भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 889 में से

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पृष्ठ 192
अ० २ ]द्वितीय स्कन्ध१८३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रात्रौ व्यवाय उद्दिष्टो दिवा न मनुजस्य हि।<br>दिवासङ्गे महान् दोषः पश्यन्ति किल मानवाः॥ २२<br><br>कामं यच्छ महाबुद्धे लोकनिन्दा दुरासदा।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या युक्तमुक्तमुदारधीः॥ २३<br><br>नीहारं कल्पयामास शीघ्रं पुण्यबलेन वै।<br>नीहारे च समुत्पन्ने ततेऽतितमसा युते॥ २४<br><br>कामिनीं तं मुनिं प्राह मृदुपूर्वमिदं वचः।<br>कन्याहं द्विजशार्दूल भुक्त्वा गन्तासि कामतः॥ २५<br><br>अमोघवीर्यस्त्वं ब्रह्मन् का गतिर्मे भवेदिति।<br>पितरं किं ब्रवीम्यद्य सगर्भा चेद्द्वाव्यहम्॥ २६<br><br>त्वं गमिष्यसि भुक्त्वा मां किं करोमि वदस्व तत्।मनुष्यके लिये कामसंसर्ग रातमें ही विहित है, दिनमें नहीं। दिनमें संसर्ग करनेसे महान् दोष होता है और बहुत-से लोग उसे देख भी लेते हैं॥ २२॥<br><br>हे महाबुद्धे! अब आपकी जैसी इच्छा हो वैसा करें, लोकनिन्दा अत्यन्त कष्टकर होती है। सत्यवतीका कहा गया युक्तिसंगत वचन सुनकर उदार बुद्धिवाले पराशरमुनिने अपने पुण्यबलसे तत्क्षण कुहरा उत्पन्न कर दिया। उस कुहरेके उत्पन्न हो जानेपर अत्यन्त अन्धकारमय नदीतटपर उस कामिनीने पराशरमुनिसे मधुर वाणीमें यह वचन कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! मैं अभी कन्या हूँ और आप मेरे साथ संसर्ग करके चले जायँगे। हे ब्रह्मन्! आप अमोघ वीर्यवाले हैं, ऐसी स्थितिमें मेरी क्या गति होगी? यदि मैं गर्भधारण कर लूँगी तो पिताको क्या उत्तर दूँगी? हे ब्रह्मन्! मेरे साथ संसर्ग करके आप चले जायँगे तब मैं क्या करूँगी, उसे बताइये?॥ २३—२६ १/२॥
पराशर उवाच<br>कान्तेऽद्य मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि॥ २७<br><br>वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि।पराशर बोले— हे प्रिये! आज मुझे प्रसन्न करके भी तुम कन्या ही बनी रहोगी। हे भामिनि! हे भीरु! तुम जो वर चाहती हो, उसे माँग लो॥ २७ १/२॥
सत्यवत्युवाच<br>यथा मे पितरौ लोके न जानीतो हि मानद॥ २८<br><br>कन्याव्रतं न मे हन्यात्तथा कुरु द्विजोत्तम।<br>पुत्रश्च त्वत्समः कामं भवेदद्भुतवीर्यवान्॥ २९<br><br>गन्धोऽयं सर्वदा मे स्याद्यौवनं च नवं नवम्।सत्यवती बोली— हे मानद! आप ऐसा वरदान दीजिये, जिससे मेरे माता-पिता लोकमें इसे न जान सकें। साथ ही हे विप्रवर! आप ऐसा करें, जिससे मेरा कन्याव्रत नष्ट न हो और जो पुत्र उत्पन्न हो, वह आपहीके समान अपूर्व ओजस्वी हो, मेरी यह सुगन्ध सदा बनी रहे और मेरा यौवन नित नूतन बना रहे॥ २८–२९ १/२॥
पराशर उवाच<br>शृणु सुन्दरि पुत्रस्ते विष्णवंशसम्भवः शुचिः॥ ३०<br><br>भविष्यति च विख्यातस्त्रैलोक्ये वरवर्णिनि।<br>केनचित्कारणेनाहं जातः कामातुरस्त्वयि॥ ३१<br><br>कदापि च न सम्मोहो भूतपूर्वो वरानने।<br>दृष्ट्वा चाप्सरसां रूपं सदाहं धैर्यमावहम्॥ ३२<br><br>दैवयोगेन वीक्ष्य त्वां कामस्य वशगोऽभवम्।<br>तत्किञ्चित्कारणं विद्धि दैवं हि दुरतिक्रमम्॥ ३३<br><br>दृष्ट्वाहं चातिदुर्गन्धां त्वां कथं मोहमाप्नुयाम्।<br>पुराणकर्ता पुत्रस्ते भविष्यति वरानने॥ ३४<br><br>वेदविद्भागकर्ता च ख्यातश्च भुवनत्रये।पराशर बोले— हे सुन्दरि! सुनो, तुम्हारा पुत्र पवित्र तथा भगवान् विष्णुके अंशसे अवतीर्ण होगा। हे सुन्दरि! वह तीनों लोकोंमें विख्यात होगा। मैं तुम्हारे ऊपर किसी कारणविशेषसे ही कामासक्त हुआ हूँ। हे सुमुखि! मुझे ऐसा मोह पूर्वमें कभी नहीं हुआ। अप्सराओंके रूपको देखकर भी मैं सदा धैर्य धारण किये रहा। दैवयोगसे ही तुम्हें देखकर मैं इस प्रकार कामके वशीभूत हुआ हूँ। इस विषयमें तुम कोई विशेष कारण ही समझो, दैवका अतिक्रमण अत्यन्त कठिन है, अन्यथा अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त तुम्हें देखकर मैं इस प्रकार क्यों मोहित होता! हे वरानने! तुम्हारा पुत्र पुराणोंका रचयिता, वेदोंका विभाग करनेवाला तथा तीनों लोकोंमें विख्यात होगा॥ ३०—३४ १/२॥
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