भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 190
अ० २ ]द्वितीय स्कन्ध१८१
एवं जाता वरा पुत्री मत्स्यगन्धा वरानना।<br>पुत्रीव पाल्यमाना सा दाशगेहे व्यवर्धत ॥ ४७इस प्रकार सुन्दर मुखवाली उस कन्या मत्स्य-गन्धाका जन्म हुआ। दाशके घरमें पुत्रीकी भाँति पालन-पोषणकी जाती हुई वह कन्या बढ़ने लगी ॥ ४७ ॥
मत्स्यगन्धा तदा जाता किशोरी चातिसुप्रभा।<br>तस्य कार्याणि कुर्वाणा वासवी चातिसुप्रभा ॥ ४८जब वह मत्स्यगन्धा किशोरावस्थाको प्राप्त हुई, तब उसका सौन्दर्य और भी बढ़ गया। वह परम सुन्दरी वसुकन्या निषादराजके कार्योंको करती हुई रहने लगी ॥ ४८ ॥
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इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे मत्स्यगन्धोत्पत्तिवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
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अथ द्वितीयोऽध्यायः

व्यासजीकी उत्पत्ति और उनका तपस्याके लिये जाना

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सूत उवाच
एकदा तीर्थयात्रायां व्रजन् पाराशरो मुनिः।<br>आजगाम महातेजाः कालिन्द्यास्तटमुत्तमम् ॥ १**सूतजी बोले—**एक बार तीर्थयात्रा करते हुए महान् तेजस्वी पराशरमुनि यमुनानदीके उत्तम तटपर आये और उन धर्मात्माने भोजन करते हुए निषादसे कहा—मुझको नावसे यमुनाके पार पहुँचा दो ॥ १-२ ॥
निषादमाह धर्मात्मा कुर्वन्तं भोजनं तदा।<br>प्रापयस्व परं पारं कालिन्द्या उडुपेन माम्॥ २
दाशः श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं कुर्वाणो भोजनं तटे।<br>उवाच तां सुतां बालां मत्स्यगन्धां मनोरमाम् ॥ ३मुनिका वचन सुनकर यमुनाके तटपर भोजन करते हुए उस निषादने अपनी सुन्दर युवा पुत्री मत्स्यगन्धासे कहा—‘हे सुन्दर मुसकानवाली पुत्रि! तुम इन मुनिको नावमें बैठाकर पार उतार दो; क्योंकि ये धर्मात्मा तपस्वी उस पार जानेके इच्छुक हैं’ ॥ ३-४ ॥
उडुपेन मुनिं बाले परं पारं नयस्व ह।<br>गन्तुकामोऽस्ति धर्मात्मा तापसोऽयं शुचिस्मिते ॥ ४
इत्युक्ता सा तदा पित्रा मत्स्यगन्धाथ वासवी।<br>उडुपे मुनिमासीनं संवाहयति भामिनी ॥ ५पिताके ऐसा कहनेपर वह सुन्दर वासवी मत्स्यगन्धा मुनिको नावमें बैठाकर खेने लगी। यमुनानदीके जलपर नावसे चलते समय दैवयोगसे प्रारब्धानुसार मुनि पराशर उस सुन्दर नेत्रोंवाली कन्याको देखकर आसक्त हो गये ॥ ५-६ ॥
व्रजन् सूर्यसुतातोये भावित्वाद्दैवयोगतः।<br>कामार्तस्तु मुनिर्जातो दृष्ट्वा तां चारुलोचनाम् ॥ ६
ग्रहीतुकामः स मुनिर्दृष्ट्वा व्यञ्जितयौवनाम्।<br>दक्षिणेन करेणैनामस्पृशद्दक्षिणे करे ॥ ७प्रस्फुटित यौवनवाली उस कन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छावाले मुनिराजने अपनी दाहिनी भुजासे उसकी दाहिनी भुजाका स्पर्श किया ॥ ७ ॥
तमुवाचासितापाङ्गी स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>कुलस्य सदृशं वः किं श्रुतस्य तपसश्च किम् ॥ ८इसपर उस असितापांगीने मुसकराकर कहा—क्या आपका यह कृत्य आपके कुल, तपस्या तथा वेदज्ञानके अनुरूप है ? हे धर्मज्ञ! आप वसिष्ठजीके वंशज हैं और कुल तथा शीलसे युक्त हैं फिर भी कामदेवसे पीड़ित होकर आप क्या करना चाहते हैं ? ॥ ८-९ ॥
त्वं वै वसिष्ठदायादः कुलशीलसमन्वितः।<br>किं चिकीर्षसि धर्मज्ञ मन्मथेन प्रपीडितः॥ ९