देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| १७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वेषां मतमाज्ञाय गाङ्गेयो धर्मवित्तमः।<br>गच्छेति कन्यकां प्राह यथारुचि वरानने॥ ४१ | किया। सबकी अनुमति प्राप्त करके धर्मज्ञ गङ्गापुत्रने उस कन्यासे कहा—हे वरानने! तुम स्वेच्छापूर्वक जा सकती हो॥ ४०-४१॥ |
| विसर्जिताथ सा तेन गता शाल्वनिकेतनम्।<br>उवाच तं वरारोहा राजानं मनसेप्सितम्॥ ४२<br><br>विनिर्मुक्तास्मि भीष्मेण त्वन्मनस्केति धर्मतः।<br>आगतास्मि महाराज गृहाणाद्य करं मम॥ ४३<br><br>धर्मपत्नी तवात्यन्तं भवामि नृपसत्तम।<br>चिन्तितोऽसि मया पूर्वं त्वयाहं नात्र संशयः॥ ४४ | भीष्मसे विदा होकर वह सुन्दरी कन्या राजा शाल्वके घर गयी और अपने मनकी अभीष्ट बात उनसे कहने लगी—हे महाराज! आपके प्रति आसक्तचित्त जानकर भीष्मने मुझे धर्मपूर्वक मुक्त कर दिया है। अब मैं आ गयी हूँ; आप मेरा पाणिग्रहण कीजिये। मैं आपकी पूर्णरूपसे धर्मपत्नी होऊँगी; मैंने पूर्वमें आपको चाहा है और आपने मुझे; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४२–४४॥ |
| शाल्व उवाच<br>गृहीता त्वं वरारोहे भीष्मेण पश्यतो मम।<br>रथे संस्थापिता तेन न ग्रहीष्ये करं तव॥ ४५<br><br>परोच्छिष्टां च कः कन्यां गृह्णाति मतिमान्नरः।<br>अतोऽहं न ग्रहीष्यामि त्यक्तां भीष्मेण मातृवत्॥ ४६ | शाल्वने कहा— हे सुन्दरि! मेरे देखते-देखते भीष्मने तुम्हें पकड़ा और अपने रथपर बैठा लिया था, अतः अब मैं तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं कर सकता। कौन बुद्धिमान् मनुष्य दूसरेके द्वारा उच्छिष्ट कन्याको स्वीकार करेगा? अतः भीष्मके द्वारा मातृभावनासे भी त्यागी गयी तुम्हें मैं स्वीकार नहीं करूँगा॥ ४५-४६॥ |
| रुदती विलपन्ती सा त्यक्ता तेन महात्मना।<br>पुनर्भीष्मं समागत्य रुदती चेदमब्रवीत्॥ ४७<br><br>शाल्वो मुक्तां त्वया वीर न गृह्णाति गृहाण माम्।<br>धर्मज्ञोऽसि महाभाग मरिष्याम्यन्यथा ह्यहम्॥ ४८ | महात्मा शाल्वने रोती तथा विलाप करती उस कन्याका त्याग कर दिया और वह पुनः भीष्मके यहाँ आकर रोती हुई इस प्रकार कहने लगी—हे वीर! आपके त्याग देनेके कारण शाल्व भी मुझे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। हे महाभाग! आप धर्मज्ञ हैं, इसलिये आप मुझे स्वीकार कीजिये, अन्यथा मैं प्राण दे दूँगी॥ ४७-४८॥ |
| भीष्म उवाच<br>अन्यचित्तां कथं त्वां वै गृह्णामि वरवर्णिनि।<br>पितरं स्वं वरारोहे व्रज शीघ्रं निराकुला॥ ४९ | भीष्म बोले— हे वरवर्णिनि! तुम दूसरेपर आसक्त चित्तवाली हो, अतः मैं तुम्हें कैसे स्वीकार करूँ? हे वरारोहे! अब तुम चिन्ता त्यागकर शीघ्र अपने पिताके पास चली जाओ॥ ४९॥ |
| तथोक्ता सा तु भीष्मेण जगाम वनमेव हि।<br>तपश्चकार विजने तीर्थे परमपावने॥ ५० | भीष्मके ऐसा कहनेपर वह [अपने पिताके घर न जाकर] वनमें चली गयी और वहाँ किसी निर्जन एवं परम पवित्र तीर्थमें तप करने लगी॥ ५०॥ |
| द्वे भार्ये चातिरूपाढ्ये तस्य राज्ञो बभूवतुः।<br>अम्बालिका चाम्बिका च काशिराजसुते शुभे॥ ५१ | काशिराजकी अन्य दो रूपवती तथा कल्याणमयी कन्याएँ अम्बिका एवं अम्बालिका विचित्रवीर्यकी रानियाँ बन गयीं॥ ५१॥ |
| राजा विचित्रवीर्योऽसौ ताभ्यां सह महाबलः।<br>रेमे नानाविहारैश्च गृहे चोपवने तथा॥ ५२ | महाबली राजा विचित्रवीर्य भी उन दोनोंके साथ कभी राजभवनमें और कभी उपवनमें आनन्दपूर्वक विहार करने लगे॥ ५२॥ |