देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 181, कुल 889 में से
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| १७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
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| गाङ्गेयः प्रथमस्तस्य महावीरो बलाधिकः।<br>तथैव तौ सुतौ जातौ सत्यवत्यां महाबलौ॥ १५ | इसके पूर्व उन राजा शन्तनुको गंगासे भीष्म नामक बलशाली एवं पराक्रमी पुत्र पैदा हुआ था। उसी प्रकार सत्यवतीसे दो पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए॥ १५॥ |
| शन्तनुस्तान्सुतान्वीक्ष्य सर्वलक्षणसंयुतान्।<br>अमंस्ताजय्यमात्मानं देवादीनां महामनाः॥ १६ | उन सर्वलक्षणसम्पन्न तीनों पुत्रोंको देखकर महामना शन्तनु अपने आपको देवताओंसे अजेय समझने लगे थे॥ १६॥ |
| अथ कालेन कियता शन्तनुः कालपर्ययात्।<br>तत्याज देहं धर्मात्मा देही जीर्णमिवाम्बरम्॥ १७ | कुछ समय बीतनेपर यथासमय धर्मात्मा शन्तनुने उसी प्रकार अपना शरीर त्याग दिया, जिस प्रकार कोई मनुष्य अपना पुराना वस्त्र छोड़ देता है। |
| कालधर्मगते राज्ञि भीष्मश्चक्रे विधानतः।<br>प्रेतकार्याणि सर्वाणि दानानि विविधानि च॥ १८ | शन्तनुके कालके वशीभूत हो जानेपर भीष्मने विधिवत् उनके समस्त प्रेतकार्य किये और विविध प्रकारके दान दिये॥ १७-१८॥ |
| चित्राङ्गदं ततो राज्ये स्थापयामास वीर्यवान्।<br>स्वयं न कृतवान् राज्यं तस्माद्देवव्रतोऽभवत्॥ १९ | तदनन्तर पराक्रमी भीष्मने चित्रांगदको राज्यसिंहासनपर बैठाया। उन्होंने स्वयं राज्य नहीं किया, इसी कारण उनका नाम देवव्रत हुआ॥ १९॥ |
| चित्राङ्गदस्तु वीर्येण प्रमत्तः परदुःखदः।<br>बभूव बलवान्वीरः सत्यवत्यात्मजः शुचिः॥ २० | सत्यवतीपुत्र चित्रांगद बलगर्वित, शत्रुसन्तापकर्ता, बलशाली, वीर तथा पवित्र थे॥ २०॥ |
| अथैकदा महाबाहुः सैन्येन महतावृत्तः।<br>प्रचचार वनोद्देशान्यश्यन्वध्यान्मृगान् रुरून्॥ २१ | महाबाहु चित्रांगद एक बार महान् सेनासे युक्त होकर आखेटके लिये वनमें गये। वहाँ वध्य रुरुमृगोंको खोजते हुए वे विविध वन-प्रदेशोंमें घूम रहे थे। |
| चित्राङ्गदस्तु गन्धर्वो दृष्ट्वा तं मार्गगं नृपम्।<br>उत्ततारान्तिकं भूमेर्विमानवरमास्थितः॥ २२ | मार्गमें उन राजाको जाता हुआ देखकर चित्रांगद नामक एक गन्धर्व अपने सुन्दर विमानसे भूमिपर उनके समीप उतर पड़ा॥ २१-२२॥ |
| तत्राभूच्च महद्युद्धं तयोः सदृशवीर्ययोः।<br>कुरुक्षेत्रे महास्थाने त्रीणि वर्षाणि तापसाः॥ २३ | **सूतजी बोले—**हे तपस्वियो ! उस समय कुरुक्षेत्रके उस विशाल मैदान में तीन वर्षतक समान बलवाले उन दोनोंमें घमासान युद्ध होता रहा॥ २३॥ |
| इन्द्रलोकमवापाशु गन्धर्वेण हतो रणे।<br>भीष्मः श्रुत्वा चकाराशु तस्यौर्ध्वदैहिकं तदा॥ २४ | अन्तमें उस गन्धर्वके द्वारा राजा चित्रांगद युद्धमें मारे गये और उन्हें शीघ्र ही इन्द्रलोक प्राप्त हुआ। यह सुनकर भीष्मने उसी समय चित्रांगदका और्ध्वदैहिक संस्कार किया॥ २४॥ |
| गाङ्गेयः कृतशोकस्तु मन्त्रिभिः परिवारितः।<br>विचित्रवीर्यनामानं राज्येशं च चकार ह॥ २५ | तत्पश्चात् मन्त्रियोंने भीष्मको समझा-बुझाकर शोकरहित किया। उन्होंने छोटे भाई विचित्रवीर्यको राजा बना दिया॥ २५॥ |
| मन्त्रिभिर्बोधिता पश्चाद् गुरुभिश्च महात्मभिः।<br>स्वपुत्रं राज्यगं दृष्ट्वा पुत्रशोकहतापि च॥ २६ | मन्त्रियों, गुरुजनों एवं महात्माओंके समझानेके बाद शुभलक्षणा राजमाता सत्यवती अपने [ज्येष्ठ] पुत्रकी मृत्युसे शोकाकुल होती हुई भी अपने छोटे पुत्र |