भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 174
अ० १९]प्रथम स्कन्ध१६५
जनक उवाचजनकजी बोले—
हिंसा यज्ञेषु प्रत्यक्षा साहिंसा परिकीर्तिता।<br>उपाधियोगतो हिंसा नान्यथेति विनिर्णयः॥ ५७यज्ञोंमें जो हिंसा दिखायी देती है, वह वास्तवमें अहिंसा ही कही गयी है; क्योंकि जो हिंसा उपाधियोगसे होती है वही हिंसा कहलाती है, अन्यथा नहीं—ऐसा शास्त्रोंका निर्णय है॥ ५७॥
यथा चेन्धनसंयोगादग्नौ धूमः प्रवर्तते।<br>तद्वियोगात्तथा तस्मिन्निर्धूमत्वं विभाति वै॥ ५८<br>अहिंसां च तथा विद्धि वेदोक्तां मुनिसत्तम।<br>रागिणां सापि हिंसैव निःस्पृहाणां न सा मता॥ ५९जिस प्रकार [गीली] लकड़ीके संयोगसे अग्निसे धुआँ निकलता है, उसके अभावमें उस अग्निमें धुँआ नहीं दिखायी देता, उसी प्रकार हे मुनिवर! वेदोक्त हिंसाको भी आप अहिंसा ही समझिये। रागीजनोंद्वारा की गयी हिंसा ही हिंसा है, किंतु अनासक्त जनोंके लिये वह हिंसा नहीं कही गयी है॥ ५८-५९॥
अरागेण च यत्कर्म तथाहङ्कारवर्जितम्।<br>अकृतं वेदविद्वांसः प्रवदन्ति मनीषिणः॥ ६०जो कर्म रागरहित तथा अहंकाररहित होकर किया जाता हो, उस कर्मको वैदिक विद्वान् मनीषीजन न किये हुएके समान ही कहते हैं॥ ६०॥
गृहस्थानां तु हिंसैव या यज्ञे द्विजसत्तम।<br>अरागेण च यत्कर्म तथाहंकारवर्जितम्॥ ६१<br>साहिंसैव महाभाग मुमुक्षूणां जितात्मनाम्॥ ६२हे द्विजश्रेष्ठ! रागी गृहस्थोंके द्वारा यज्ञमें जो हिंसा होती है, वही हिंसा है। हे महाभाग! जो कर्म रागरहित तथा अहंकारशून्य होकर किया जाता है, वह जितात्मा मुमुक्षुजनोंके लिये अहिंसा ही है॥ ६१-६२॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकस्य जनकोपदेशवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥


अथैकोनविंशोऽध्यायः

शुकदेवजीका व्यासजीके आश्रममें वापस आना, विवाह करके सन्तानोत्पत्ति करना तथा परम सिद्धिकी प्राप्ति करना

शुक उवाचशुकदेवजी बोले—
सन्देहोऽयं महाराज वर्तते हृदये मम।<br>मायामध्ये वर्तमानः स कथं निःस्पृहो भवेत्॥ १<br>शास्त्रज्ञानं च सम्प्राप्य नित्यानित्यविचारणम्।<br>त्यजते न मनो मोहं स कथं मुच्यते नरः॥ २हे महाराज! मेरे हृदयमें यह शंका हो रही है कि मायामें लिप्त रहते हुए कोई मनुष्य निःस्पृह कैसे हो सकता है? शास्त्रका ज्ञान प्राप्त करके नित्यानित्यका विचार करनेपर भी चित्तसे मोह नहीं दूर होता। तब भला वह मनुष्य मुक्त कैसे हो सकेगा?॥ १-२॥
अन्तर्गतं तमश्छेत्तुं शास्त्राद् बोधो हि न क्षमः।<br>यथा न नश्यति तमः कृतया दीपवार्तया॥ ३<br>अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्तव्यः सर्वदा बुधैः।<br>स कथं राजशार्दूल गृहस्थस्य भवेत्तथा॥ ४मनुष्यके मनमें स्थित मोहको दूर करनेके लिये केवल शास्त्रबोध ही समर्थ नहीं हो सकता, जैसे केवल दीप जलानेकी बात करनेसे अन्धकार दूर नहीं होता। अतः बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये कि वे कभी किसीसे द्वेष-भाव न रखें, परंतु हे नृपश्रेष्ठ! गृहस्थसे वह कैसे सम्भव है?॥ ३-४॥