देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २० ] प्रथम स्कन्ध १७५
| वर्षाणि नव राजेन्द्रः कुर्वन् क्रीडां मनोरमाम्।<br>प्रापासौ मरणं भूयो गृहीतो राजयक्ष्मणा ॥ ५३ | इस प्रकार पूरे नौ वर्षतक मनोहर क्रीड़ा करते हुए राजा विचित्रवीर्य राजयक्ष्मारोगसे ग्रसित हो गये और अन्तमें मृत्युको प्राप्त हुए ॥ ५३ ॥ | | मृते पुत्रेऽतिदुःखार्ता जाता सत्यवती तदा।<br>कारयामास पुत्रस्य प्रेतकार्याणि मन्त्रिभिः ॥ ५४ | उस समय पुत्रके मर जानेपर माता सत्यवतीको बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने मन्त्रियोंद्वारा पुत्रके सभी प्रेतकर्म सम्पन्न कराये ॥ ५४ ॥ | | भीष्ममाह तदैकान्ते वचनं चातिदुःखिता।<br>राज्यं कुरु महाभाग पितुस्ते शन्तनोः सुत ॥ ५५<br><br>भ्रातृभार्यां गृहाण त्वं वंशञ्च परिरक्षय।<br>यथा न नाशमायाति ययातेर्वंश इत्युत ॥ ५६ | तत्पश्चात् एक दिन अत्यन्त दुःखी होकर सत्यवतीने भीष्मसे एकान्तमें कहा—हे महाभाग! हे पुत्र! अब तुम अपने पिता शन्तनुका राज्य सम्भालो और अपनी भ्रातृजायाको स्वीकार करो और अपने वंशकी रक्षा करो, जिससे महाराज ययातिका वंश नष्ट न हो जाय ॥ ५५-५६ ॥ | | भीष्म उवाच<br>प्रतिज्ञा मे श्रुता मातः पित्रर्थे या मया कृता।<br>नाहं राज्यं करिष्यामि न चाहं दारसंग्रहम् ॥ ५७ | भीष्म बोले—हे माता! अपने पिताजीके लिये मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे तो आप सुन चुकी हैं। अतः मैं न तो राज्य ग्रहण करूँगा और न तो विवाह ही करूँगा ॥ ५७ ॥ | | सूत उवाच<br>तदा चिन्तातुरा जाता कथं वंशो भवेदिति।<br>नालसाद्धि सुखं मह्यं समुत्पन्ने ह्यराजके ॥ ५८ | सूतजी बोले—तब सत्यवती चिन्तित हो गयीं कि अब वंश कैसे चलेगा ? अपने कर्तव्यके प्रति यदि मैं उदासीन रहूँ तो अराजकताके व्याप्त होनेपर मुझे सुख कैसे प्राप्त होगा ? ॥ ५८ ॥ | | गाङ्गेयस्तामुवाचेदं मा चिन्तां कुरु भामिनि।<br>पुत्रं विचित्रवीर्यस्य क्षेत्रजं चोपपादय ॥ ५९<br><br>कुलीनं द्विजमाहूय वध्वा सह नियोजय।<br>नात्र दोषोऽस्ति वेदेऽपि कुलरक्षाविधौ किल ॥ ६०<br><br>पौत्रं चैवं समुत्पाद्य राज्यं देहि शुचिस्मिते।<br>अहं च पालयिष्यामि तस्य शासनमेव हि ॥ ६१ | [इस प्रकार माताको चिन्तित देखकर] भीष्मने उनसे कहा—हे भामिनि! आप चिन्ता न करें। विचित्रवीर्यकी पत्नीके गर्भसे क्षेत्रज पुत्र उत्पन्न कराइये। किसी कुलीन विद्वान् ब्राह्मणको बुलाकर वधूके साथ नियोग कराइये। इसमें कोई दोष नहीं है; क्योंकि वंशरक्षाका विधान वेदमें भी है। हे प्रसन्नवदने! इस प्रकार पौत्र उत्पन्न कराकर आप उसीको राज्य सौंप दीजिये, मैं उसके राज्यशासनका सम्यक् संरक्षण करता रहूँगा ॥ ५९—६१ ॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कानीनं स्वसुतं मुनिम्।<br>जगाम मनसा व्यासं द्वैपायनमकल्मषम् ॥ ६२ | भीष्मकी वह बात सुनकर सत्यवतीने अपनी कुमारी अवस्थामें उत्पन्न अपने निर्दोष पुत्र द्वैपायन व्यासमुनिका स्मरण किया ॥ ६२ ॥ | | स्मृतमात्रस्ततो व्यास आजगाम स तापसः।<br>कृत्वा प्रणामं मात्रेऽथ संस्थितो दीप्तिमान्मुनिः ॥ ६३ | स्मरण करते ही तपस्वी व्यासजी वहाँ आ पहुँचे और माताको प्रणाम करके वे तेजस्वी मुनि सामने खड़े हो गये ॥ ६३ ॥ |