देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 177, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 177
१६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पितुः सङ्गं परित्यज्य त्वं वनं गन्तुमिच्छसि।<br>मृगैः सह सुसम्बन्धो भविता ते न संशयः॥ २९ | गुरु व्यासजी मेरे परम पूज्य हैं। उन अपने पिताका साथ त्याग करके आप वनमें जाना चाहते हैं। वहाँ भी तो मृग आदि पशुओंके साथ आपका स्नेह-सम्बन्ध रहेगा ही; इसमें सन्देह नहीं है॥ २८-२९॥ |
| महाभूतानि सर्वत्र निःसङ्गः क्व भविष्यसि।<br>आहारार्थं सदा चिन्ता निश्चन्तः स्याः कथं मुने॥ ३० | पृथ्वी, जल आदि महाभूत तो सर्वत्र ही विद्यमान हैं। तब आप निःसंग कैसे हो पायेंगे ? और फिर हे मुने! भोजन आदिकी भी चिन्ता रहेगी ही, तो आप निश्चिन्त कैसे रहेंगे ?॥ ३०॥ |
| दण्डाजिनकृता चिन्ता यथा तव वनेऽपि च।<br>तथैव राज्यचिन्ता मे चिन्तयानस्य वा न वा॥ ३१ | जिस प्रकार आपको वनमें दण्ड और मृगचर्मकी चिन्ता बनी रहेगी, उसी प्रकार मुझ विचारशील राजाको भी राज्यसम्बन्धी चिन्ता तो होगी ही॥ ३१॥ |
| विकल्पोपहतस्त्वं वै दूरदेशमुपागतः।<br>न मे विकल्पसन्देहो निर्विकल्पोऽस्मि सर्वथा॥ ३२ | आप ही भ्रममें पड़कर यहाँतक दूर देशमें आये हैं। मुझे किसी प्रकारका विकल्परूपी सन्देह नहीं है; क्योंकि मैं तो सर्वथा निर्विकल्प हूँ॥ ३२॥ |
| सुखं स्वपिमि विप्राहं सुखं भुञ्जामि सर्वथा।<br>न बद्धोऽस्मीति बुद्ध्याहं सर्वदैव सुखी मुने॥ ३३<br><br>त्वं तु दुःखी सदैवासि बद्धोऽहमिति शङ्कया।<br>इति शङ्कां परित्यज्य सुखी भव समाहितः॥ ३४ | हे विप्र! मैं सुखसे भोजन करता हूँ और सुखपूर्वक शयन करता हूँ। हे मुने! 'मैं बद्ध नहीं हूँ' इस भावनासे मैं सर्वदा सुखी रहता हूँ। [इसके विपरीत] 'मैं बद्ध हूँ'—इस शंकासे आप सर्वदा दुःखी ही रहते हैं, अतः आप इस शंकाको छोड़कर सदा सुखी एवं स्वस्थ हो जाइये॥ ३३-३४॥ |
| देहोऽयं मम बन्धोऽयं न ममेति च मुक्तता।<br>तथा धनं गृहं राज्यं न ममेति च निश्चयः॥ ३५ | यह शरीर मेरा है—यही बन्धनका कारण है; यह मेरा नहीं है—ऐसा निश्चय ही मुक्ति है। यह गृह, सम्पत्ति, राज्य मेरा नहीं है—ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है॥ ३५॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य शुकः प्रीतमनाभवत्।<br>आपृच्छ्य तं जगामाशु व्यासस्याश्रममुत्तमम्॥ ३६ | सूतजी बोले—महाराज जनककी बात सुनकर शुकदेवजी हर्षित हुए और उनसे आज्ञा लेकर व्यासजीके उत्तम आश्रमके लिये चल पड़े॥ ३६॥ |
| आगच्छन्तं सुतं दृष्ट्वा व्यासोऽपि सुखमाप्तवान्।<br>आलिङ्ग्याघ्राय मूर्धानं पप्रच्छ कुशलं पुनः॥ ३७ | व्यासजीने अपने ज्ञानी पुत्रको आते देखकर सुख प्राप्त किया। उन्होंने शुकदेवजीको हृदयसे लगाकर तथा उनका सिर सूँघकर उनकी कुशलता पूछी॥ ३७॥ |
| स्थितस्तत्राश्रमे रम्ये पितुः पार्श्वे समाहितः।<br>वेदाध्ययनसम्पन्नः सर्वशास्त्रविशारदः॥ ३८<br><br>जनकस्य दशां दृष्ट्वा राज्यस्थस्य महात्मनः।<br>स निर्वृतिं परां प्राप्य पितुराश्रमसंस्थितः॥ ३९ | सब शास्त्रोंमें कुशल एवं वेदाध्ययनमें तत्पर श्रीशुक-देवजी अपने पिताके साथ उस रमणीय आश्रममें सावधान होकर रहने लगे। राज्य करते हुए महात्मा जनककी वह विदेहावस्था देखकर शुकदेवजी परम शान्तिको प्राप्तकर अपने पिताके आश्रममें ही स्थित हो गये॥ ३८-३९॥ |