देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| १८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दुर्लभं मानुषं जन्म भुवि ब्राह्मणसत्तम।<br>तत्रापि दुर्लभं मन्ये ब्राह्मणत्वं विशेषतः॥ १० | हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर मनुष्यजन्म दुर्लभ है। उसमें भी ब्राह्मणकुलमें जन्म लेना तो मैं विशेषरूपसे दुर्लभ मानती हूँ॥ १०॥ |
| कुलेन शीलेन तथा श्रुतेन<br>द्विजोत्तमस्त्वं किल धर्मविच्च।<br>अनार्यभावं कथमागतोऽसि<br>विप्रेन्द्र मां वीक्ष्य च मीनगन्धाम्॥ ११<br>मदीये शरीरे द्विजामोघबुद्धे<br>शुभं किं समालोक्य पाणिं ग्रहीतुम्।<br>समीपं समायासि कामातुरस्त्वं<br>कथं नाभिजानासि धर्मं स्वकीयम्॥ १२ | हे विप्रेन्द्र! आप कुलसे, शीलसे तथा वेदाध्ययनसे एक धर्मपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं? मुझ मत्स्यगन्धाको देखकर आप अनाचारयुक्त विचारवाले कैसे हो गये? हे अमोघ बुद्धिवाले ब्राह्मण! मेरे शरीरमें स्थित किस विशेषताको देखकर आप मेरा हाथ पकड़नेके लिये कामासक्त होकर मेरी ओर चले आ रहे हैं? क्या आपको अपने धर्मका ज्ञान नहीं है?॥ ११-१२॥ |
| अहो मन्दबुद्धिर्द्विजोऽयं ग्रहीष्य-<br>ञ्जले मग्न एवाद्य मां वै गृहीत्वा।<br>मनो व्याकुलं पञ्चबाणातिविद्धं<br>न कोऽपीह शक्तः प्रतीपं हि कर्तुम्॥ १३ | अहो, ये मन्दबुद्धि ब्राह्मण इस जलमें मुझे पकड़नेको आतुर हो रहे हैं। मेरा स्पर्श करके कामबाणसे आहत इनका मन व्याकुल हो उठा है। इस समय कोई भी इन्हें रोकनेमें समर्थ नहीं है॥ १३॥ |
| इति सञ्चिन्त्य सा बाला तमुवाच महामुनिम्।<br>धैर्यं कुरु महाभाग परं पारं नयामि वै॥ १४ | ऐसा सोचकर उस निषादकन्याने महामुनि पराशरसे कहा—हे महाभाग! आप धैर्य धारण करें; मैं अभी आपको उस पार ले चलती हूँ॥ १४॥ |
| सूत उवाच<br>पराशरस्तु तच्छ्रुत्वा वचनं हितपूर्वकम्।<br>करं त्यक्त्वा स्थितस्तत्र सिन्धोः पारं गतः पुनः॥ १५ | सूतजी बोले—मुनि पराशर उसका हितकारी वचन सुनकर उसका हाथ छोड़ करके वहीं स्थित हो गये और उस पार पहुँच गये॥ १५॥ |
| मत्स्यगन्धां प्रजग्राह मुनिः कामातुरस्तदा।<br>वेपमाना तु सा कन्या तमुवाच पुरःस्थितम्॥ १६<br>दुर्गन्धांहं मुनिश्रेष्ठ कथं त्वं नोपशङ्कसे।<br>समानरूपयोः कामसंयोगस्तु सुखावहः॥ १७ | तदनन्तर पराशरमुनिने मत्स्यगन्धाको पकड़ लिया। तब भयसे काँपती हुई वह कन्या सम्मुखस्थित मुनिसे कहने लगी—हे मुनिवर! मैं दुर्गन्धवाली हूँ, मुझसे क्या आपको घृणा नहीं हो रही है? समान रूपवालोंके बीच ही परस्पर सम्बन्ध आनन्ददायक होता है॥ १६-१७॥ |
| इत्युक्तेन तु सा कन्या क्षणमात्रेण भामिनी।<br>कृता योजनगन्धा तु सुरूपा च वरानना॥ १८ | मत्स्यगन्धाके ऐसा कहते ही पराशरमुनिने क्षण-मात्रमें अपने तपोबलसे उस भामिनी कन्याको सुमुखी, रूपवती तथा योजनगन्धा बना दिया॥ १८॥ |
| मृगनाभिसुगन्धां तां कृत्वा कान्तां मनोहराम्।<br>जग्राह दक्षिणे पाणौ मुनिर्मन्मथपीडितः॥ १९<br>ग्रहीतुकामं तं प्राह नाम्ना सत्यवती शुभा।<br>मुने पश्यति लोकोऽयं पिता चैव तटस्थितः॥ २० | उसे कस्तूरीकी सुगन्धिवाली मनोहर स्त्री बनाकर कामातुर मुनिराजने अपने दाहिने हाथसे उसे पकड़ लिया। तब सत्यवती नामवाली उस सुन्दरीने संयोगकी कामनावाले मुनिसे कहा—हे मुने! तटपर स्थित मेरे पिता तथा सभी लोग यहाँ हमें देख रहे हैं॥ १९-२०॥ |
| पशुधर्मो न मे प्रीतिं जनयत्यतिदारुणः।<br>प्रतीक्षस्व मुनिश्रेष्ठ यावद्भवति यामिनी॥ २१ | हे मुनिश्रेष्ठ! यह भीषण पशुवत् व्यवहार मुझे अच्छा नहीं लगता। जबतक रात नहीं हो जाती, तबतक प्रतीक्षा कीजिये॥ २१॥ |