भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 889 में से

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पृष्ठ 180

| अ० २० ] | प्रथम स्कन्ध | १७१ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
असितो देवलश्चैव वैशम्पायन एव च।<br>जैमिनिश्च सुमन्तुश्च गताः सर्वे तपोधनाः॥ ३<br><br>तानेतान्वीक्ष्य पुत्रं च लोकान्तरितमप्युत।<br>व्यासः शोकसमाक्रान्तो गमनायाकरोन्मतिम्॥ ४असित, देवल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमन्तु आदि सभी तपोधन मुनि चले गये थे। उन ऋषियोंको अन्यत्र तथा अपने पुत्र शुकदेवको अन्तरिक्षमें गया हुआ देखकर शोकाकुल व्यासजीने वहाँसे चले जानेका विचार किया॥ ३-४॥
सस्मार मनसा व्यासस्तां निषादसुतां शुभाम्।<br>मातरं जाह्नवीतीरे मुक्तां शोकसमन्विताम्॥ ५उसी समय व्यासजीने मन-ही-मन निषादकन्या अपनी कल्याणकारिणी माताका स्मरण किया, जिन्हें उन्होंने शोकावस्थामें गंगाजीके तटपर ही छोड़ दिया था॥ ५॥
स्मृत्वा सत्यवतीं व्यासस्त्यक्त्वा तं पर्वतोत्तमम्।<br>आजगाम महातेजा जन्मस्थानं स्वकं मुनिः॥ ६अपनी माता सत्यवतीका स्मरण करके उस श्रेष्ठ पर्वतको त्यागकर महातेजस्वी व्यासजी अपने जन्मस्थानपर चले आये॥ ६॥
द्वीपं प्राप्याथ पप्रच्छ क्व गता सा वरानना।<br>निषादास्तं समाचख्युर्दत्ता राज्ञे तु कन्यका॥ ७<br><br>दाशराजोऽपि सम्पूज्य व्यासं प्रीतिपुरःसरम्।<br>स्वागतेनाभिसत्कृत्य प्रोवाच विहिताञ्जलिः॥ ८इस प्रकार उन्होंने उस द्वीपपर जाकर लोगोंसे पूछा कि 'वे सुन्दर मुखवाली [मेरी माता] कहाँ चली गयीं?' तब निषादोंने बताया कि उस कन्याका तो निषादराजने राजा [शन्तनु]-से विवाह कर दिया। तत्पश्चात् निषादराजने व्यासजीका प्रेमपूर्वक पूजन एवं सत्कार करके हाथ जोड़कर कहा—॥ ७-८॥
दाशराज उवाच<br>अद्य मे सफलं जन्म पवित्रं नः कुलं मुने।<br>देवानामपि दुर्दर्शं यज्जातं तव दर्शनम्॥ ९दाशराज बोला—हे मुने! मेरा जन्म सफल हो गया और हमारा कुल पवित्र हो गया जो कि आज देवताओंके लिये दुर्लभ आपका दर्शन प्राप्त हुआ॥ ९॥
यदर्थमागतोऽसि त्वं तद् ब्रूहि द्विजसत्तम।<br>अपि दारा धनं पुत्रास्त्वदायत्तमिदं विभो॥ १०हे विप्रवर! आप जिस कामसे आये हैं, वह बताइये। हे विभो! धन, पुत्र, कलत्र आदि—यह सब आपके अधीन है॥ १०॥
सरस्वत्यास्तटे रम्ये चकाराश्रममण्डलम्।<br>व्यासस्तपःसमायुक्तस्तत्रैवास समाहितः॥ ११[निषादराजके प्रार्थना करनेपर] व्यासजीने सरस्वती नदीके सुन्दर तटपर अपना आश्रम बनाया और सावधान-चित्त हो वे पुनः तप करते हुए वहाँ रहने लगे॥ ११॥
सत्यवत्याः सुतौ जातौ शन्तनोरमितद्युतेः।<br>मत्वा तौ भ्रातरौ व्यासः सुखमाप वने स्थितः॥ १२अपूर्व तेजस्वी महाराज शन्तनुको सत्यवतीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए। इन दोनोंको अपना भाई मानकर वनवासी व्यासजी अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ १२॥
चित्राङ्गदः प्रथमो रूपवाञ्छत्रुतापनः।<br>बभूव नृपतेः पुत्रः सर्वलक्षणसंयुतः॥ १३<br><br>विचित्रवीर्यनामासौ द्वितीयः समजायत।<br>सोऽपि सर्वगुणोपेतः शन्तनोः सुखवर्धनः॥ १४उनमें राजाका पहला पुत्र चित्रांगद रूपवान्, शत्रुओंको कष्ट देनेवाला तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था। शन्तनुके दूसरे पुत्रका नाम विचित्रवीर्य था। वह भी सर्वगुणसम्पन्न एवं शन्तनुके लिये सुखवर्द्धक हुआ॥ १३-१४॥