देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० २० ] | प्रथम स्कन्ध | १७३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सत्यवत्यतिसन्तुष्टा बभूव वरवर्णिनी।<br>व्यासोऽपि भ्रातरं श्रुत्वा राजानं मुदितोऽभवत्॥ २७ | विचित्रवीर्यको राजसिंहासनपर बैठा देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं। व्यासजी भी अपने भ्राताके राजा होनेका समाचार पाकर प्रसन्न हुए॥ २६-२७॥ |
| यौवनं परमं प्राप्तः सत्यवत्याः सुतः शुभः।<br>चकार चिन्तां भीष्मोऽपि विवाहार्थं कनीयसः॥ २८ | जब सत्यवतीके सुन्दर पुत्र विचित्रवीर्य पूर्ण युवा हुए तब भीष्म अपने कनिष्ठ भ्राताके विवाहकी चिन्ता करने लगे॥ २८॥ |
| काशिराजसुतास्तिस्रः सर्वलक्षणसंयुताः।<br>तेन राज्ञा विवाहार्थं स्थापिताश्च स्वयंवरे॥ २९ | उन दिनों काशिराजकी तीन कन्याएँ थीं—जो सभी शुभलक्षणोंसे युक्त थीं; उन राजाने विवाहके लिये उनका स्वयंवर रचाया॥ २९॥ |
| राजानो राजपुत्राश्च समाहूताः सहस्रशः।<br>इच्छास्वयंवरार्थं वै पूज्यमानाः समागताः॥ ३०<br>तत्र भीष्मो महातेजास्ता जहार बलेन वै।<br>निर्मथ्य राजकं सर्वं रथेनैकेन वीर्यवान्॥ ३१<br>स जित्वा पार्थिवान्सर्वांस्ताश्चादाय महारथः।<br>बाहुवीर्येण तेजस्वी ह्याससाद गजाह्वयम्॥ ३२ | हजारों पूज्यमान राजा तथा राजकुमार आमन्त्रित होकर उस इच्छास्वयंवरमें उपस्थित हुए थे तथा पराक्रमी भीष्मने अकेले ही रथपर बैठकर सभी राजाओंको रौंदकर बलपूर्वक उन कन्याओंका हरण कर लिया। वे महारथी तथा तेजस्वी भीष्म अपने बाहुबलसे उन सभी राजाओंको जीतकर उन कन्याओंको लेकर हस्तिनापुर चले आये॥ ३०—३२॥ |
| मातृवद्भगिनीवच्च पुत्रीवच्चिन्तयन्किल।<br>तिस्रः समानयामास कन्यका वामलोचनाः॥ ३३<br>सत्यवत्यै निवेद्याशु द्विजानाहूय सत्वरः।<br>दैवज्ञान्वेदविदुषः पर्यपृच्छच्छुभं दिनम्॥ ३४ | सुन्दर नेत्रोंवाली उन तीनों राजकुमारियोंमें माता, भगिनी एवं पुत्रीकी भावना रखते हुए भीष्म उन्हें ले आये और उन्हें सत्यवतीको सौंपकर शीघ्रतापूर्वक ज्योतिर्विदों तथा वेदके विद्वान् ब्राह्मणोंको बुलाकर उनसे विवाहका शुभ मुहूर्त पूछा॥ ३३—३४॥ |
| कृत्वा विवाहसम्भारं यदा वै भ्रातरं निजम्।<br>विचित्रवीर्यं धर्मिष्ठं विवाहयति ता यदा॥ ३५<br>तदा ज्येष्ठाप्युवाचेदं कन्यका जाह्नवीसूतम्।<br>लज्जमानासितापाङ्गी तिसृणां चारुलोचना॥ ३६<br>गङ्गापुत्र कुरुश्रेष्ठ धर्मज्ञ कुलदीपक।<br>मया स्वयंवरे शाल्वो वृतोऽस्ति मनसा नृपः॥ ३७<br>वृताहं तेन राज्ञा वै चित्ते प्रेमसमाकुले।<br>यथायोग्यं कुरुष्वाद्य कुलस्यास्य परन्तप॥ ३८<br>तेनाहं वृतपूर्वाऽस्मि त्वं च धर्मभृतां वरः।<br>बलवानसि गाङ्गेय यथेच्छसि तथा कुरु॥ ३९ | विवाहकी तैयारी करके अपने छोटे भाई धर्मात्मा विचित्रवीर्यके साथ उन कन्याओंका विवाह करनेको जब भीष्म उद्यत हुए तब उन तीनोंमें सबसे बड़ी एवं सुन्दर नेत्रोंवाली कन्याने गंगापुत्र भीष्मसे लज्जित होते हुए इस प्रकार प्रार्थना की। हे गंगापुत्र! हे कुरुश्रेष्ठ! हे धर्मज्ञ! हे कुलदीपक! मैंने स्वयंवरमें मन-ही-मन राजा शाल्वका पतिरूपमें वरण कर लिया था। उन राजाने भी प्रेमपूर्वक हृदयसे मुझे अपनी पत्नी मान लिया था। हे परन्तप! अब आप इस कुलकी परम्पराके अनुसार जैसा उचित हो, वैसा कीजिये। उन्होंने पहलेसे ही मुझे वरण कर लिया है। हे गांगेय! आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा बलवान् हैं; आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा कीजिये॥ ३५—३९॥ |
| सूत उवाच<br>एवमुक्तस्तया तत्र कन्यया कुरुनन्दनः।<br>अपृच्छद् ब्राह्मणान्वृद्धान्मातरं सचिवांस्तथा॥ ४० | सूतजी बोले— इस प्रकार उस कन्याके कहनेपर कुरुनन्दन भीष्मजीने कुलवृद्धों, ब्राह्मणों, माता सत्यवती तथा मन्त्रियोंसे इस विषयमें परामर्श |