देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 176, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 176
| अ० १९ ] | प्रथम स्कन्ध | १६७ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| वैखानसा ये मुनयो मिताहारा जितव्रताः।<br>तेऽपि मुह्यन्ति संसारे जानन्तोऽपि ह्यसत्यताम्॥ १७ | स्वल्पाहारी, अटल व्रतवाले जो वैखानस मुनि हैं, वे इस संसारकी अनित्यताको जानते हुए भी इसमें आसक्त हो जाते हैं॥ १७॥ |
| तव वंशसमुत्थानां विदेहा इति भूपते।<br>कुटिलं नाम जानीहि नान्यथेति कदाचन॥ १८ | हे राजन्! आपके वंशमें उत्पन्न सभी राजाओंका नाम विदेह—यह हो जाता है, इसमें भी आप धोखा समझिये, दूसरा कुछ नहीं॥ १८॥ |
| विद्याधरो यथा मूर्खो जन्मान्धस्तु दिवाकरः।<br>लक्ष्मीधरो दरिद्रश्च नाम तेषां निरर्थकम्॥ १९<br><br>तव वंशोद्भवा ये ये श्रुताः पूर्वे मया नृपाः।<br>विदेहा इति विख्याता नामतः कर्मतो न ते॥ २० | जिस प्रकार किसी मूर्खका नाम विद्याधर, जन्मान्धका नाम दिवाकर तथा सतत दरिद्री मनुष्यका नाम लक्ष्मीधर रखना निरर्थक है, उसी प्रकार पूर्वकालमें आपके वंशमें उत्पन्न जिन-जिन राजाओंको मैंने सुना है, वे नामसे ही विदेह प्रसिद्ध हुए हैं कर्मसे नहीं॥ १९-२०॥ |
| निमिनामाभवद्राजा पूर्वं तव कुले नृप।<br>यज्ञार्थं स तु राजर्षिर्वसिष्ठं स्वगुरुं मुनिम्॥ २१<br><br>निमन्त्रयामास तदा तमुवाच नृपं मुनिः।<br>निमन्त्रितोऽस्मि यज्ञार्थं देवेन्द्रेणाधुना किल॥ २२<br><br>कृत्वा तस्य मखं पूर्णं करिष्यामि तवापि वै।<br>तावत्कुरुष्व राजेन्द्र सम्भारं तु शनैः शनैः॥ २३ | हे नृप! आपके कुलमें पहले निमि नामके राजा हो चुके हैं। उन राजर्षिने एक बार अपने गुरु वसिष्ठमुनिको यज्ञके लिये निमन्त्रित किया। उस समय वसिष्ठजीने उनसे कहा कि आपसे पहले इन्द्रने मुझे यज्ञके लिये आमन्त्रित कर रखा है। इन्द्रका यज्ञ सम्पन्न कराकर मैं आपका भी यज्ञ पूर्ण करूँगा। अतः हे राजेन्द्र! तब तक आप धीरे-धीरे यज्ञ-सामग्री एकत्र कराइये॥ २१—२३॥ |
| इत्युक्त्वा निर्ययौ सोऽथ महेन्द्रयजने मुनिः।<br>निमिरन्यं गुरुं कृत्वा चकार मखमुत्तमम्॥ २४ | ऐसा कहकर वसिष्ठमुनि इन्द्रका यज्ञ करानेके लिये चले गये और महाराज निमिने किसी दूसरेको आचार्य बनाकर अपना उत्तम यज्ञ सम्पन्न कर लिया॥ २४॥ |
| तच्छ्रुत्वा कुपितोऽत्यर्थं वसिष्ठो नृपतिं पुनः।<br>शशाप च पतत्वद्य देहस्ते गुरुलोपक॥ २५ | यह सुनकर वसिष्ठजी राजापर अत्यन्त क्रोधित हुए और उन्हें शाप देते हुए बोले—'हे गुरुका परित्याग करनेवाले! तुम्हारा शरीर नष्ट हो जाय'॥ २५॥ |
| राजापि तं शशापाथ तवापि च पतत्वयम्।<br>अन्योन्यशापात्पतितौ तावेव च मया श्रुतम्॥ २६ | यह सुनकर महाराज निमिने भी शाप दिया कि आपका भी शरीर नष्ट हो जाय। इस प्रकार वे दोनों एक-दूसरेके शापसे नष्ट हो गये—ऐसा मैंने सुना है॥ २६॥ |
| विदेहेन च राजेन्द्र कथं शप्तो गुरुः स्वयम्।<br>विनोद इव मे चित्ते विभाति नृपसत्तम॥ २७ | हे राजेन्द्र! विदेह होकर भी राजाने अपने गुरुको स्वयं शाप क्यों दे डाला! हे नृपश्रेष्ठ! यह तो मेरे मनमें परिहास-जैसा प्रतीत हो रहा है॥ २७॥ |
| जनक उवाच<br>सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चिदिदं मतम्।<br>तथापि शृणु विप्रेन्द्र गुरुर्मम सुपूजितः॥ २८ | जनकजी बोले—हे विप्रवर! आपने ठीक ही कहा है; इसमें मिथ्या कुछ भी नहीं है—ऐसा मैं मानता हूँ। फिर भी आप मेरी बात सुनें। हे विप्रेन्द्र! |