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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

| १७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वेषां मतमाज्ञाय गाङ्गेयो धर्मवित्तमः।<br>गच्छेति कन्यकां प्राह यथारुचि वरानने॥ ४१किया। सबकी अनुमति प्राप्त करके धर्मज्ञ गङ्गापुत्रने उस कन्यासे कहा—हे वरानने! तुम स्वेच्छापूर्वक जा सकती हो॥ ४०-४१॥
विसर्जिताथ सा तेन गता शाल्वनिकेतनम्।<br>उवाच तं वरारोहा राजानं मनसेप्सितम्॥ ४२<br><br>विनिर्मुक्तास्मि भीष्मेण त्वन्मनस्केति धर्मतः।<br>आगतास्मि महाराज गृहाणाद्य करं मम॥ ४३<br><br>धर्मपत्नी तवात्यन्तं भवामि नृपसत्तम।<br>चिन्तितोऽसि मया पूर्वं त्वयाहं नात्र संशयः॥ ४४भीष्मसे विदा होकर वह सुन्दरी कन्या राजा शाल्वके घर गयी और अपने मनकी अभीष्ट बात उनसे कहने लगी—हे महाराज! आपके प्रति आसक्तचित्त जानकर भीष्मने मुझे धर्मपूर्वक मुक्त कर दिया है। अब मैं आ गयी हूँ; आप मेरा पाणिग्रहण कीजिये। मैं आपकी पूर्णरूपसे धर्मपत्नी होऊँगी; मैंने पूर्वमें आपको चाहा है और आपने मुझे; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४२–४४॥
शाल्व उवाच<br>गृहीता त्वं वरारोहे भीष्मेण पश्यतो मम।<br>रथे संस्थापिता तेन न ग्रहीष्ये करं तव॥ ४५<br><br>परोच्छिष्टां च कः कन्यां गृह्णाति मतिमान्नरः।<br>अतोऽहं न ग्रहीष्यामि त्यक्तां भीष्मेण मातृवत्॥ ४६शाल्वने कहा— हे सुन्दरि! मेरे देखते-देखते भीष्मने तुम्हें पकड़ा और अपने रथपर बैठा लिया था, अतः अब मैं तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं कर सकता। कौन बुद्धिमान् मनुष्य दूसरेके द्वारा उच्छिष्ट कन्याको स्वीकार करेगा? अतः भीष्मके द्वारा मातृभावनासे भी त्यागी गयी तुम्हें मैं स्वीकार नहीं करूँगा॥ ४५-४६॥
रुदती विलपन्ती सा त्यक्ता तेन महात्मना।<br>पुनर्भीष्मं समागत्य रुदती चेदमब्रवीत्॥ ४७<br><br>शाल्वो मुक्तां त्वया वीर न गृह्णाति गृहाण माम्।<br>धर्मज्ञोऽसि महाभाग मरिष्याम्यन्यथा ह्यहम्॥ ४८महात्मा शाल्वने रोती तथा विलाप करती उस कन्याका त्याग कर दिया और वह पुनः भीष्मके यहाँ आकर रोती हुई इस प्रकार कहने लगी—हे वीर! आपके त्याग देनेके कारण शाल्व भी मुझे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। हे महाभाग! आप धर्मज्ञ हैं, इसलिये आप मुझे स्वीकार कीजिये, अन्यथा मैं प्राण दे दूँगी॥ ४७-४८॥
भीष्म उवाच<br>अन्यचित्तां कथं त्वां वै गृह्णामि वरवर्णिनि।<br>पितरं स्वं वरारोहे व्रज शीघ्रं निराकुला॥ ४९भीष्म बोले— हे वरवर्णिनि! तुम दूसरेपर आसक्त चित्तवाली हो, अतः मैं तुम्हें कैसे स्वीकार करूँ? हे वरारोहे! अब तुम चिन्ता त्यागकर शीघ्र अपने पिताके पास चली जाओ॥ ४९॥
तथोक्ता सा तु भीष्मेण जगाम वनमेव हि।<br>तपश्चकार विजने तीर्थे परमपावने॥ ५०भीष्मके ऐसा कहनेपर वह [अपने पिताके घर न जाकर] वनमें चली गयी और वहाँ किसी निर्जन एवं परम पवित्र तीर्थमें तप करने लगी॥ ५०॥
द्वे भार्ये चातिरूपाढ्ये तस्य राज्ञो बभूवतुः।<br>अम्बालिका चाम्बिका च काशिराजसुते शुभे॥ ५१काशिराजकी अन्य दो रूपवती तथा कल्याणमयी कन्याएँ अम्बिका एवं अम्बालिका विचित्रवीर्यकी रानियाँ बन गयीं॥ ५१॥
राजा विचित्रवीर्योऽसौ ताभ्यां सह महाबलः।<br>रेमे नानाविहारैश्च गृहे चोपवने तथा॥ ५२महाबली राजा विचित्रवीर्य भी उन दोनोंके साथ कभी राजभवनमें और कभी उपवनमें आनन्दपूर्वक विहार करने लगे॥ ५२॥

अ० २० ] प्रथम स्कन्ध १७५

अ० २० ] प्रथम स्कन्ध १७५


| वर्षाणि नव राजेन्द्रः कुर्वन् क्रीडां मनोरमाम्।<br>प्रापासौ मरणं भूयो गृहीतो राजयक्ष्मणा ॥ ५३ | इस प्रकार पूरे नौ वर्षतक मनोहर क्रीड़ा करते हुए राजा विचित्रवीर्य राजयक्ष्मारोगसे ग्रसित हो गये और अन्तमें मृत्युको प्राप्त हुए ॥ ५३ ॥ | | मृते पुत्रेऽतिदुःखार्ता जाता सत्यवती तदा।<br>कारयामास पुत्रस्य प्रेतकार्याणि मन्त्रिभिः ॥ ५४ | उस समय पुत्रके मर जानेपर माता सत्यवतीको बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने मन्त्रियोंद्वारा पुत्रके सभी प्रेतकर्म सम्पन्न कराये ॥ ५४ ॥ | | भीष्ममाह तदैकान्ते वचनं चातिदुःखिता।<br>राज्यं कुरु महाभाग पितुस्ते शन्तनोः सुत ॥ ५५<br><br>भ्रातृभार्यां गृहाण त्वं वंशञ्च परिरक्षय।<br>यथा न नाशमायाति ययातेर्वंश इत्युत ॥ ५६ | तत्पश्चात् एक दिन अत्यन्त दुःखी होकर सत्यवतीने भीष्मसे एकान्तमें कहा—हे महाभाग! हे पुत्र! अब तुम अपने पिता शन्तनुका राज्य सम्भालो और अपनी भ्रातृजायाको स्वीकार करो और अपने वंशकी रक्षा करो, जिससे महाराज ययातिका वंश नष्ट न हो जाय ॥ ५५-५६ ॥ | | भीष्म उवाच<br>प्रतिज्ञा मे श्रुता मातः पित्रर्थे या मया कृता।<br>नाहं राज्यं करिष्यामि न चाहं दारसंग्रहम् ॥ ५७ | भीष्म बोले—हे माता! अपने पिताजीके लिये मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे तो आप सुन चुकी हैं। अतः मैं न तो राज्य ग्रहण करूँगा और न तो विवाह ही करूँगा ॥ ५७ ॥ | | सूत उवाच<br>तदा चिन्तातुरा जाता कथं वंशो भवेदिति।<br>नालसाद्धि सुखं मह्यं समुत्पन्ने ह्यराजके ॥ ५८ | सूतजी बोले—तब सत्यवती चिन्तित हो गयीं कि अब वंश कैसे चलेगा ? अपने कर्तव्यके प्रति यदि मैं उदासीन रहूँ तो अराजकताके व्याप्त होनेपर मुझे सुख कैसे प्राप्त होगा ? ॥ ५८ ॥ | | गाङ्गेयस्तामुवाचेदं मा चिन्तां कुरु भामिनि।<br>पुत्रं विचित्रवीर्यस्य क्षेत्रजं चोपपादय ॥ ५९<br><br>कुलीनं द्विजमाहूय वध्वा सह नियोजय।<br>नात्र दोषोऽस्ति वेदेऽपि कुलरक्षाविधौ किल ॥ ६०<br><br>पौत्रं चैवं समुत्पाद्य राज्यं देहि शुचिस्मिते।<br>अहं च पालयिष्यामि तस्य शासनमेव हि ॥ ६१ | [इस प्रकार माताको चिन्तित देखकर] भीष्मने उनसे कहा—हे भामिनि! आप चिन्ता न करें। विचित्रवीर्यकी पत्नीके गर्भसे क्षेत्रज पुत्र उत्पन्न कराइये। किसी कुलीन विद्वान् ब्राह्मणको बुलाकर वधूके साथ नियोग कराइये। इसमें कोई दोष नहीं है; क्योंकि वंशरक्षाका विधान वेदमें भी है। हे प्रसन्नवदने! इस प्रकार पौत्र उत्पन्न कराकर आप उसीको राज्य सौंप दीजिये, मैं उसके राज्यशासनका सम्यक् संरक्षण करता रहूँगा ॥ ५९—६१ ॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कानीनं स्वसुतं मुनिम्।<br>जगाम मनसा व्यासं द्वैपायनमकल्मषम् ॥ ६२ | भीष्मकी वह बात सुनकर सत्यवतीने अपनी कुमारी अवस्थामें उत्पन्न अपने निर्दोष पुत्र द्वैपायन व्यासमुनिका स्मरण किया ॥ ६२ ॥ | | स्मृतमात्रस्ततो व्यास आजगाम स तापसः।<br>कृत्वा प्रणामं मात्रेऽथ संस्थितो दीप्तिमान्मुनिः ॥ ६३ | स्मरण करते ही तपस्वी व्यासजी वहाँ आ पहुँचे और माताको प्रणाम करके वे तेजस्वी मुनि सामने खड़े हो गये ॥ ६३ ॥ |

१७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०
भीष्मेण पूजितः कामं सत्यवत्या च मानितः।<br>तस्थौ तत्र महातेजा विधूमोऽग्निरिवापरः॥ ६४भीष्मने उनकी भलीभाँति पूजा की और माता सत्यवतीने भी आदर किया। उस समय महातेजस्वी व्यासजी वहाँ इस प्रकार सुशोभित हुए मानो धूमरहित साक्षात् दूसरे अग्निदेव ही हों॥ ६४॥
तमुवाच मुनिं माता पुत्रमुत्पादयाधुना।<br>क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य सुन्दरं तव वीर्यजम्॥ ६५माता सत्यवतीने व्यासमुनिसे कहा—इस समय तुम विचित्रवीर्यके क्षेत्रमें अपने तेजसे सुन्दर पुत्र उत्पन्न करो॥ ६५॥
व्यासः श्रुत्वा वचो मातुराप्तवाक्यममन्यत।<br>ओमित्युक्त्वा स्थितस्तत्र ऋतुकालमचिन्तयत्॥ ६६माताका वचन सुनकर व्यासजीने उसे आप्तवाक्य माना और ‘ठीक है’—कहकर वे वहींपर ठहर गये और ऋतुकालकी प्रतीक्षा करने लगे॥ ६६॥
अम्बिका च यदा स्नाता नारी ऋतुमती तदा।<br>सङ्गं प्राप्य मुनेः पुत्रमसूतान्धं महाबलम्॥ ६७<br><br>जन्मान्धं च सुतं वीक्ष्य दुःखिता सत्यवत्यपि।<br>द्वितीयां च वधूमाह पुत्रमुत्पादयाशु वै॥ ६८जब अम्बिका ऋतुमती होकर स्नान कर चुकी तब उसने मुनि व्यासजीके तेजसे एक पुत्र उत्पन्न किया, जो महाबली और जन्मान्ध था। उस बालकको जन्मान्ध देखकर सत्यवतीको बड़ा दुःख हुआ। तब उन्होंने दूसरी वधू अम्बालिका से कहा कि तुम भी शीघ्र एक पुत्र उत्पन्न करो॥ ६७-६८॥
ऋतुकालेऽथ सम्प्राप्ते व्यासेन सह सङ्गता।<br>तथा चाम्बालिका रात्रौ गर्भं नारी दधार सा॥ ६९<br><br>सोऽपि पाण्डुः सुतो जातो राज्ययोग्यो न सम्मतः।<br>पुत्रार्थं प्रेरयामास वर्षान्ते च पुनर्वधूम्॥ ७०<br><br>आहूय च ततो व्यासं सम्प्रार्थ्य मुनिसत्तमम्।<br>प्रेषयामास रात्रौ सा शयनागारमुत्तमम्॥ ७१<br><br>न गता च वधूस्तत्र प्रेष्या सम्प्रेषिता तया।<br>तस्यां च विदुरो जातो दास्यां धर्मांशतः शुभः॥ ७२ऋतुकाल प्राप्त होनेपर उस अम्बालिकाने व्यासजीसे गर्भ धारण किया। उससे उत्पन्न पुत्र भी पाण्डुरोगसे ग्रसित होनेके कारण राजा होनेके योग्य नहीं था। इसलिये माताने वधू अम्बालिकाको एक वर्षके बाद पुनः एक पुत्रके लिये प्रेरित किया। माता सत्यवतीने मुनिश्रेष्ठ व्यासजीका आह्वानकर उनसे इसके लिये प्रार्थना की, परंतु उसने स्वयं न जाकर अपनी दासीको भेज दिया। उस दासीके गर्भसे धर्मके अंशसे युक्त शुभ विदुर उत्पन्न हुए॥ ६९—७२॥
एवं व्यासेन ते पुत्रा धृतराष्ट्रादयस्त्रयः।<br>उत्पादिता महावीरा वंशरक्षणहेतवे॥ ७३<br><br>एतद्वः सर्वमाख्यातं तस्य वंशसमुद्भवम्।<br>व्यासेन रक्षितो वंशो भ्रातृधर्मविदानघाः॥ ७४इस प्रकार वंशकी रक्षाके लिये व्यासजीने धृतराष्ट्र आदि तीन महापराक्रमी पुत्र उत्पन्न किये। भ्रातृ-धर्मको जाननेवाले व्यासजीने ऐसा करके वंशकी रक्षा की। हे पुण्यात्मा मुनिजनो! इस प्रकार उनकी वंशोत्पत्तिसे सम्बन्धित समस्त कथानक मैंने आपलोगोंसे कह दिया॥ ७३-७४॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे धृतराष्ट्रादीनामुत्पत्तिवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥


॥ प्रथमः स्कन्धः समाप्तः॥


श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥

श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

द्वितीयः स्कन्धः

अथ प्रथमोऽध्यायः

ब्राह्मणके शापसे अद्रिका अप्सराका मछली होना और उससे राजा मत्स्य तथा मत्स्यगन्धाकी उत्पत्ति

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>आश्चर्यकरमेतत्ते वचनं गर्भहेतुकम्।<br>सन्देहोऽत्र समुत्पन्नः सर्वेषां नस्तपस्विनाम्॥ १ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] आपकी यह बात आश्चर्यजनक एवं रहस्यपूर्ण है। इस सम्बन्धमें हम सब तपस्वियोंको महान् सन्देह उत्पन्न हो गया है॥ १॥
माता व्यासस्य मेधाविन्नाम्ना सत्यवतीति च।<br>विवाहिता पुरा ज्ञाता राज्ञा शन्तनुना यथा॥ २<br><br>तस्याः पुत्रः कथं व्यासः सती स्वभवने स्थिता।<br>ईदृशी सा कथं राज्ञा पुनः शन्तनुना वृता॥ ३<br><br>तस्यां पुत्रावुभौ जातौ तत्त्वं कथय सुव्रत।<br>विस्तरेण महाभाग कथां परमपावनीम्॥ ४<br><br>उत्पत्तिं वद व्यासस्य सत्यवत्यास्तथा पुनः।<br>श्रोतुकामाः पुनः सर्वे ऋषयः संशितव्रताः॥ ५हे मेधाविन्! पूर्वकालमें सत्यवती नामसे विख्यात व्यासजीकी माताका राजा शन्तनुके साथ जिस प्रकार विवाह हुआ, उन सतीके अपने घरमें रहते हुए भी उनसे पुत्ररूपमें व्यास कैसे उत्पन्न हुए, ऐसी सत्यवतीका शन्तनुने पुनः वरण कैसे किया और उनसे दो पुत्रोंकी उत्पत्ति कैसे हुई? हे सुव्रत! हे महाभाग! आप इस परम पावन कथाको विस्तारपूर्वक कहिये। आप व्यासजी तथा सत्यवतीकी उत्पत्तिका वर्णन कीजिये; हम सभी व्रतधारी ऋषि इस विषयमें सुननेके लिये उत्सुक हैं॥ २–५॥
सूत उवाच<br>प्रणम्य परमां शक्तिं चतुर्वर्गप्रदायिनीम्।<br>आदिशक्तिं वदिष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम्॥ ६**सूतजी बोले—**मैं चतुर्वर्ग [धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष] प्रदान करनेवाली परमा आदिशक्तिको प्रणाम करके यह शुभ पौराणिक कथा कहूँगा॥ ६॥
यस्योच्चारणमात्रेण सिद्धिर्भवति शाश्वती।<br>व्याजेनापि हि बीजस्य वाग्भवस्य विशेषतः॥ ७<br><br>सम्यक् सर्वात्मना सर्वैः सर्वकामार्थसिद्धये।<br>स्मर्तव्या सर्वथा देवी वाञ्छितार्थप्रदायिनी॥ ८जिनके विशिष्ट वाग्भव बीजमन्त्र (ऐं)-का किसी भी बहानेसे उच्चारण करते ही शाश्वती सिद्धि प्राप्त हो जाती है, उन इच्छित फल देनेवाली भगवतीका सभी लोगोंको अपनी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेके लिये समर्पण भावसे सम्यक् स्मरण करना चाहिये॥ ७-८॥
राजोपरिचरो नाम धार्मिकः सत्यसङ्गरः।<br>चेदिदेशपतिः श्रीमान् बभूव द्विजपूजकः॥ ९उपरिचर नामके एक सत्यवादी, धर्मात्मा, ब्राह्मणपूजक तथा श्रीमान् राजा हुए, जो चेदि
१७८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तपसा तस्य तुष्टेन विमानं स्फाटिकं शुभम्।<br>दत्तमिन्द्रेण तत्तस्मै सुन्दरं प्रियकाम्यया॥ १०देशके शासक थे। उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर देवराज इन्द्रने उन्हें प्रसन्न करनेके लिये स्फटिक मणिका बना हुआ एक सुन्दर तथा दिव्य विमान दिया॥ ९-१०॥
तेनारूढस्तु सर्वत्र याति दिव्येन भूपतिः।<br>न भूमावुपरीस्थोऽसौ तेनोपरिचरो वसुः॥ ११<br><br>विख्यातः सर्वलोकेषु धर्मनित्यः स भूपतिः।<br>तस्य भार्या वरारोहा गिरिका नाम सुन्दरी॥ १२उस दिव्य विमानपर चढ़कर चेदिराज सर्वत्र विचरण करते थे। वे कभी भूमिपर न उतरने तथा पृथ्वीसे ऊपर-ही-ऊपर चलनेके कारण सभी लोकोंमें 'उपरिचर' वसुके नामसे प्रसिद्ध हुए। वे राजा अत्यन्त धर्मपरायण थे। उनकी धर्मपत्नीका नाम गिरिका था, जो रूपवती तथा सुन्दरी थी॥ ११-१२॥
पुत्राश्चास्य महावीर्याः पञ्चासन्नमितौजसः।<br>पृथग्देशेषु राजानः स्थापितास्तेन भूभुजा॥ १३महाराज उपरिचरके पाँच पुत्र हुए जो बड़े महान् वीर एवं परम प्रतापी थे। [यथासमय] उन्होंने अपने राजकुमारोंको अलग-अलग देशोंका राजा बना दिया॥ १३॥
वसोस्तु पत्नी गिरिका कामान् काले न्यवेदयत्।<br>ऋतुकालमनुप्राप्ता स्नाता पुंसवने शुचिः॥ १४<br><br>तदहः पितरश्चैनमूचुर्जहि मृगानिति।<br>तच्छ्रुत्वा चिन्तयामास भार्यामृतुमतीं तथा॥ १५<br><br>पितृवाक्यं गुरुं मत्वा कर्तव्यमिति निश्चितम्।<br>चचार मृगयां राजा गिरिकां मनसा स्मरन्॥ १६एक बार राजा वसुकी पत्नी गिरिकाने ऋतुकालके स्नानसे पवित्र होकर राजासे पुत्रप्राप्तिकी कामना की। जिस समय वह प्रार्थना करने लगी, उसी समय उनके पितरोंने उन राजासे कहा— हे राजन्! मृगोंको मार लाओ—इस आदेशको सुनकर राजाको अपनी ऋतुमती पत्नीका भी स्मरण हो आया, किंतु पितरोंकी आज्ञा श्रेष्ठ मानकर तथा अपने कर्तव्यका निश्चयकर राजा मन-ही-मन गिरिकाका स्मरण करते हुए आखेटके लिये चल पड़े॥ १४-१६॥
वने स्थितः स राजर्षिश्चिन्तते सस्मार भामिनीम्।<br>अतीव रूपसम्पन्नां साक्षाच्छ्रियमिवापराम्॥ १७<br><br>तस्य रेतः प्रचस्कन्द स्मरतस्तां च कामिनीम्।<br>वटपत्रे तु तद्राजा स्कन्नमात्रं समाक्षिपत्॥ १८वनमें रहते हुए राजा वसु साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान रूपवती अपनी पत्नीका स्मरण करने लगे। इस प्रकार उस कामिनीके ध्यानसे एकाएक उनका वीर्य स्खलित हो गया और राजाने शीघ्र ही उस स्खलित वीर्यको बरगदके पत्तेपर रख लिया॥ १७-१८॥
इदं वृथा परिस्कन्नं रेतो वै न भवेत्कथम्।<br>ऋतुकालं च विज्ञाय मतिं चक्रे नृपस्तदा॥ १९<br><br>अमोघं सर्वथा वीर्यं मम चैतन्न संशयः।<br>प्रियायै प्रेषयाम्येतदिति बुद्धिमकल्पयत्॥ २०यह स्खलित तेज व्यर्थ न हो—[यह सोचकर] तथा स्त्रीका ऋतुकाल जानकर उन्होंने ऐसा निश्चय कर लिया कि मेरा तेज सर्वथा अमोघ है, इसमें सन्देह नहीं है अतः अवश्य ही इसे मैं रानीके पास भेज दूँ॥ १९-२०॥
शुक्रप्रस्थापने कालं महिष्याः प्रसमीक्ष्य सः।<br>अभिमन्त्र्याथ तद्वीर्यं वटपर्णपुटे कृतम्॥ २१राजा जब उस वीर्यको बरगदके दोनेमें रखकर अपनी रानीके पास भेजने लगे तब उन्होंने रानीका ऋतुकाल जानकर उस वीर्यको अभिमन्त्रित किया।
अ० १ ]द्वितीय स्कन्ध१७९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पार्श्वस्थं श्येनमाभाष्य राजोवाच द्विजं प्रति।<br>गृहाणेदं महाभाग गच्छ शीघ्रं गृहं मम॥ २२<br><br>मत्प्रियार्थमिदं सौम्य गृहीत्वा त्वं गृहं नय।<br>गिरिकायै प्रयच्छाशु तस्यास्त्वार्तवमद्य वै॥ २३राजाने पास ही बैठे हुए बाज पक्षीको बुलाकर उससे कहा—‘हे महाभाग! तुम इसे ग्रहण करो और शीघ्र ही मेरे घर चले जाओ। हे सौम्य! मेरा हित करनेके लिये इसे लेकर तुम मेरे घर जाओ और इसे शीघ्र ही गिरिकाको दे देना; क्योंकि आज ही उसका ऋतुकाल है’॥ २१—२३॥
सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा प्रददौ पर्णं श्येनाय नृपसत्तमः।<br>स गृहीत्वोत्पपाताशु गगनं गतिवित्तमः॥ २४**सूतजी बोले—**ऐसा कहकर नृपश्रेष्ठने बाजको वह दोना दे दिया और वह द्रुतगामी बाज भी उसे लेकर शीघ्र ही आकाशमें उड़ने लगा॥ २४॥
गच्छन्तं गगनं श्येनं धृत्वा चञ्चुपुटे पुटम्।<br>तमपश्यदथायान्तं खगं श्येनस्तथापरः॥ २५चोंचमें पत्तेका दोना लेकर आकाशमें उड़ते हुए उस बाजको एक दूसरे बाजपक्षीने अपनी ओर आते हुए देखा॥ २५॥
आमिषं स तु विज्ञाय शीघ्रमभ्यद्रवत्खगम्।<br>तुण्डयुद्धमथाकाशे तावुभौ सम्प्रचक्रतुः॥ २६<br><br>युद्ध्यतोरपतद्रेतस्तच्चापि यमुनाम्भसि।<br>खगौ तौ निर्गतौ कामं पुटके पतिते तदा॥ २७बाजकी चोंचमें मांसका टुकड़ा समझकर तत्काल उसने उस बाजपर आक्रमण कर दिया। दोनों बाजोंके बीच आकाशमें चोंचोंसे घोर युद्ध होने लगा। उन दोनोंके युद्ध करते समय वीर्यवाला वह दोना यमुनाजीके जलमें जा गिरा। दोनेके गिर जानेपर दोनों पक्षी वहाँसे यथेच्छ दिशामें चले गये॥ २६-२७॥
एतस्मिन्समये काचिदद्रिका नाम चाप्सराः।<br>ब्राह्मणं समनुप्राप्तं सन्ध्यावन्दनतत्परम्॥ २८<br><br>कुर्वन्ती जलकेलिं सा जले मग्ना चचार सा।<br>जग्राह चरणं नारी द्विजस्य वरवर्णिनी॥ २९उसी समय अद्रिका नामकी एक अप्सरा जलमें निमग्न होकर जलक्रीडा कर रही थी। उस सुन्दरी स्त्रीने वहाँपर उपस्थित सन्ध्यावन्दन करनेमें तत्पर एक ब्राह्मणको देखा और उन ब्राह्मणका पैर पकड़ लिया॥ २८-२९॥
प्राणायामपरः सोऽथ दृष्ट्वा तां कामचारिणीम्।<br>शशाप भव मत्स्यी त्वं ध्यानविघ्नकरी यतः॥ ३०<br><br>सा शप्ता विप्रमुख्येन बभूव यमुनाचरी।<br>शफरी रूपसम्पन्ना ह्यद्रिका च वराप्सराः॥ ३१प्राणायाम करते हुए ब्राह्मणने उस स्वेच्छाचारिणीको देखकर उसे यह शाप दे दिया कि ‘तुमने मेरे ध्यानमें विघ्न डाला है, अतएव तुम मछली हो जाओ।’ इस प्रकार ब्राह्मणश्रेष्ठसे शाप पाकर वह अद्रिका नामकी रूपवती श्रेष्ठ अप्सरा मछली बनकर यमुनाके जलमें विचरने लगी॥ ३०-३१॥
श्येनपादपरिभ्रष्टं तच्छुक्रमथ वासवी।<br>जग्राह तरसाभ्येत्य साद्रिका मत्स्यरूपिणी॥ ३२बाजके पादाघातसे गिरे हुए उस वीर्यके पास जाकर मत्स्यरूपधारिणी अद्रिका अप्सराने उसे शीघ्रतापूर्वक निगल लिया॥ ३२॥
अथ कालेन कियता मत्स्यीं तां मत्स्यजीवनः।<br>सम्प्राप्ते दशमे मासि बबन्ध तां मनोरमाम्॥ ३३कुछ समय बाद दस महीने बीतनेपर एक मछुआरेने उस सुन्दर मछलीको अपने जालमें फँसा लिया॥ ३३॥
उदरं विददाराशु स तस्या मत्स्यजीवनः।<br>युग्मं विनिःसृतं तस्मादुदरान्मानुषाकृति॥ ३४उस मछुआरेने शीघ्र ही उस मछलीका पेट चीर दिया। उसके उदरसे मनुष्यके आकारवाली जुड़वाँ सन्तति निकली॥ ३४॥
१८०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
बालः कुमारः सुभगस्तथा कन्या शुभानना।<br>दृष्ट्वाश्चर्यमिदं सोऽथ विस्मयं परमं गतः ॥ ३५उन दोनोंमें एक रूपवान् बालक तथा एक सुन्दर मुखवाली बालिका थी। इस अद्भुत घटनाको देखकर वह भी अत्यन्त विस्मित हुआ॥ ३५॥
राज्ञे निवेदयामास पुत्रौ द्वौ तु झषोद्भवौ।<br>राजापि विस्मयाविष्टः सुतं जग्राह तं शुभम् ॥ ३६उसने मछलीके पेटसे निकले उन दोनों बच्चोंको राजा उपरिचरको सौंप दिया। राजा भी आश्चर्यचकित हुआ और उसने उस सुन्दर पुत्रको ले लिया॥ ३६॥
स मत्स्यो नाम राजासौ धार्मिकः सत्यसङ्गरः।<br>वसुपुत्रो महातेजाः पित्रा तुल्यपराक्रमः ॥ ३७वह वसुपुत्र मत्स्य नामक राजा हुआ, जो अपने पिताके समान ही धर्मात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, महातेजस्वी तथा पराक्रमी था॥ ३७॥
कालिका वसुना दत्ता तरसा जलजीविने।<br>नाम्ना कालीति विख्याता तथा मत्स्योदरीति च ॥ ३८राजा उपरिचर वसुने वह कन्या उस मछुआरेको ही दे दी, जो आगे चलकर काली तथा मत्स्योदरी नामसे प्रसिद्ध हुई। अपने गुणविशेषके कारण वह मत्स्यगन्धा नामसे कही जाने लगी। उस मछुआरे दाशके घर वह सुन्दरी वासवी धीरे-धीरे बढ़ने लगी॥ ३८-३९॥
मत्स्यगन्धेति नाम्ना वै गुणेन समजायत।<br>विवर्धमाना दाशस्य गृहे सा वासवी शुभा ॥ ३९
ऋषय ऊचुः<br>अद्रिका मुनिना शप्ता मत्स्यी जाता वराप्सराः।<br>विदारिता च दाशेन मृता च भक्षिता पुनः ॥ ४०ऋषिगण बोले— हे सूतजी! मुनिके द्वारा शापित वह अद्रिका नामकी श्रेष्ठ अप्सरा जब मछली हो गयी और मछुआरेने उसे चीर डाला, तब वह मर गयी अथवा उसने उसे खा लिया। उस अप्सराका फिर क्या हुआ? उसके शापकी समाप्ति कैसे हुई और उसे पुनः स्वर्ग कैसे मिला? यह बताइये॥ ४०-४१॥
किं बभूव पुनस्तस्या अप्सराया वदस्व तत्।<br>शापस्यान्तं कथं सूत कथं स्वर्गमवाप सा ॥ ४१
सूत उवाच<br>शप्ता यदा सा मुनिना विस्मिता सम्बभूव ह।<br>स्तुतिं चकार विप्रस्य दीनेव रुदती तदा ॥ ४२सूतजी बोले— जब मुनिने उसे शाप दिया, तब वह विस्मित हो गयी और दीनतापूर्वक रोती हुई उस ब्राह्मणकी स्तुति करने लगी॥ ४२॥
दयावान् ब्राह्मणः प्राह तां तदा रुदतीं स्त्रियम्।<br>मा शोकं कुरु कल्याणि शापान्तं ते वदाम्यहम् ॥ ४३दयालु ब्राह्मणने उस रोती हुई स्त्रीसे कहा—हे कल्याणि! तुम शोक न करो, मैं तुम्हारे शापके अन्तका उपाय बताता हूँ। हे शुभे! मैंने क्रुद्ध होकर जो शाप दिया है, उससे तुम मत्स्ययोनिको प्राप्त होओगी; किंतु तुम अपने उदरसे एक युग्म मानव-सन्तान उत्पन्नकर इस शापसे मुक्त हो जाओगी॥ ४३-४४॥
मत्क्रोधशापयोगेन मत्स्ययोनिं गता शुभे।<br>मानुषौ जनयित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि ॥ ४४
इत्युक्ता तेन सा प्राप मत्स्यदेहं नदीजले।<br>बालकौ जनयित्वा सा मृता मुक्ता च शापतः ॥ ४५उनके ऐसा कहनेपर वह यमुनाजलमें मछलीका शरीर पाकर तथा दो सन्तानोंको उत्पन्न करके मर गयी और शापसे मुक्त हो गयी॥ ४५॥
सन्त्यज्य रूपं मत्स्यस्य दिव्यरूपमवाप्य च।<br>जगामामरमार्गं च शापान्ते वरवर्णिनी ॥ ४६इस प्रकार शापोद्धार होनेपर वह सुन्दरी मछलीका शरीर त्यागकर दिव्य रूप धारण करके स्वर्गको चली गयी॥ ४६॥
अ० २ ]द्वितीय स्कन्ध१८१
एवं जाता वरा पुत्री मत्स्यगन्धा वरानना।<br>पुत्रीव पाल्यमाना सा दाशगेहे व्यवर्धत ॥ ४७इस प्रकार सुन्दर मुखवाली उस कन्या मत्स्य-गन्धाका जन्म हुआ। दाशके घरमें पुत्रीकी भाँति पालन-पोषणकी जाती हुई वह कन्या बढ़ने लगी ॥ ४७ ॥
मत्स्यगन्धा तदा जाता किशोरी चातिसुप्रभा।<br>तस्य कार्याणि कुर्वाणा वासवी चातिसुप्रभा ॥ ४८जब वह मत्स्यगन्धा किशोरावस्थाको प्राप्त हुई, तब उसका सौन्दर्य और भी बढ़ गया। वह परम सुन्दरी वसुकन्या निषादराजके कार्योंको करती हुई रहने लगी ॥ ४८ ॥
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इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे मत्स्यगन्धोत्पत्तिवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
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अथ द्वितीयोऽध्यायः

व्यासजीकी उत्पत्ति और उनका तपस्याके लिये जाना

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सूत उवाच
एकदा तीर्थयात्रायां व्रजन् पाराशरो मुनिः।<br>आजगाम महातेजाः कालिन्द्यास्तटमुत्तमम् ॥ १**सूतजी बोले—**एक बार तीर्थयात्रा करते हुए महान् तेजस्वी पराशरमुनि यमुनानदीके उत्तम तटपर आये और उन धर्मात्माने भोजन करते हुए निषादसे कहा—मुझको नावसे यमुनाके पार पहुँचा दो ॥ १-२ ॥
निषादमाह धर्मात्मा कुर्वन्तं भोजनं तदा।<br>प्रापयस्व परं पारं कालिन्द्या उडुपेन माम्॥ २
दाशः श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं कुर्वाणो भोजनं तटे।<br>उवाच तां सुतां बालां मत्स्यगन्धां मनोरमाम् ॥ ३मुनिका वचन सुनकर यमुनाके तटपर भोजन करते हुए उस निषादने अपनी सुन्दर युवा पुत्री मत्स्यगन्धासे कहा—‘हे सुन्दर मुसकानवाली पुत्रि! तुम इन मुनिको नावमें बैठाकर पार उतार दो; क्योंकि ये धर्मात्मा तपस्वी उस पार जानेके इच्छुक हैं’ ॥ ३-४ ॥
उडुपेन मुनिं बाले परं पारं नयस्व ह।<br>गन्तुकामोऽस्ति धर्मात्मा तापसोऽयं शुचिस्मिते ॥ ४
इत्युक्ता सा तदा पित्रा मत्स्यगन्धाथ वासवी।<br>उडुपे मुनिमासीनं संवाहयति भामिनी ॥ ५पिताके ऐसा कहनेपर वह सुन्दर वासवी मत्स्यगन्धा मुनिको नावमें बैठाकर खेने लगी। यमुनानदीके जलपर नावसे चलते समय दैवयोगसे प्रारब्धानुसार मुनि पराशर उस सुन्दर नेत्रोंवाली कन्याको देखकर आसक्त हो गये ॥ ५-६ ॥
व्रजन् सूर्यसुतातोये भावित्वाद्दैवयोगतः।<br>कामार्तस्तु मुनिर्जातो दृष्ट्वा तां चारुलोचनाम् ॥ ६
ग्रहीतुकामः स मुनिर्दृष्ट्वा व्यञ्जितयौवनाम्।<br>दक्षिणेन करेणैनामस्पृशद्दक्षिणे करे ॥ ७प्रस्फुटित यौवनवाली उस कन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छावाले मुनिराजने अपनी दाहिनी भुजासे उसकी दाहिनी भुजाका स्पर्श किया ॥ ७ ॥
तमुवाचासितापाङ्गी स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>कुलस्य सदृशं वः किं श्रुतस्य तपसश्च किम् ॥ ८इसपर उस असितापांगीने मुसकराकर कहा—क्या आपका यह कृत्य आपके कुल, तपस्या तथा वेदज्ञानके अनुरूप है ? हे धर्मज्ञ! आप वसिष्ठजीके वंशज हैं और कुल तथा शीलसे युक्त हैं फिर भी कामदेवसे पीड़ित होकर आप क्या करना चाहते हैं ? ॥ ८-९ ॥
त्वं वै वसिष्ठदायादः कुलशीलसमन्वितः।<br>किं चिकीर्षसि धर्मज्ञ मन्मथेन प्रपीडितः॥ ९

| १८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दुर्लभं मानुषं जन्म भुवि ब्राह्मणसत्तम।<br>तत्रापि दुर्लभं मन्ये ब्राह्मणत्वं विशेषतः॥ १०हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर मनुष्यजन्म दुर्लभ है। उसमें भी ब्राह्मणकुलमें जन्म लेना तो मैं विशेषरूपसे दुर्लभ मानती हूँ॥ १०॥
कुलेन शीलेन तथा श्रुतेन<br>द्विजोत्तमस्त्वं किल धर्मविच्च।<br>अनार्यभावं कथमागतोऽसि<br>विप्रेन्द्र मां वीक्ष्य च मीनगन्धाम्॥ ११<br>मदीये शरीरे द्विजामोघबुद्धे<br>शुभं किं समालोक्य पाणिं ग्रहीतुम्।<br>समीपं समायासि कामातुरस्त्वं<br>कथं नाभिजानासि धर्मं स्वकीयम्॥ १२हे विप्रेन्द्र! आप कुलसे, शीलसे तथा वेदाध्ययनसे एक धर्मपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं? मुझ मत्स्यगन्धाको देखकर आप अनाचारयुक्त विचारवाले कैसे हो गये? हे अमोघ बुद्धिवाले ब्राह्मण! मेरे शरीरमें स्थित किस विशेषताको देखकर आप मेरा हाथ पकड़नेके लिये कामासक्त होकर मेरी ओर चले आ रहे हैं? क्या आपको अपने धर्मका ज्ञान नहीं है?॥ ११-१२॥
अहो मन्दबुद्धिर्द्विजोऽयं ग्रहीष्य-<br>ञ्जले मग्न एवाद्य मां वै गृहीत्वा।<br>मनो व्याकुलं पञ्चबाणातिविद्धं<br>न कोऽपीह शक्तः प्रतीपं हि कर्तुम्॥ १३अहो, ये मन्दबुद्धि ब्राह्मण इस जलमें मुझे पकड़नेको आतुर हो रहे हैं। मेरा स्पर्श करके कामबाणसे आहत इनका मन व्याकुल हो उठा है। इस समय कोई भी इन्हें रोकनेमें समर्थ नहीं है॥ १३॥
इति सञ्चिन्त्य सा बाला तमुवाच महामुनिम्।<br>धैर्यं कुरु महाभाग परं पारं नयामि वै॥ १४ऐसा सोचकर उस निषादकन्याने महामुनि पराशरसे कहा—हे महाभाग! आप धैर्य धारण करें; मैं अभी आपको उस पार ले चलती हूँ॥ १४॥
सूत उवाच<br>पराशरस्तु तच्छ्रुत्वा वचनं हितपूर्वकम्।<br>करं त्यक्त्वा स्थितस्तत्र सिन्धोः पारं गतः पुनः॥ १५सूतजी बोले—मुनि पराशर उसका हितकारी वचन सुनकर उसका हाथ छोड़ करके वहीं स्थित हो गये और उस पार पहुँच गये॥ १५॥
मत्स्यगन्धां प्रजग्राह मुनिः कामातुरस्तदा।<br>वेपमाना तु सा कन्या तमुवाच पुरःस्थितम्॥ १६<br>दुर्गन्धांहं मुनिश्रेष्ठ कथं त्वं नोपशङ्कसे।<br>समानरूपयोः कामसंयोगस्तु सुखावहः॥ १७तदनन्तर पराशरमुनिने मत्स्यगन्धाको पकड़ लिया। तब भयसे काँपती हुई वह कन्या सम्मुखस्थित मुनिसे कहने लगी—हे मुनिवर! मैं दुर्गन्धवाली हूँ, मुझसे क्या आपको घृणा नहीं हो रही है? समान रूपवालोंके बीच ही परस्पर सम्बन्ध आनन्ददायक होता है॥ १६-१७॥
इत्युक्तेन तु सा कन्या क्षणमात्रेण भामिनी।<br>कृता योजनगन्धा तु सुरूपा च वरानना॥ १८मत्स्यगन्धाके ऐसा कहते ही पराशरमुनिने क्षण-मात्रमें अपने तपोबलसे उस भामिनी कन्याको सुमुखी, रूपवती तथा योजनगन्धा बना दिया॥ १८॥
मृगनाभिसुगन्धां तां कृत्वा कान्तां मनोहराम्।<br>जग्राह दक्षिणे पाणौ मुनिर्मन्मथपीडितः॥ १९<br>ग्रहीतुकामं तं प्राह नाम्ना सत्यवती शुभा।<br>मुने पश्यति लोकोऽयं पिता चैव तटस्थितः॥ २०उसे कस्तूरीकी सुगन्धिवाली मनोहर स्त्री बनाकर कामातुर मुनिराजने अपने दाहिने हाथसे उसे पकड़ लिया। तब सत्यवती नामवाली उस सुन्दरीने संयोगकी कामनावाले मुनिसे कहा—हे मुने! तटपर स्थित मेरे पिता तथा सभी लोग यहाँ हमें देख रहे हैं॥ १९-२०॥
पशुधर्मो न मे प्रीतिं जनयत्यतिदारुणः।<br>प्रतीक्षस्व मुनिश्रेष्ठ यावद्भवति यामिनी॥ २१हे मुनिश्रेष्ठ! यह भीषण पशुवत् व्यवहार मुझे अच्छा नहीं लगता। जबतक रात नहीं हो जाती, तबतक प्रतीक्षा कीजिये॥ २१॥
अ० २ ]द्वितीय स्कन्ध१८३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रात्रौ व्यवाय उद्दिष्टो दिवा न मनुजस्य हि।<br>दिवासङ्गे महान् दोषः पश्यन्ति किल मानवाः॥ २२<br><br>कामं यच्छ महाबुद्धे लोकनिन्दा दुरासदा।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या युक्तमुक्तमुदारधीः॥ २३<br><br>नीहारं कल्पयामास शीघ्रं पुण्यबलेन वै।<br>नीहारे च समुत्पन्ने ततेऽतितमसा युते॥ २४<br><br>कामिनीं तं मुनिं प्राह मृदुपूर्वमिदं वचः।<br>कन्याहं द्विजशार्दूल भुक्त्वा गन्तासि कामतः॥ २५<br><br>अमोघवीर्यस्त्वं ब्रह्मन् का गतिर्मे भवेदिति।<br>पितरं किं ब्रवीम्यद्य सगर्भा चेद्द्वाव्यहम्॥ २६<br><br>त्वं गमिष्यसि भुक्त्वा मां किं करोमि वदस्व तत्।मनुष्यके लिये कामसंसर्ग रातमें ही विहित है, दिनमें नहीं। दिनमें संसर्ग करनेसे महान् दोष होता है और बहुत-से लोग उसे देख भी लेते हैं॥ २२॥<br><br>हे महाबुद्धे! अब आपकी जैसी इच्छा हो वैसा करें, लोकनिन्दा अत्यन्त कष्टकर होती है। सत्यवतीका कहा गया युक्तिसंगत वचन सुनकर उदार बुद्धिवाले पराशरमुनिने अपने पुण्यबलसे तत्क्षण कुहरा उत्पन्न कर दिया। उस कुहरेके उत्पन्न हो जानेपर अत्यन्त अन्धकारमय नदीतटपर उस कामिनीने पराशरमुनिसे मधुर वाणीमें यह वचन कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! मैं अभी कन्या हूँ और आप मेरे साथ संसर्ग करके चले जायँगे। हे ब्रह्मन्! आप अमोघ वीर्यवाले हैं, ऐसी स्थितिमें मेरी क्या गति होगी? यदि मैं गर्भधारण कर लूँगी तो पिताको क्या उत्तर दूँगी? हे ब्रह्मन्! मेरे साथ संसर्ग करके आप चले जायँगे तब मैं क्या करूँगी, उसे बताइये?॥ २३—२६ १/२॥
पराशर उवाच<br>कान्तेऽद्य मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि॥ २७<br><br>वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि।पराशर बोले— हे प्रिये! आज मुझे प्रसन्न करके भी तुम कन्या ही बनी रहोगी। हे भामिनि! हे भीरु! तुम जो वर चाहती हो, उसे माँग लो॥ २७ १/२॥
सत्यवत्युवाच<br>यथा मे पितरौ लोके न जानीतो हि मानद॥ २८<br><br>कन्याव्रतं न मे हन्यात्तथा कुरु द्विजोत्तम।<br>पुत्रश्च त्वत्समः कामं भवेदद्भुतवीर्यवान्॥ २९<br><br>गन्धोऽयं सर्वदा मे स्याद्यौवनं च नवं नवम्।सत्यवती बोली— हे मानद! आप ऐसा वरदान दीजिये, जिससे मेरे माता-पिता लोकमें इसे न जान सकें। साथ ही हे विप्रवर! आप ऐसा करें, जिससे मेरा कन्याव्रत नष्ट न हो और जो पुत्र उत्पन्न हो, वह आपहीके समान अपूर्व ओजस्वी हो, मेरी यह सुगन्ध सदा बनी रहे और मेरा यौवन नित नूतन बना रहे॥ २८–२९ १/२॥
पराशर उवाच<br>शृणु सुन्दरि पुत्रस्ते विष्णवंशसम्भवः शुचिः॥ ३०<br><br>भविष्यति च विख्यातस्त्रैलोक्ये वरवर्णिनि।<br>केनचित्कारणेनाहं जातः कामातुरस्त्वयि॥ ३१<br><br>कदापि च न सम्मोहो भूतपूर्वो वरानने।<br>दृष्ट्वा चाप्सरसां रूपं सदाहं धैर्यमावहम्॥ ३२<br><br>दैवयोगेन वीक्ष्य त्वां कामस्य वशगोऽभवम्।<br>तत्किञ्चित्कारणं विद्धि दैवं हि दुरतिक्रमम्॥ ३३<br><br>दृष्ट्वाहं चातिदुर्गन्धां त्वां कथं मोहमाप्नुयाम्।<br>पुराणकर्ता पुत्रस्ते भविष्यति वरानने॥ ३४<br><br>वेदविद्भागकर्ता च ख्यातश्च भुवनत्रये।पराशर बोले— हे सुन्दरि! सुनो, तुम्हारा पुत्र पवित्र तथा भगवान् विष्णुके अंशसे अवतीर्ण होगा। हे सुन्दरि! वह तीनों लोकोंमें विख्यात होगा। मैं तुम्हारे ऊपर किसी कारणविशेषसे ही कामासक्त हुआ हूँ। हे सुमुखि! मुझे ऐसा मोह पूर्वमें कभी नहीं हुआ। अप्सराओंके रूपको देखकर भी मैं सदा धैर्य धारण किये रहा। दैवयोगसे ही तुम्हें देखकर मैं इस प्रकार कामके वशीभूत हुआ हूँ। इस विषयमें तुम कोई विशेष कारण ही समझो, दैवका अतिक्रमण अत्यन्त कठिन है, अन्यथा अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त तुम्हें देखकर मैं इस प्रकार क्यों मोहित होता! हे वरानने! तुम्हारा पुत्र पुराणोंका रचयिता, वेदोंका विभाग करनेवाला तथा तीनों लोकोंमें विख्यात होगा॥ ३०—३४ १/२॥

| १८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |

| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा तां वशं यातां भुक्त्वा स मुनिसत्तमः ॥ ३५<br>जगाम तरसा स्नात्वा कालिन्दीसलिले मुनिः।<br>सापि सत्यवती जाता सद्यो गर्भवती सती ॥ ३६ | सूतजी बोले—ऐसा कहकर अपने वशमें आयी हुई उस कन्याके साथ संसर्ग करके मुनिश्रेष्ठ पराशर तत्काल यमुनानदीमें स्नानकर वहाँसे शीघ्र चले गये। वह साध्वी सत्यवती भी तत्काल गर्भवती हो गयी॥ ३५-३६॥ | | सुषुवे यमुनाद्वीपे पुत्रं काममिवापरम्।<br>जातमात्रस्तु तेजस्वी तामुवाच स्वमातरम् ॥ ३७<br><br>तपस्येव मनः कृत्वा विविशे चातिवीर्यवान्।<br>गच्छ मातर्यथाकामं गच्छाम्यहमतः परम् ॥ ३८<br><br>तपः कर्तुं महाभागे दर्शयिष्यामि वै स्मृतः।<br>मातर्यदा भवेत्कार्यं तव किञ्चिदनुत्तमम् ॥ ३९<br><br>स्मर्त्तव्योऽहं तदा शीघ्रमागमिष्यामि भामिनि।<br>स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि त्यक्त्वा चिन्तां सुखं वस ॥ ४० | [यथासमय] सत्यवतीने यमुनाजीके द्वीपमें दूसरे कामदेवके तुल्य एक सुन्दर पुत्रको जन्म दिया। उत्पन्न होते ही उस तेजवान् पुत्रने अपनी मातासे कहा—हे माता! मनमें तपस्याका निश्चय करके ही अत्यन्त तेजस्वी मैं गर्भमें प्रविष्ट हुआ था। हे महाभागे! अब आप अपनी इच्छानुसार कहीं भी चली जायँ और मैं भी यहाँसे तप करनेके लिये जा रहा हूँ। हे माता! आपके स्मरण करनेपर मैं अवश्य ही दर्शन दूँगा। हे माता! जब कोई उत्तम कार्य आ पड़े तब आप मेरा स्मरण कीजियेगा, मैं शीघ्र ही उपस्थित हो जाऊँगा। हे भामिनि! आपका कल्याण हो, अब मैं चलूँगा। आप चिन्ता छोड़कर सुखपूर्वक रहिये॥ ३७—४०॥ | | इत्युक्त्वा निर्ययौ व्यासः सापि पित्रन्तिकं गता।<br>द्वीपे न्यस्तस्तया बालस्तस्माद् द्वैपायनोऽभवत् ॥ ४१ | ऐसा कहकर व्यासजी चले गये और वह सत्यवती भी अपने पिताके पास चली गयी। सत्यवतीने बालकको यमुनाद्वीपमें जन्म दिया था। अतः वह बालक 'द्वैपायन' नामसे विख्यात हुआ॥ ४१॥ | | जातमात्रो जगामाशु वृद्धिं विष्ण्वंशयोगतः।<br>तीर्थे तीर्थे कृतस्नानश्चचार तप उत्तमम् ॥ ४२ | विष्णुभगवान्‌के अंशावतार होनेके कारण वह बालक उत्पन्न होते ही शीघ्र बड़ा हो गया तथा अनेक तीर्थोंमें स्नान करता हुआ उत्तम तप करने लगा॥ ४२॥ | | एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात्।<br>चकार वेदशाखाश्च प्राप्तं ज्ञात्वा कलेर्युगम् ॥ ४३<br><br>वेदविस्तारकरणाद्व्यासनामाभवन्मुनिः।<br>पुराणसंहिताश्चक्रे महाभारतमृत्तमम् ॥ ४४<br><br>शिष्यानध्यापयामास वेदान्कृत्वा विभागशः।<br>सुमन्तुं जैमिनिं पैलं वैशम्पायनमेव च ॥ ४५<br><br>असितं देवलं चैव शुकं चैव स्वमात्मजम्। | इस प्रकार पराशरमुनिके द्वारा सत्यवतीके गर्भसे द्वैपायन उत्पन्न हुए और उन्होंने ही कलि-युगको आया जानकर वेदोंको अनेक शाखाओंमें विभक्त किया, वेदोंका विस्तार करनेके कारण ही उन मुनिका नाम 'व्यास' पड़ गया। उन्होंने ही विभिन्न पुराणसंहिताओं तथा श्रेष्ठ महाभारतकी रचना की। उन्होंने ही वेदोंके अनेक विभाग करके उसे अपने शिष्यों—सुमन्तु, जैमिनि, पैल, वैशम्पायन, असित, देवल और अपने पुत्र शुकदेवजीको पढ़ाया॥ ४३—४५ १/२॥ |

अ० ३ ] द्वितीय स्कन्ध १८५

अ० ३ ] द्वितीय स्कन्ध १८५

सूत उवाचसूतजी बोले—
एतच्च कथितं सर्वं कारणं मुनिसत्तमाः ॥ ४६<br><br>सत्यवत्याः सुतस्यापि समुत्पत्तिस्तथा शुभा।<br>संशयोऽत्र न कर्तव्यः सम्भवे मुनिसत्तमाः ॥ ४७<br><br>महतां चरिते चैव गुणा ग्राह्या मुनेरिति।<br>कारणाच्च समुत्पत्तिः सत्यवत्या झषोदरे ॥ ४८<br><br>पराशरेण संयोगः पुनः शन्तनुना तथा।<br>अन्यथा तु मुनेश्चित्तं कथं कामाकुलं भवेत् ॥ ४९<br><br>अनार्यजुष्टं धर्मज्ञः कृतवान्स कथं मुनिः।<br>सकारणेयमुत्पत्तिः कथिताश्चर्यकारिणी ॥ ५०<br><br>श्रुत्वा पापाच्च निर्मुक्तो नरो भवति सर्वथा।<br>य एतच्छुभमाख्यानं शृणोति श्रुतिमान्नरः ॥ ५१<br>न दुर्गतिमवाप्नोति सुखी भवति सर्वदा ॥ ५२हे श्रेष्ठ मुनियो! मैंने यह सब उत्पत्तिका कारण आपलोगोंसे बता दिया, साथ ही सत्यवतीके पुत्र व्यासजीकी पवित्र उत्पत्तिका वर्णन कर दिया है। हे श्रेष्ठ मुनिगण! व्यासजीकी इस उत्पत्तिके विषयमें आपलोगोंको सन्देह नहीं करना चाहिये। महापुरुषोंके चरितसे केवल गुण ही ग्रहण करना चाहिये। किसी विशेष कारणसे ही मुनि व्यासका तथा मछलीके उदरसे सत्यवतीका जन्म, पराशरमुनिके साथ उनका संयोग और फिर राजा शन्तनुके साथ उनका विवाह हुआ। अन्यथा मुनि पराशरका चित्त कामासक्त ही क्यों होता ? और धर्मके ज्ञाता वे महामुनि पराशर अनार्य लोगोंद्वारा आचरित किया जानेवाला ऐसा कृत्य क्यों करते ! किसी विशेष कारणसे युक्त तथा आश्चर्यकारिणी यह उत्पत्ति मैंने बता दी, जिसे सुनकर मनुष्य निश्चितरूपसे पापसे मुक्त हो जाता है। जो श्रुतिपरायण मनुष्य इस शुभ आख्यानको सुनता है; वह दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है तथा सर्वदा सुखी रहता है॥ ४६—५२॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे
व्यासजन्मवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


अथ तृतीयोऽध्यायः

राजा शन्तनु, गंगा और भीष्मके पूर्वजन्मकी कथा

ऋषय ऊचुःऋषिगण बोले—
उत्पत्तिस्तु त्वया प्रोक्ता व्यासस्यामिततेजसः।<br>सत्यवत्यास्तथा सूत विस्तरेण त्वयानघ ॥ १<br><br>तथाप्येकस्तु सन्देहश्चित्तेऽस्माकं तु संस्थितः।<br>न निवर्तति धर्मज्ञ कथितेन त्वयानघ ॥ २हे सूतजी! हे अनघ! यद्यपि आपने परम तेजस्वी व्यास तथा सत्यवतीके जन्मकी कथा विस्तारपूर्वक कही तथापि हमलोगोंके चित्तमें एक बड़ी भारी शंका बनी हुई है। हे धर्मज्ञ! हे अनघ! वह शंका आपके कहनेपर भी दूर नहीं हो रही है ॥ १-२॥
माता व्यासस्य या प्रोक्ता नाम्ना सत्यवती शुभा।<br>सा कथं नृपतिं प्राप्ता शन्तनुं धर्मवित्तमम् ॥ ३<br><br>निषादपुत्रीं स कथं वृतवान्नृपतिः स्वयम्।<br>धर्मिष्ठः पौरवो राजा कुलहीनामसंवृताम् ॥ ४व्यासजीकी कल्याणमयी माता जो सत्यवती नामसे जानी जाती थीं, वे धर्मात्मा राजा शन्तनुको कैसे प्राप्त हुईं? कुल तथा आचरणसे हीन उस निषादकन्याका पुरुकुलमें उत्पन्न उन धर्मात्मा राजाने स्वयं कैसे वरण कर लिया? ॥ ३-४॥
शन्तनोः प्रथमा पत्नी का ह्यभूत्कथयाधुना।<br>भीष्मः पुत्रोऽथ मेधावी वसोरांशः कथं पुनः ॥ ५आप कृपा करके हमलोगोंको यह भी बतलाइये कि राजा शन्तनुकी पहली पत्नी कौन थी? वसुके अंशसे उत्पन्न मेधावी भीष्म उनके पुत्र कैसे हुए? ॥ ५॥
१८६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वया प्रोक्तं पुरा सूत राजा चित्राङ्गदः कृतः।<br>सत्यवत्याः सुतो वीरो भीष्मेणामिततेजसा॥ ६<br>चित्राङ्गदे हते वीरे कृतस्तदनुजस्तथा।<br>विचित्रवीर्यनामासौ सत्यवत्याः सुतो नृपः॥ ७हे सूतजी! आप यह पहले ही कह चुके हैं कि सत्यवतीके वीर पुत्र चित्रांगदको अमित तेजवाले भीष्मने राजा बनाया था और वीर चित्रांगदके मारे जानेपर उसके अनुज तथा सत्यवतीके पुत्र विचित्रवीर्यको उन्होंने राजा बनाया॥ ६-७॥
ज्येष्ठे भीष्मे स्थिते पूर्वं धर्मिष्ठे रूपवत्यपि।<br>कृतवान्स कथं राज्यं स्थापितस्तेन जानता॥ ८रूपसम्पन्न तथा ज्येष्ठ पुत्र धर्मात्मा भीष्मके रहते हुए विचित्रवीर्यने राज्य कैसे किया और सब कुछ जानते हुए भी भीष्मने उन्हें राज्यपर कैसे स्थापित किया ?॥ ८॥
मृते विचित्रवीर्ये तु सत्यवत्यतिदुःखिता।<br>वध्वभ्यां गोलकौ पुत्रौ जनयामास सा कथम्॥ ९विचित्रवीर्यके मरनेपर अत्यन्त दुःखित माता सत्यवतीने अपनी दोनों पुत्रवधुओंसे दो गोलक पुत्र कैसे उत्पन्न कराये ?॥ ९॥
कथं राज्यं न भीष्माय ददौ सा वरवर्णिनी।<br>न कृतस्तु कथं तेन वीरेण दारसंग्रहः॥ १०उन सुन्दरी सत्यवतीने उस समय ज्येष्ठ पुत्र भीष्मको राजा क्यों नहीं बनाया और उन पराक्रमी भीष्मने अपना विवाह क्यों नहीं किया ?॥ १०॥
अधर्मस्तु कृतः कस्माद्व्यासेनामिततेजसा।<br>ज्येष्ठेन भ्रातृभार्यायां पुत्रावुत्पादिताविति॥ ११अमित तेजस्वी बड़े भाई व्यासजीने ऐसा अधर्म क्यों किया जो कि उन्होंने नियोगद्वारा दो पुत्र उत्पन्न किये ?॥ ११॥
पुराणकर्ता धर्मात्मा स कथं कृतवान्मुनिः।<br>सेवनं परदाराणां भ्रातुश्चैव विशेषतः॥ १२<br>जुगुप्सितमिदं कर्म स कथं कृतवान्मुनिः।<br>शिष्टाचारः कथं सूत वेदानुमितिकारकः॥ १३पुराणोंके रचयिता व्यासमुनिने धर्मज्ञ होते हुए भी ऐसा कार्य क्यों किया; हे सूतजी! क्या यही वेदोंसे अनुमोदित शिष्टाचार है ?॥ १२-१३॥
व्यासशिष्योऽसि मेधाविन् सन्देहं छेत्तुमर्हसि।<br>श्रोतुकामा वयं सर्वे धर्मक्षेत्रे कृतक्षणाः॥ १४हे मेधाविन्! आप व्यासजीके शिष्य हैं, इसलिये आप हमारी इन सभी शंकाओंका समाधान करनेमें समर्थ हैं। हम सभी इस धर्मक्षेत्रमें इन प्रश्नोंके उत्तर सुननेको उत्सुक हो रहे हैं॥ १४॥
सूत उवाच<br>इक्ष्वाकुवंशप्रभवो महाभिष इति स्मृतः।<br>सत्यवाग्धर्मशीलश्च चक्रवर्ती नृपोत्तमः॥ १५सूतजी बोले— [हे मुनियो!] इक्ष्वाकुकुलमें महाभिष नामके एक सत्यवादी, धर्मात्मा और चक्रवर्ती राजा उत्पन्न हुए—ऐसा कहा जाता है॥ १५॥
अश्वमेधसहस्रेण वाजपेयशतेन च।<br>तोषयामास देवेन्द्रं स्वर्गं प्राप महामतिः॥ १६उन बुद्धिमान् राजाने हजारों अश्वमेध तथा सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करके इन्द्रको सन्तुष्ट किया और स्वर्ग प्राप्त किया था॥ १६॥
एकदा ब्रह्मसदनं गतो राजा महाभिषः।<br>सुराः सर्वे समाजग्मुः सेवनार्थं प्रजापतिम्॥ १७<br>गङ्गा महानदी तत्र संस्थिता सेवितुं विभुम्।<br>तस्या वासः समुद्भूतं मारुतेन तरस्विना॥ १८<br>अधोमुखाः सुराः सर्वे न विलोक्यैव तां स्थिताः।<br>राजा महाभिषस्तां तु निःशङ्कः समपश्यत॥ १९एक बार राजा महाभिष ब्रह्मलोक गये। वहाँ प्रजापतिकी सेवाके लिये सभी देवता आये हुए थे। उस समय देवनदी गंगाजी भी ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थीं। उस समय तीव्रगामी पवनने उनका वस्त्र उड़ा दिया। सभी देवता अपना सिर नीचा किये उन्हें बिना देखे खड़े रहे, किंतु राजा महाभिष निःशंक भावसे उनकी ओर देखते रह गये॥ १७-१९॥

अ० ३ ] द्वितीय स्कन्ध १८७

अ० ३ ] द्वितीय स्कन्ध १८७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सापि तं प्रेमसंयुक्तं नृपं ज्ञातवती नदी।<br>दृष्ट्वा तौ प्रेमसंयुक्तौ निर्लज्जौ काममोहितौ ॥ २०<br>ब्रह्मा चुकोप तौ तूर्णं शशाप च रुषान्वितः।<br>मर्त्यलोकेषु भूपाल जन्म प्राप्य पुनर्दिवम् ॥ २१<br>पुण्येन महताविष्टस्त्वमवाप्स्यसि सर्वथा।<br>गङ्गां तथोक्तवान्ब्रह्मा वीक्ष्य प्रेमवतीं नृपे ॥ २२उन गंगानदीने भी राजाको अपनेपर प्रेमासक्त जाना। उन दोनोंको इस प्रकार मुग्ध देखकर ब्रह्माजी क्रोधित हो गये और कोपाविष्ट होकर शीघ्र ही उन दोनोंको शाप दे दिया—हे राजन्! मनुष्यलोकमें तुम्हारा जन्म होगा। वहाँ जब तुम अधिक पुण्य एकत्र कर लोगे, तब पुनः स्वर्गलोकमें आओगे। गंगाको महाभिष-राजापर प्रेमासक्त जानकर ब्रह्माजीने उन्हें [गंगाको] भी उसी प्रकार शाप दे दिया॥ २०—२२॥
विमनस्कौ तु तौ तूर्णं निःसृतौ ब्रह्मणोऽन्तिकात्।<br>स नृपांश्चिन्तयित्वाथ भूलोके धर्मतत्परान् ॥ २३<br>प्रतीपं चिन्तयामास पितरं पुरुवंशजम्।<br>एतस्मिन्समये चाष्टौ वसवः स्त्रीसमन्विताः ॥ २४<br>वसिष्ठस्याश्रमं प्राप्ता रममाणा यदृच्छया।<br>पृथ्वादीनां वसूनां च मध्ये कोऽपि वसूत्तमः ॥ २५<br>द्यौर्नामा तस्य भार्याथ नन्दिनीं गां ददर्श ह।<br>दृष्ट्वा पतिं सा पप्रच्छ कस्येयं धेनुरुत्तमा ॥ २६इस प्रकार वे दोनों दुःखी मनसे ब्रह्माजीके पाससे शीघ्र ही चले गये। राजा अपने मनमें सोचने लगे कि इस मृत्युलोकमें कौन ऐसे राजा हैं, जो धर्मपरायण हैं। ऐसा विचारकर उन्होंने पुरुवंशीय महाराज 'प्रतीप' को ही पिता बनानेका निश्चय कर लिया। इसी बीच आठों वसु अपनी-अपनी स्त्रीके साथ विहार करते हुए स्वेच्छाया महर्षि वसिष्ठके आश्रमपर आ पहुँचे। उन पृथु आदि वसुओंमें 'द्यौ' नामक एक श्रेष्ठ वसु थे। उनकी पत्नीने 'नन्दिनी' गौको देखकर अपने पतिसे पूछा कि यह सुन्दर गाय किसकी है?॥ २३—२६॥
द्यौस्तामाह वसिष्ठस्य गौरियं शृणु सुन्दरि।<br>दुग्धमस्याः पिबेद्यस्तु नारी वा पुरुषोऽथ वा ॥ २७<br>अयुतायुर्भवेन्नूनं सदैवागतयौवनः।<br>तच्छ्रुत्वा सुन्दरी प्राह मृत्युलोकेऽस्ति मे सखी ॥ २८<br>उशीनरस्य राजर्षेः पुत्री परमशोभना।<br>तस्या हेतोर्महाभाग सवत्सां गां पयस्विनीम् ॥ २९<br>आनयस्वाश्रमं श्रेष्ठं नन्दिनीं कामदां शुभाम्।<br>यावदस्याः पयः पीत्वा सखी मम सदैव हि ॥ ३०<br>मानुषेषु भवेदेका जरारोगविवर्जिता।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या द्यौर्जहार च नन्दिनीम् ॥ ३१<br>अवमन्य मुनिं दान्तं पृथ्वाद्यैः सहितोऽनघः।द्यौने उससे कहा—हे सुन्दरि! सुनो, यह महर्षि वसिष्ठजीकी गाय है। इस गायका दूध स्त्री या पुरुष जो कोई भी पीता है, उसकी आयु दस हजार वर्षकी हो जाती है और उसका यौवन सर्वदा बना रहता है। यह सुनकर उस सुन्दरी स्त्रीने कहा—मृत्युलोकमें मेरी एक सखी है। मेरी वह सखी राजर्षि उशीनरकी परम सुन्दरी कन्या है। हे महाभाग! उसके लिये अत्यन्त सुन्दर तथा सब प्रकारकी कामनाओंको देनेवाली इस गायको बछड़े-सहित अपने आश्रममें ले चलिये। जब मेरी सखी इसका दूध पीयेगी तब वह निर्जरा एवं रोगरहित होकर मनुष्योंमें एकमात्र अद्वितीय बन जायगी। उसका वचन सुनकर द्यौ नामके वसुने 'पृथु' आदि अष्टवसुओंके साथ जितेन्द्रिय मुनिका अपमान करके नन्दिनीका अपहरण कर लिया॥ २७—३१ १/२॥
हृतायामथ नन्दिन्यां वसिष्ठस्तु महातपाः ॥ ३२<br>आजगामाश्रमपदं फलान्यादाय सत्वरः।<br>नापश्यत यदा धेनुं सवत्सां स्वाश्रमे मुनिः ॥ ३३नन्दिनीका हरण हो जानेपर महातपस्वी वसिष्ठ फल लेकर शीघ्र ही अपने आश्रम आ गये। जब मुनिने अपने आश्रममें बछड़ेसहित नन्दिनीगायको नहीं देखा तब वे तेजस्वी वनों एवं गुफाओंमें उसे ढूँढ़ने

| १८८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ | | :--- | :--- |

| मृगयामास तेजस्वी गहरेषु वनेष्वपि।<br>नासादिता यदा धेनुश्चुकोपातिशयं मुनिः॥ ३४<br><br>वारुणिश्चापि विज्ञाय ध्यानेन वसुभिर्हृताम्।<br>वसुभिर्मे हृता धेनुर्यस्मान्मामवमन्य वै॥ ३५<br><br>तस्मात्सर्वे जनिष्यन्ति मानुषेषु न संशयः।<br>एवं शशाप धर्मात्मा वसूंस्तान्वारुणिः स्वयम्॥ ३६<br><br>श्रुत्वा विमनसः सर्वे प्रययुर्दुःखिताश्च ते।<br>शप्ताः स्म इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमुः॥ ३७<br><br>प्रसादयन्तस्तमृषिं वसवः शरणं गताः।<br>मुनिस्तानाह धर्मात्मा वसून्दीनान्पुरःस्थितान्॥ ३८<br><br>अनुसंवत्सरं सर्वे शापमोक्षमवाप्स्यथ।<br>येनेयं विहृता धेनुर्नन्दिनी मम वत्सला॥ ३९<br><br>तस्माद् द्यौर्मानुषे देहे दीर्घकालं वसिष्यति।<br>ते शप्ताः पथि गच्छन्तीं गङ्गां दृष्ट्वा सरिद्वराम्॥ ४०<br><br>ऊचुस्तां प्रणताः सर्वे शप्तां चिन्तातुरां नदीम्।<br>भविष्यामो वयं देवि कथं देवाः सुधाशनाः॥ ४१<br><br>मानुषाणां च जठरे चिन्तेयं महती हि नः।<br>तस्मात्त्वं मानुषी भूत्वा जनयास्मान्सरिद्वरे॥ ४२<br><br>शन्तनुर्नाम राजर्षिस्तस्य भार्या भवानघे।<br>जाताञ्जाताञ्जले चास्मान्निःक्षिपस्व सुरापगे॥ ४३<br><br>एवं शापविनिर्मोक्षो भविता नात्र संशयः।<br>तथेत्युक्ताश्च ते सर्वे जग्मुर्लोकं स्वकं पुनः॥ ४४<br><br>गङ्गापि निर्गता देवी चिन्त्यमाना पुनः पुनः।<br>महाभिषो नृपो जातः प्रतीपस्य सुतस्तदा॥ ४५<br><br>शन्तनुर्नाम राजर्षिर्धर्मात्मा सत्यसङ्गरः।<br>प्रतीपस्तु स्तुतिं चक्रे सूर्यस्यामिततेजसः॥ ४६<br><br>तदा च सलिलात्तस्मान्निःसृता वरवर्णिनी।<br>दक्षिणं शालसंकाशमूरूं भेजे शुभानना॥ ४७ | लगे, जब वह गाय नहीं मिली तब वरुणपुत्र मुनि वसिष्ठजी ध्यानयोगसे उसे वसुओंके द्वारा हरी गयी जानकर अत्यन्त कुपित हुए। वसुओंने मेरी अवमानना करके मेरी गौ चुरा ली है। वे सभी मानवयोनिमें जन्म ग्रहण करेंगे, इसमें सन्देह नहीं है। इस प्रकार धर्मात्मा वसिष्ठजीने उन वसुओंको शाप दिया॥ ३२—३६॥<br><br>यह सुनकर वे सभी वसु खिन्नमनस्क और दुःखित हो गये और वहाँसे चल दिये। हमें शाप दे दिया गया है—यह जानकर वे ऋषि वसिष्ठके पास पहुँचे और उन्हें प्रसन्न करते हुए वे सभी वसु उनके शरणागत हो गये। तब धर्मात्मा मुनि वसिष्ठजीने उन सामने खड़े वसुओंको देखकर कहा—तुमलोगोंमेंसे [सात वसु] एक-एक वर्षके अन्तरालसे ही शापसे मुक्त हो जायँगे; परंतु जिसने मेरी प्रिय वत्सला नन्दिनीका अपहरण किया है, वह 'द्यौ' नामक वसु मनुष्य-शरीरमें ही बहुत दिनोंतक रहेगा॥ ३७—३९ ½॥<br><br>उन अभिशप्त वसुओंने मार्गमें जाती हुई नदियोंमें उत्तम गङ्गाजीको देखकर उन अभिशस्त तथा चिन्तातुर गङ्गाजीसे प्रणामपूर्वक कहा—हे देवि! अमृत पीनेवाले हम देवता मानवकुक्षिसे कैसे उत्पन्न होंगे, यह हमें महान् चिन्ता है, अतः हे नदियोंमें श्रेष्ठ! आप ही मानुषी बनकर हमलोगोंको जन्म दें। पृथ्वीपर शन्तनु नामक एक राजर्षि हैं, हे अनघे! आप उन्हींकी भार्या बन जायँ और हे सुरापगे! हमें क्रमशः जन्म लेनेपर आप जलमें छोड़ती जायँ। आपके ऐसा करनेसे हमलोग भी शापसे मुक्त हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं है। गङ्गाजीने जब उनसे 'तथास्तु' कह दिया तब वे सब वसु अपने-अपने लोकको चले गये और गङ्गाजी भी बार-बार विचार करती हुई वहाँसे चली गयीं॥ ४०—४४ ½॥<br><br>उस समय राजा महाभिषने राजा प्रतीपके पुत्रके रूपमें जन्म लिया। उन्हींका नाम शन्तनु पड़ा, जो सत्यप्रतिज्ञ एवं धर्मात्मा राजर्षि हुए। महाराज प्रतीपने परम तेजस्वी भगवान् सूर्यकी आराधना की। उस समय जलमेंसे एक परम सुन्दर स्त्री निकल पड़ी और वह सुमुखी आकर तुरंत ही महाराजके शाल वृक्षके समान विशाल दाहिने जंघेपर विराजमान हो गयी। |

अ० ३ ]द्वितीय स्कन्ध१८९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अङ्के स्थितां स्त्रियं चाह मा पृष्ट्वा किं वरानने।<br>ममोरावास्थितासि त्वं किमर्थं दक्षिणे शुभे॥ ४८अंकमें बैठी हुई उस स्त्रीसे राजाने पूछा—'हे वरानने ! तुम मुझसे बिना पूछे ही मेरे शुभ दाहिने जंघेपर क्यों बैठ गयी?'॥ ४७-४८॥
सा तमाह वरारोहा यदर्थं राजसत्तम।<br>स्थितास्म्यङ्के कुरुश्रेष्ठ कामयानां भजस्व माम्॥ ४९उस सुन्दरीने उनसे कहा—'हे नृपश्रेष्ठ ! हे कुरुश्रेष्ठ ! मैं जिस कामनासे आपके अंकमें बैठी हूँ, उस कामनावाली मुझे आप स्वीकार करें'॥ ४९॥
तामवोचत्तथो राजा रूपयौवनशालिनीम्।<br>नाहं परस्त्रियं कामाद् गच्छेयं वरवर्णिनीम्॥ ५०उस रूपयौवनसम्पन्ना सुन्दरीसे राजाने कहा—'मैं किसी सुन्दरी परस्त्रीको कामकी इच्छासे नहीं स्वीकार करता'॥ ५०॥
स्थिता दक्षिणमूरुं मे त्वमाश्लिष्य च भामिनि।<br>अपत्यानां स्नुषाणां च स्थानं विद्धि शुचिस्मिते॥ ५१<br><br>स्नुषा मे भव कल्याणि जाते पुत्रेऽतिवाञ्छिते।<br>भविष्यति च मे पुत्रस्तव पुण्यान्न संशयः॥ ५२हे भामिनि ! हे शुचिस्मिते ! तुम मेरे दाहिने जंघेपर प्रेमपूर्वक आकर बैठ गयी हो, उसे तुम पुत्रों तथा पुत्रवधुओंका स्थान समझो। अतः हे कल्याणि ! मेरे मनोवांछित पुत्रके उत्पन्न होनेपर तुम मेरी पुत्रवधू हो जाओ। तुम्हारे पुण्यसे मुझे पुत्र हो जायगा, इसमें संशय नहीं है॥ ५१-५२॥
तथेत्युक्त्वा गता सा वै कामिनी दिव्यदर्शना।<br>राजा चापि गृहं प्राप्तश्चिन्तयंस्तां स्त्रियं पुनः॥ ५३वह दिव्य दर्शनवाली कामिनी 'तथास्तु' कहकर चली गयी और उस स्त्रीके विषयमें सोचते हुए राजा प्रतीप भी अपने घर चले गये॥ ५३॥
ततः कालेन कियता जाते पुत्रे वयस्विनि।<br>वनं जिगमिषू राजा पुत्रं वृत्तान्तमूचिवान्॥ ५४समय बीतनेपर पुत्रके युवा होनेपर वन जानेकी इच्छावाले राजाने अपने पुत्रको वह समस्त पूर्व वृत्तान्त कह सुनाया॥ ५४॥
वृत्तान्तं कथयित्वा तु पुनरूचे निजं सुतम्।<br>यदि प्रयाति सा बाला त्वां वने चारुहासिनी॥ ५५<br><br>कामयाना वरारोहा तां भजेथा मनोरमाम्।<br>न प्रष्टव्या त्वया कासि मन्नियोगान्नराधिप॥ ५६<br><br>धर्मपत्नीं च तां कृत्वा भविता त्वं सुखी किल।सारी बात बताकर राजाने अपने पुत्रसे कहा—'यदि वह सुन्दरी बाला तुम्हें कभी वनमें मिले और अपनी अभिलाषा प्रकट करे तो उस मनोरमाको स्वीकार कर लेना तथा उससे मत पूछना कि तुम कौन हो? यह मेरी आज्ञा है, उसे अपनी धर्मपत्नी बनाकर तुम सुखी रहोगे'॥ ५५-५६ १/२॥
सूत उवाच<br>एवं सन्दिश्य तं पुत्रं भूपतिः प्रीतमानसः॥ ५७<br><br>दत्त्वा राज्यश्रियं सर्वां वनं राजा विवेश ह।<br>तत्रापि च तपस्तप्त्वा समाराध्य पराम्बिकाम्॥ ५८<br><br>जगाम स्वर्गं राजासौ देहं त्यक्त्वा स्वतेजसा।<br>राज्यं प्राप महातेजाः शान्तनुः सार्वभौमिकम्॥ ५९<br><br>प्रजां वै पालयामास धर्मदण्डो महीपतिः॥ ६०सूतजी बोले—इस प्रकार अपने पुत्रको आदेश देकर महाराज प्रतीप प्रसन्नताके साथ उन्हें सारा राज्य-वैभव सौंपकर वनको चले गये। वहाँ जाकर वे तप करके तथा आदिशक्ति भगवती जगदम्बिकाकी आराधना करके अपने तेजसे शरीर छोड़कर स्वर्ग चले गये। महातेजस्वी राजा शान्तनुने सार्वभौम राज्य प्राप्त किया और वे धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करने लगे॥ ५७-६०॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे
प्रतीपसकाशाच्छन्तनुजन्मवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
***

अथ चतुर्थोऽध्यायः

१९०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४

अथ चतुर्थोऽध्यायः

गंगाजीद्वारा राजा शन्तनुका पतिरूपमें वरण, सात पुत्रोंका जन्म तथा गंगाका उन्हें अपने जलमें प्रवाहित करना, आठवें पुत्रके रूपमें भीष्मका जन्म तथा उनकी शिक्षा-दीक्षा

संस्कृतहिन्दी
सूत उवाच<br>प्रतीपेऽथ दिवं याते शन्तनुः सत्यविक्रमः।<br>बभूव मृगयाशीलो निघ्नन्व्याघ्रान्मृगान्नृपः॥ १सूतजी बोले—प्रतीपके स्वर्ग चले जानेपर सत्यपराक्रमी राजा शन्तनु व्याघ्र तथा मृगोंको मारते हुए मृगयामें तत्पर हो गये॥ १॥
स कदाचिद्वने घोरे गङ्गातीरे चरन्नृपः।<br>ददर्श मृगशावाक्षीं सुन्दरीं चारुभूषणाम्॥ २किसी समय गंगाके किनारे घने वनमें विचरण करते हुए राजाने मृगके बच्चे-जैसी आँखोंवाली तथा सुन्दर आभूषणोंसे युक्त एक सुन्दर स्त्रीको देखा॥ २॥
दृष्ट्वा तां नृपतिर्मग्नः पित्रोक्तेयं वरानना।<br>रूपयौवनसम्पन्ना साक्षाल्लक्ष्मीरिवापरा॥ ३उसे देखकर राजा शन्तनु हर्षित हो गये और सोचने लगे कि साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान रूप-यौवनसे सम्पन्न यह स्त्री वही है, जिसके विषयमें पिताजीने मुझे बताया था॥ ३॥
पिबन्मुखाम्बुजं तस्या न तृप्तिमगमन्नृपः।<br>हृष्टरोमाभवत्तत्र व्याप्तचित्त इवानघः॥ ४उसके मुखकमलका पान करते हुए राजा तृप्त नहीं हुए। हर्षातिरेकसे उन निष्पाप राजाको रोमांच हो गया और उनका चित्त उस स्त्रीमें रम गया॥ ४॥
महाभिषं सापि मत्वा प्रेमयुक्ता बभूव ह।<br>किञ्चिन्मन्दस्मितं कृत्वा तस्थावग्रे नृपस्य च॥ ५<br><br>वीक्ष्य तामसितापाङ्गीं राजा प्रीतमना भृशम्।<br>उवाच मधुरं वाक्यं सान्त्वयन् श्लक्ष्णया गिरा॥ ६वह स्त्री भी उन्हें राजा महाभिष जानकर प्रेमासक्त हो गयी। वह मन्द-मन्द मुसकराती हुई राजाके सामने खड़ी हो गयी। उस सुन्दरीको देखकर राजा अत्यन्त प्रेमविवश हो गये तथा कोमल वाणीसे उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वचन कहने लगे॥ ५-६॥
देवी वा त्वं च वामोरु मानुषी वा वरानने।<br>गन्धर्वी वाथ यक्षी वा नागकन्याप्सरापि वा॥ ७<br><br>यासि कासि वरारोहे भार्या मे भव सुन्दरि।<br>प्रेमयुक्तस्मितैव त्वं धर्मपत्नी भवाद्य मे॥ ८हे वामोरु! हे सुमुखि! तुम कोई देवी, मानुषी, गन्धर्वी, यक्षी, नागकन्या अथवा अप्सरा तो नहीं हो। हे वरारोहे! तुम जो कोई भी हो, मेरी भार्या बन जाओ। हे सुन्दरि! तुम प्रेमपूर्वक मुसकरा रही हो; अब मेरी धर्मपत्नी बन जाओ॥ ७-८॥
सूत उवाच<br>राजा तां नाभिजानाति गङ्गेयमिति निश्चितम्।<br>महाभिषं समुत्पन्नं नृपं जानाति जाह्नवी॥ ९<br><br>पूर्वप्रेमसमायोगाच्छ्रुत्वा वाचं नृपस्य ताम्।<br>उवाच नारी राजानं स्मितपूर्वमिदं वचः॥ १०सूतजी बोले—राजा शन्तनु तो निश्चितरूपसे नहीं जान सके कि ये वे ही गंगा हैं, किंतु गंगाने उन्हें पहचान लिया कि ये शन्तनुके रूपमें उत्पन्न वही राजा महाभिष हैं। पूर्वकालीन प्रेमवश राजा शन्तनुके उस वचनको सुनकर उस स्त्रीने मन्द मुसकान करके यह वचन कहा॥ ९-१०॥
स्त्र्युवाच<br>जानामि त्वां नृपश्रेष्ठ प्रतीपतनयं शुभम्।<br>का न वाञ्छति चार्वङ्गी भावित्वात्सदृशं पतिम्॥ ११स्त्री बोली—हे नृपश्रेष्ठ! मैं यह जानती हूँ कि आप महाराज प्रतीपके योग्य पुत्र हैं। अतः भला कौन ऐसी स्त्री होगी, जो संयोगवश अपने अनुरूप पुरुषको पाकर भी उसे पतिरूपमें स्वीकार न करेगी॥ ११॥

अ० ४] द्वितीय स्कन्ध १९१


संस्कृत मूल (श्लोक)हिन्दी अनुवाद
वाग्बन्धेन नृपश्रेष्ठ वरिष्यामि पतिं किल।<br>शृणु मे समयं राजन् वृणोमि त्वां नृपोत्तम॥ १२हे नृपश्रेष्ठ! वचनबद्ध करके ही मैं आपको अपना पति स्वीकार करूँगी। हे राजन्! हे नृपोत्तम! अब आप मेरी शर्त सुनिये, जिससे मैं आपका वरण कर सकूँ॥ १२॥
यच्च कुर्यामहं कार्यं शुभं वा यदि वाशुभम्।<br>न निषेध्या त्वया राजन्न वक्तव्यं तथाप्रियम्॥ १३<br><br>यदा च त्वं नृपश्रेष्ठ न करिष्यसि मे वचः।<br>तदा मुक्त्वा गमिष्यामि यथेष्टदेशं मारिष॥ १४हे राजन्! मैं भला-बुरा जो भी कार्य करूँ, आप मुझे मना नहीं करेंगे तथा न कोई अप्रिय बात ही कहेंगे। जिस समय आप मेरा यह वचन नहीं मानेंगे, उसी समय हे मान्य नृपश्रेष्ठ! मैं आपको त्यागकर जहाँ चाहूँगी, उस जगह चली जाऊँगी॥ १३-१४॥
स्मृत्वा जन्म वसूनां सा प्रार्थनापूर्वकं हृदि।<br>महाभिषस्य प्रेमाथ विचिन्त्यैव च जाह्नवी॥ १५<br><br>तथेत्युक्ताथ सा देवी चकार नृपतिं पतिम्।<br>एवं वृता नृपेणाथ गङ्गा मानुषरूपिणी॥ १६<br><br>नृपस्य मन्दिरं प्राप्ता सुभगा वरवर्णिनी।<br>नृपतिस्तां समासाद्य चिक्रीडोपवने शुभे॥ १७उस समय प्रार्थनापूर्वक वसुओंके जन्म ग्रहण करनेका स्मरण करके तथा महाभिषकके पूर्वकालीन प्रेमको अपने मनमें सोच करके गंगाजीने राजा शन्तनुके 'तथास्तु' कहनेपर उन्हें अपना पति बनाना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार मानवीरूप धारण करनेवाली रूपवती तथा सुन्दर वर्णवाली गंगा महाराज शन्तनुकी पत्नी बनकर राजभवनमें पहुँच गयीं। राजा शन्तनु उन्हें पाकर सुन्दर उपवनमें विहार करने लगे॥ १५-१७॥
सापि तं रमयामास भावज्ञा वै वराङ्गना।<br>न बुबोध नृपः क्रीडनातान्वर्षगणानथ॥ १८<br><br>स तया मृगशावाक्ष्या शच्या शतक्रतुर्यथा।<br>सा सर्वगुणसम्पन्ना सोऽपि कामविचक्षणः॥ १९<br><br>रेमाते मन्दिरे दिव्ये रमानारायणाविव।<br>एवं गच्छति काले सा दधार नृपतेस्तदा॥ २०भावोंको जाननेवाली वे सुन्दरी गंगा भी राजा शन्तनुके साथ विहार करने लगीं। उनके साथ महाराज शन्तनुको क्रीडा करते अनेक वर्ष बीत गये, पर उन्हें समय बीतनेका बोध ही न हुआ। वे उन मृगलोचनाके साथ उसी प्रकार विहार करते थे जिस प्रकार इन्द्राणीके साथ इन्द्र। सर्वगुणसम्पन्ना गंगा तथा चतुर शन्तनु भी दिव्य भवनमें लक्ष्मी तथा नारायणकी भाँति विहार करने लगे॥ १८-१९ ½॥
गर्भं गङ्गा वसुं पुत्रं सुषुवे चारुलोचना।<br>जातमात्रं सुतं वारि चिक्षेपैवं द्वितीयके॥ २१<br><br>तृतीयेऽथ चतुर्थेऽथ पञ्चमे षष्ठ एव च।<br>सप्तमे वा हते पुत्रे राजा चिन्तापरोऽभवत्॥ २२इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर गंगाजीने महाराज शन्तनुसे गर्भ धारण किया और यथासमय उन सुनयनीने एक वसुको पुत्ररूपमें जन्म दिया। उन्होंने उस बालकको उत्पन्न होते ही तत्काल जलमें फेंक दिया। इस प्रकार दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठें तथा सातवें पुत्रके मारे जानेपर राजा शन्तनुको बड़ी चिन्ता हुई॥ २०-२२॥
किं करोम्यद्य वंशो मे कथं स्यात्सुस्थिरो भुवि।<br>सप्त पुत्रा हता नूनमनया पापरूपया॥ २३[उन्होंने सोचा—] अब मैं क्या करूँ? मेरा वंश इस पृथ्वीपर सुस्थिर कैसे होगा? इस पापिनीने मेरे सात पुत्र मार डाले। यदि इसे रोकता हूँ तो

| १९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
निवारयामि यदि मां त्यक्त्वा यास्यति सर्वथा।<br>अष्टमोऽयं सुसम्प्राप्तो गर्भो मे मनसीप्सितः॥ २४<br><br>न वारयामि चेदद्य सर्वथेयं जले क्षिपेत्।<br>भविता वा न वा चाग्रे संशयोऽयं ममाद्भुतः॥ २५<br><br>सम्भवेऽपि च दुष्टेयं रक्षेद्यद्वा न रक्षयेत्।<br>एवं संशयिते कार्ये किं कर्तव्यं मयाधुना॥ २६यह मुझे त्यागकर चली जायगी। मेरा अभिलषित आठवाँ गर्भ भी इसे प्राप्त हो गया है। यदि अब भी मैं इसे रोकता नहीं हूँ तो यह इसे भी जलमें फेंक देगी। यह भी मुझे महान् सन्देह है कि भविष्यमें कोई और सन्तति होगी अथवा नहीं। यदि उत्पन्न हो भी तो पता नहीं कि यह दुष्टा उसकी रक्षा करेगी अथवा नहीं? इस संशयकी स्थितिमें मैं अब क्या करूँ?॥ २३–२६॥
वंशस्य रक्षणार्थं हि यत्नः कार्यः परो मया।<br>ततः काले यदा जातः पुत्रोऽयमष्टमो वसुः॥ २७<br><br>मुनेर्येन हृता धेनुर्नन्दिनी स्त्रीजितेन हि।<br>तं दृष्ट्वा नृपतिः पुत्रं तामुवाच पतन्पदे॥ २८वंशकी रक्षाके लिये मुझे कोई दूसरा यत्न करना ही होगा। तदनन्तर यथासमय जब वह आठवाँ 'द्यौ' नामक वसु पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ, जिसने अपनी स्त्रीके वशीभूत होकर वसिष्ठकी नन्दिनी गौका हरण कर लिया था, तब उस पुत्रको देखकर राजा शान्तनु गंगाजीके पैरोंपर गिरते हुए कहने लगे॥ २७-२८॥
दासोऽस्मि तव तन्वङ्गि प्रार्थयामि शुचिस्मिते।<br>पुत्रमेकं पुषाम्येनं देहि जीवितमद्य मे॥ २९हे तन्वंगि! मैं तुम्हारा दास हूँ। हे शुचिस्मिते! मैं प्रार्थना करता हूँ। मैं इस पुत्रको पालना चाहता हूँ, अतः इसे जीवित ही मुझे दे दो॥ २९॥
हिंसिताः सप्त पुत्रा मे करभोरु त्वया शुभाः।<br>अष्टमं रक्ष सुश्रोणि पतामि तव पादयोः॥ ३०हे करभोरु! तुमने मेरे सात सुन्दर पुत्रोंको मार डाला, किंतु इस आठवें पुत्रकी रक्षा करो। हे सुश्रोणि! मैं तुम्हारे पैरोंपर पड़ता हूँ॥ ३०॥
अन्यद्वै प्रार्थितं तेऽद्य ददाम्यथ च दुर्लभम्।<br>वंशो मे रक्षणीयोऽद्य त्वया परमशोभने॥ ३१हे परम रूपवती! इसके बदले तुम मुझसे जो माँगोगी, मैं वह दुर्लभ वस्तु भी तुम्हें दूँगा। अब तुम मेरे वंशकी रक्षा करो॥ ३१॥
अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गे वेदविदो विदुः।<br>तस्मादद्य वरारोहे प्रार्थयाम्यष्टमं सुतम्॥ ३२वेदविद् विद्वानोंने कहा है कि पुत्रहीन मनुष्यकी स्वर्गमें भी गति नहीं होती। इसी कारण हे सुन्दरि! अब मैं इस आठवें पुत्रके लिये याचना करता हूँ॥ ३२॥
इत्युक्तापि गृहीत्वा तं यदा गन्तुं समुत्सुका।<br>तदातिकुपतो राजा तामुवाचातिदुःखितः॥ ३३<br><br>पापिष्ठे किं करोम्यद्य निरयान्न बिभेषि किम्।<br>कासि पापकराणां त्वं पुत्री पापरता सदा॥ ३४<br><br>यथेच्छं गच्छ वा तिष्ठ पुत्रो मे स्थीयतामिह।<br>किं करोमि त्वया पापे वंशान्तकरयानया॥ ३५राजा शान्तनुके ऐसा कहनेपर भी जब गंगा उस पुत्रको लेकर जानेको उद्यत हुईं, तब उन्होंने अत्यन्त कुपित एवं दुःखित होकर उनसे कहा—'हे पापिनि! अब मैं क्या करूँ? क्या तुम नरकसे भी नहीं डरती? तुम कौन हो? लगता है कि तुम पापियोंकी पुत्री हो, तभी तो तुम सदा पापकर्ममें लगी रहती हो, अब तुम जहाँ चाहो वहाँ जाओ या रहो, किंतु यह पुत्र यहीं रहेगा। हे पापिनि! अपने वंशका अन्त करनेवाली ऐसी तुम्हें रखकर भी मैं क्या करूँगा?'॥ ३३–३५॥
अ० ४ ]द्वितीय स्कन्ध१९३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं वदति भूपाले सा गृहीत्वा सुतं शिशुम्।<br>गच्छन्ती वचनं कोपसंयुता तमुवाच ह॥ ३६<br><br>पुत्रकामा सुतं त्वेनं पालयामि वने गता।<br>समयो मे गमिष्यामि वचनं ह्यन्यथाकृतम्॥ ३७<br><br>गङ्गां मां वै विजानीहि देवकार्यार्थमागताम्।<br>वसवस्तु पुरा शप्ता वसिष्ठेन महात्मना॥ ३८<br><br>व्रजन्तु मानुषीं योनिं स्थितां चिन्तातुरास्तु माम्।<br>दृष्ट्वेदं प्रार्थयामासुर्जननी नो भवानघे॥ ३९<br><br>तेभ्यो दत्त्वा वरं जाता पत्नी ते नृपसत्तम।<br>देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं जानीहि सम्भवो मम॥ ४०राजाके ऐसा कहनेपर उस नवजात शिशुको लेकर जाती हुई गंगाने क्रोधपूर्वक उनसे कहा—पुत्रकी कामनावाली मैं भी इस पुत्रको वनमें ले जाकर पालूंगी। शर्तके अनुसार अब मैं चली जाऊँगी; क्योंकि आपने अपना वचन तोड़ा है। [हे राजन्!] मुझे आप गंगा जानिये; देवताओंका कार्य सम्पन्न करनेके लिये ही मैं यहाँ आयी थी। महात्मा वसिष्ठने प्राचीन कालमें आठों वसुओंको शाप दिया था कि तुम सब मनुष्ययोनिमें जाकर जन्म लो। तब चिन्तासे व्याकुल होकर आठों वसु मुझे वहाँ स्थित देखकर कहने लगे—हे अनघे! आप हमारी माता बनें। अतः हे नृपश्रेष्ठ! उन्हें वरदान देकर मैं आपकी पत्नी बन गयी। आप ऐसा समझ लीजिये कि देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये ही मेरा जन्म हुआ है॥ ३६—४०॥
सप्त ते वसवः पुत्रा मुक्ताः शापाद्बृहैस्तु ते।<br>कियन्तं कालमेकोऽयं तव पुत्रो भविष्यति॥ ४१<br><br>गङ्गादत्तमिमं पुत्रं गृहाण शन्तनो स्वयम्।<br>वसुं देवं विदित्वैनं सुखं भुंक्ष्व सुतोद्भवम्॥ ४२<br><br>गाङ्गेयोऽयं महाभाग भविष्यति बलाधिकः।<br>अद्य तत्र नयाम्येनं यत्र त्वं वै मया वृतः॥ ४३वे सातों वसु तो आपके पुत्र बनकर ऋषिके शापसे विमुक्त हो गये। यह आठवाँ वसु कुछ समयतक आपके पुत्ररूपमें विद्यमान रहेगा। अतः हे महाराज शन्तनु! मुझ गंगाके द्वारा दिये हुए पुत्रको आप स्वीकार कीजिये। इसे आठवाँ वसु जानते हुए आप पुत्र-सुखका भोग करें; क्योंकि हे महाभाग! यह 'गांगेय' बड़ा ही बलवान् होगा। अब इसे मैं वहीं ले जा रहीं हूँ, जहाँ मैंने आपका पतिरूपसे वरण किया था॥ ४१—४३॥
दास्यामि यौवनप्राप्तं पालयित्वा महीपते।<br>न मातुरहितः पुत्रो जीवेन्न च सुखी भवेत्॥ ४४हे राजन्! इसे पालकर इसके युवा होनेपर मैं पुनः आपको दे दूँगी; क्योंकि मातृहीन बालक न जी पाता है और न सुखी रहता है॥ ४४॥
इत्युक्त्वान्तर्दधे गङ्गा तं गृहीत्वा च बालकम्।<br>राजा चातीव दुःखार्तः संस्थितो निजमन्दिरे॥ ४५ऐसा कहकर उस बालकको लेकर गंगा वहीं अन्तर्धान हो गयीं। राजा भी अत्यन्त दुःखित होकर अपने राजभवनमें रहने लगे॥ ४५॥
भार्याविरहजं दुःखं तथा पुत्रस्य चाद्भुतम्।<br>सर्वदा चिन्तयन्नास्ते राज्यं कुर्वन्महीपतिः॥ ४६महाराज शन्तनु स्त्री तथा पुत्रके वियोगजन्य महान् कष्टका सदा अनुभव करते हुए भी किसी प्रकार राज्यकार्य सँभालने लगे॥ ४६॥
एवं गच्छति कालेऽथ नृपतिर्मृगयां गतः।<br>निघ्नन्मृगगणान्बाणैर्महिषान्सूकरानपि ॥ ४७<br><br>गङ्गातीरमनुप्राप्तः स राजा शन्तनुस्तदा।<br>नदीं स्तोकजलां दृष्ट्वा विस्मितः स महीपतिः॥ ४८कुछ समय बीतनेपर महाराज आखेटके लिये वनमें गये। वहाँ अनेक प्रकारके मृगगणों, भैंसों तथा सूकरोंको अपने बाणोंसे मारते हुए वे गंगाजीके तटपर जा पहुँचे। उस नदीमें बहुत थोड़ा जल देखकर वे राजा शन्तनु बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ ४७-४८॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—7 A