भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 185
१७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०
भीष्मेण पूजितः कामं सत्यवत्या च मानितः।<br>तस्थौ तत्र महातेजा विधूमोऽग्निरिवापरः॥ ६४भीष्मने उनकी भलीभाँति पूजा की और माता सत्यवतीने भी आदर किया। उस समय महातेजस्वी व्यासजी वहाँ इस प्रकार सुशोभित हुए मानो धूमरहित साक्षात् दूसरे अग्निदेव ही हों॥ ६४॥
तमुवाच मुनिं माता पुत्रमुत्पादयाधुना।<br>क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य सुन्दरं तव वीर्यजम्॥ ६५माता सत्यवतीने व्यासमुनिसे कहा—इस समय तुम विचित्रवीर्यके क्षेत्रमें अपने तेजसे सुन्दर पुत्र उत्पन्न करो॥ ६५॥
व्यासः श्रुत्वा वचो मातुराप्तवाक्यममन्यत।<br>ओमित्युक्त्वा स्थितस्तत्र ऋतुकालमचिन्तयत्॥ ६६माताका वचन सुनकर व्यासजीने उसे आप्तवाक्य माना और ‘ठीक है’—कहकर वे वहींपर ठहर गये और ऋतुकालकी प्रतीक्षा करने लगे॥ ६६॥
अम्बिका च यदा स्नाता नारी ऋतुमती तदा।<br>सङ्गं प्राप्य मुनेः पुत्रमसूतान्धं महाबलम्॥ ६७<br><br>जन्मान्धं च सुतं वीक्ष्य दुःखिता सत्यवत्यपि।<br>द्वितीयां च वधूमाह पुत्रमुत्पादयाशु वै॥ ६८जब अम्बिका ऋतुमती होकर स्नान कर चुकी तब उसने मुनि व्यासजीके तेजसे एक पुत्र उत्पन्न किया, जो महाबली और जन्मान्ध था। उस बालकको जन्मान्ध देखकर सत्यवतीको बड़ा दुःख हुआ। तब उन्होंने दूसरी वधू अम्बालिका से कहा कि तुम भी शीघ्र एक पुत्र उत्पन्न करो॥ ६७-६८॥
ऋतुकालेऽथ सम्प्राप्ते व्यासेन सह सङ्गता।<br>तथा चाम्बालिका रात्रौ गर्भं नारी दधार सा॥ ६९<br><br>सोऽपि पाण्डुः सुतो जातो राज्ययोग्यो न सम्मतः।<br>पुत्रार्थं प्रेरयामास वर्षान्ते च पुनर्वधूम्॥ ७०<br><br>आहूय च ततो व्यासं सम्प्रार्थ्य मुनिसत्तमम्।<br>प्रेषयामास रात्रौ सा शयनागारमुत्तमम्॥ ७१<br><br>न गता च वधूस्तत्र प्रेष्या सम्प्रेषिता तया।<br>तस्यां च विदुरो जातो दास्यां धर्मांशतः शुभः॥ ७२ऋतुकाल प्राप्त होनेपर उस अम्बालिकाने व्यासजीसे गर्भ धारण किया। उससे उत्पन्न पुत्र भी पाण्डुरोगसे ग्रसित होनेके कारण राजा होनेके योग्य नहीं था। इसलिये माताने वधू अम्बालिकाको एक वर्षके बाद पुनः एक पुत्रके लिये प्रेरित किया। माता सत्यवतीने मुनिश्रेष्ठ व्यासजीका आह्वानकर उनसे इसके लिये प्रार्थना की, परंतु उसने स्वयं न जाकर अपनी दासीको भेज दिया। उस दासीके गर्भसे धर्मके अंशसे युक्त शुभ विदुर उत्पन्न हुए॥ ६९—७२॥
एवं व्यासेन ते पुत्रा धृतराष्ट्रादयस्त्रयः।<br>उत्पादिता महावीरा वंशरक्षणहेतवे॥ ७३<br><br>एतद्वः सर्वमाख्यातं तस्य वंशसमुद्भवम्।<br>व्यासेन रक्षितो वंशो भ्रातृधर्मविदानघाः॥ ७४इस प्रकार वंशकी रक्षाके लिये व्यासजीने धृतराष्ट्र आदि तीन महापराक्रमी पुत्र उत्पन्न किये। भ्रातृ-धर्मको जाननेवाले व्यासजीने ऐसा करके वंशकी रक्षा की। हे पुण्यात्मा मुनिजनो! इस प्रकार उनकी वंशोत्पत्तिसे सम्बन्धित समस्त कथानक मैंने आपलोगोंसे कह दिया॥ ७३-७४॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे धृतराष्ट्रादीनामुत्पत्तिवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥


॥ प्रथमः स्कन्धः समाप्तः॥