वी वे शुकदेवजी आकाशमें जाकर सूर्यके समान सुशोभित होने लगे। तब शुकदेवजीके उड़ते ही पर्वत-शिखर दो भागोंमें विभाजित हो गया। शुकदेवजीके आकाशमें जाते ही अनेक प्रकारके उत्पात होने लगे। ऋषियोंके द्वारा स्तुति किये जाते हुए वे शुकदेवजी अन्तरिक्षमें वायुकी भाँति स्थित हो गये। वे अपने तेजसे दूसरे सूर्यकी भाँति देदीप्यमान हो रहे थे॥ ४६—४९ १/२॥ |
| व्यासस्तु विरहाक्रान्तः क्रन्दन्पुत्रेति चासकृत्॥ ५०<br>गिरेः शृङ्गे गतस्तत्र शुको यत्र स्थितोऽभवत्।<br>क्रन्दमानं तदा दीनं व्यासं मत्वा श्रमाकुलम्॥ ५१<br>सर्वभूतगतः साक्षी प्रतिशब्दमदात्तदा।<br>तत्राद्यापि गिरेः शृङ्गे प्रतिशब्दः स्फुटोऽभवत्॥ ५२ | इसी बीच पुत्रके वियोगसे व्यग्र होकर व्यासजी बार-बार 'हा पुत्र! हा पुत्र!' कहते हुए उस पर्वतकी चोटीपर पहुँचे, जहाँ शुकदेवजी रहते थे। थके हुए व्यासजीको दीन भावसे करुण क्रन्दन करते हुए देखकर सभी जीवोंमें साक्षीरूपसे विद्यमान परमात्माने प्रतिध्वनिके रूपमें उत्तर दिया। आज भी उस पर्वतके शृंगपर वैसी ही प्रतिध्वनि स्पष्ट सुनायी देती है॥ ५०—५२॥ |