देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 193, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |
| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा तां वशं यातां भुक्त्वा स मुनिसत्तमः ॥ ३५<br>जगाम तरसा स्नात्वा कालिन्दीसलिले मुनिः।<br>सापि सत्यवती जाता सद्यो गर्भवती सती ॥ ३६ | सूतजी बोले—ऐसा कहकर अपने वशमें आयी हुई उस कन्याके साथ संसर्ग करके मुनिश्रेष्ठ पराशर तत्काल यमुनानदीमें स्नानकर वहाँसे शीघ्र चले गये। वह साध्वी सत्यवती भी तत्काल गर्भवती हो गयी॥ ३५-३६॥ | | सुषुवे यमुनाद्वीपे पुत्रं काममिवापरम्।<br>जातमात्रस्तु तेजस्वी तामुवाच स्वमातरम् ॥ ३७<br><br>तपस्येव मनः कृत्वा विविशे चातिवीर्यवान्।<br>गच्छ मातर्यथाकामं गच्छाम्यहमतः परम् ॥ ३८<br><br>तपः कर्तुं महाभागे दर्शयिष्यामि वै स्मृतः।<br>मातर्यदा भवेत्कार्यं तव किञ्चिदनुत्तमम् ॥ ३९<br><br>स्मर्त्तव्योऽहं तदा शीघ्रमागमिष्यामि भामिनि।<br>स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि त्यक्त्वा चिन्तां सुखं वस ॥ ४० | [यथासमय] सत्यवतीने यमुनाजीके द्वीपमें दूसरे कामदेवके तुल्य एक सुन्दर पुत्रको जन्म दिया। उत्पन्न होते ही उस तेजवान् पुत्रने अपनी मातासे कहा—हे माता! मनमें तपस्याका निश्चय करके ही अत्यन्त तेजस्वी मैं गर्भमें प्रविष्ट हुआ था। हे महाभागे! अब आप अपनी इच्छानुसार कहीं भी चली जायँ और मैं भी यहाँसे तप करनेके लिये जा रहा हूँ। हे माता! आपके स्मरण करनेपर मैं अवश्य ही दर्शन दूँगा। हे माता! जब कोई उत्तम कार्य आ पड़े तब आप मेरा स्मरण कीजियेगा, मैं शीघ्र ही उपस्थित हो जाऊँगा। हे भामिनि! आपका कल्याण हो, अब मैं चलूँगा। आप चिन्ता छोड़कर सुखपूर्वक रहिये॥ ३७—४०॥ | | इत्युक्त्वा निर्ययौ व्यासः सापि पित्रन्तिकं गता।<br>द्वीपे न्यस्तस्तया बालस्तस्माद् द्वैपायनोऽभवत् ॥ ४१ | ऐसा कहकर व्यासजी चले गये और वह सत्यवती भी अपने पिताके पास चली गयी। सत्यवतीने बालकको यमुनाद्वीपमें जन्म दिया था। अतः वह बालक 'द्वैपायन' नामसे विख्यात हुआ॥ ४१॥ | | जातमात्रो जगामाशु वृद्धिं विष्ण्वंशयोगतः।<br>तीर्थे तीर्थे कृतस्नानश्चचार तप उत्तमम् ॥ ४२ | विष्णुभगवान्के अंशावतार होनेके कारण वह बालक उत्पन्न होते ही शीघ्र बड़ा हो गया तथा अनेक तीर्थोंमें स्नान करता हुआ उत्तम तप करने लगा॥ ४२॥ | | एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात्।<br>चकार वेदशाखाश्च प्राप्तं ज्ञात्वा कलेर्युगम् ॥ ४३<br><br>वेदविस्तारकरणाद्व्यासनामाभवन्मुनिः।<br>पुराणसंहिताश्चक्रे महाभारतमृत्तमम् ॥ ४४<br><br>शिष्यानध्यापयामास वेदान्कृत्वा विभागशः।<br>सुमन्तुं जैमिनिं पैलं वैशम्पायनमेव च ॥ ४५<br><br>असितं देवलं चैव शुकं चैव स्वमात्मजम्। | इस प्रकार पराशरमुनिके द्वारा सत्यवतीके गर्भसे द्वैपायन उत्पन्न हुए और उन्होंने ही कलि-युगको आया जानकर वेदोंको अनेक शाखाओंमें विभक्त किया, वेदोंका विस्तार करनेके कारण ही उन मुनिका नाम 'व्यास' पड़ गया। उन्होंने ही विभिन्न पुराणसंहिताओं तथा श्रेष्ठ महाभारतकी रचना की। उन्होंने ही वेदोंके अनेक विभाग करके उसे अपने शिष्यों—सुमन्तु, जैमिनि, पैल, वैशम्पायन, असित, देवल और अपने पुत्र शुकदेवजीको पढ़ाया॥ ४३—४५ १/२॥ |