देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 175, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| १६६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
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| वित्तैषणा न ते शान्ता तथा राज्यसुखैषणा।<br>जयैषणा च सङ्ग्रामे जीवन्मुक्तः कथं भवेः॥ ५ | अभी भी आपकी धनप्राप्तिकी कामना, राज्यसुख तथा युद्धमें विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषा शान्त नहीं हुई है, तब आप जीवन्मुक्त कैसे हो सकते हैं? ॥ ५॥ | | चौरेषु चौरबुद्धिस्तु साधुबुद्धिस्तु तापसे।<br>स्वपरत्वं तवाप्यस्ति विदेहस्त्वं कथं नृप॥ ६ | अभी भी चोरोंके प्रति चौरबुद्धि तथा तपस्वीके प्रति साधुबुद्धि आपकी है ही। अपने-परायेका भेदभाव भी अभी आपमें है, तो फिर हे राजन्! आप विदेह कैसे? ॥ ६॥ | | कटुतीक्ष्णकषायाम्लरसान्वेत्सि शुभाशुभान्।<br>शुभेषु रमते चित्तं नाशुभेषु तथा नृप॥ ७ | अभी आप कटु, तिक्त, कसैले एवं खट्टे रसोंका तथा भले-बुरेका ज्ञान रखते ही हैं। हे राजन्! आपका चित्त शुभ कर्मोंमें रमता है, अशुभ कर्मोंमें नहीं। | | जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिश्च तव राजन् भवन्ति हि।<br>अवस्थास्तु यथाकालं तुरीया तु कथं नृप॥ ८ | जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—ये अवस्थाएँ अभी आपको समयानुसार होती ही हैं; तब भला आपको तुरीयावस्था कैसे प्राप्त होती होगी? ॥ ७-८॥ | | पदात्यश्वरथेभाश्च सर्वे वै वशगा मम।<br>स्वाम्यहं चैव सर्वेषां मन्यसे त्वं न मन्यसे॥ ९ | हे राजन्! घोड़े, रथ, हाथी तथा पैदल सैनिक—ये सब मेरे अधीन हैं और मैं इन सबका स्वामी हूँ—ऐसा आप अपनेको मानते हैं या नहीं? | | मिष्टमत्सि सदा राजन्मुदितो विमनास्तथा।<br>मालायां च तथा सर्पे समदृक् क्व नृपोत्तम॥ १० | आप मधुर भोजनको प्रसन्नतापूर्वक अथवा बेमनसे खाते ही होंगे। हे नृपश्रेष्ठ! आप माला और सर्पमें क्या समान दृष्टिवाले हैं? ॥ ९-१०॥ | | विमुक्तस्तु भवेद्राजन् समलोष्टाश्मकाञ्चनः।<br>एकात्मबुद्धिः सर्वत्र हितकृत्सर्वजन्तुषु॥ ११ | हे राजन्! विमुक्त पुरुष तो वह कहलाता है, जो मिट्टीके ढेले और स्वर्णको समान समझता हो, सब जीवोंमें एकात्मबुद्धि रखता हो तथा जीवमात्रका उपकार करता हो॥ ११॥ | | न मेऽद्य रमते चित्तं गृहदारादिषु क्वचित्।<br>एकाकी निःस्पृहोऽत्यर्थं चरेयमिति मे मतिः॥ १२ | मेरा मन घर-स्त्री आदिमें कभी नहीं लगता। इसलिये अकेले ही निःस्पृह भावसे मैं सदा विचरण करता रहूँ—यही मेरा विचार है॥ १२॥ | | निःसङ्गो निर्ममः शान्तः पत्रमूलफलाशनः।<br>मृगवद्विचरिष्यामि निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः॥ १३ | निःसंग, ममतारहित और शान्त होकर केवल पत्र, मूल, फल इत्यादि ग्रहण करता हुआ मैं निर्द्वन्द्व एवं अपरिग्रही होकर मृगकी भाँति स्वच्छन्द विचरण करूँगा॥ १३॥ | | किं मे गृहेण वित्तेन भार्यया च सुरूपया।<br>विरागमनसः कामं गुणातीतस्य पार्थिव॥ १४ | हे पार्थिव! गृह, धन तथा रूपवती स्त्रीसे मुझ विरक्तचित्त और गुणातीतका क्या प्रयोजन है? ॥ १४॥ | | चिन्त्यसे विविधाकारं नानारागसमाकुलम्।<br>दम्भोऽयं किल ते भाति विमुक्तोऽस्मीति भाषसे॥ १५ | आप अनेक प्रकारकी राग-द्वेषयुक्त बातें सोचते हैं, फिर भी 'मैं विमुक्त हूँ'—ऐसा आप कहते हैं। यह सब मुझे तो केवल आपका दम्भ ही जान पड़ता है। | | कदाचिच्छत्रुजा चिन्ता धनजा च कदाचन।<br>कदाचित्सैन्यजा चिन्ता निश्चिन्तोऽसि कदा नृप॥ १६ | आपको कभी शत्रुकी, कभी धनकी तथा कभी सेनाकी चिन्ता रहती ही है, तब हे राजन्! आप निश्चिन्त कहाँ? ॥ १५-१६॥ |