भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 189
१८०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
बालः कुमारः सुभगस्तथा कन्या शुभानना।<br>दृष्ट्वाश्चर्यमिदं सोऽथ विस्मयं परमं गतः ॥ ३५उन दोनोंमें एक रूपवान् बालक तथा एक सुन्दर मुखवाली बालिका थी। इस अद्भुत घटनाको देखकर वह भी अत्यन्त विस्मित हुआ॥ ३५॥
राज्ञे निवेदयामास पुत्रौ द्वौ तु झषोद्भवौ।<br>राजापि विस्मयाविष्टः सुतं जग्राह तं शुभम् ॥ ३६उसने मछलीके पेटसे निकले उन दोनों बच्चोंको राजा उपरिचरको सौंप दिया। राजा भी आश्चर्यचकित हुआ और उसने उस सुन्दर पुत्रको ले लिया॥ ३६॥
स मत्स्यो नाम राजासौ धार्मिकः सत्यसङ्गरः।<br>वसुपुत्रो महातेजाः पित्रा तुल्यपराक्रमः ॥ ३७वह वसुपुत्र मत्स्य नामक राजा हुआ, जो अपने पिताके समान ही धर्मात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, महातेजस्वी तथा पराक्रमी था॥ ३७॥
कालिका वसुना दत्ता तरसा जलजीविने।<br>नाम्ना कालीति विख्याता तथा मत्स्योदरीति च ॥ ३८राजा उपरिचर वसुने वह कन्या उस मछुआरेको ही दे दी, जो आगे चलकर काली तथा मत्स्योदरी नामसे प्रसिद्ध हुई। अपने गुणविशेषके कारण वह मत्स्यगन्धा नामसे कही जाने लगी। उस मछुआरे दाशके घर वह सुन्दरी वासवी धीरे-धीरे बढ़ने लगी॥ ३८-३९॥
मत्स्यगन्धेति नाम्ना वै गुणेन समजायत।<br>विवर्धमाना दाशस्य गृहे सा वासवी शुभा ॥ ३९
ऋषय ऊचुः<br>अद्रिका मुनिना शप्ता मत्स्यी जाता वराप्सराः।<br>विदारिता च दाशेन मृता च भक्षिता पुनः ॥ ४०ऋषिगण बोले— हे सूतजी! मुनिके द्वारा शापित वह अद्रिका नामकी श्रेष्ठ अप्सरा जब मछली हो गयी और मछुआरेने उसे चीर डाला, तब वह मर गयी अथवा उसने उसे खा लिया। उस अप्सराका फिर क्या हुआ? उसके शापकी समाप्ति कैसे हुई और उसे पुनः स्वर्ग कैसे मिला? यह बताइये॥ ४०-४१॥
किं बभूव पुनस्तस्या अप्सराया वदस्व तत्।<br>शापस्यान्तं कथं सूत कथं स्वर्गमवाप सा ॥ ४१
सूत उवाच<br>शप्ता यदा सा मुनिना विस्मिता सम्बभूव ह।<br>स्तुतिं चकार विप्रस्य दीनेव रुदती तदा ॥ ४२सूतजी बोले— जब मुनिने उसे शाप दिया, तब वह विस्मित हो गयी और दीनतापूर्वक रोती हुई उस ब्राह्मणकी स्तुति करने लगी॥ ४२॥
दयावान् ब्राह्मणः प्राह तां तदा रुदतीं स्त्रियम्।<br>मा शोकं कुरु कल्याणि शापान्तं ते वदाम्यहम् ॥ ४३दयालु ब्राह्मणने उस रोती हुई स्त्रीसे कहा—हे कल्याणि! तुम शोक न करो, मैं तुम्हारे शापके अन्तका उपाय बताता हूँ। हे शुभे! मैंने क्रुद्ध होकर जो शाप दिया है, उससे तुम मत्स्ययोनिको प्राप्त होओगी; किंतु तुम अपने उदरसे एक युग्म मानव-सन्तान उत्पन्नकर इस शापसे मुक्त हो जाओगी॥ ४३-४४॥
मत्क्रोधशापयोगेन मत्स्ययोनिं गता शुभे।<br>मानुषौ जनयित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि ॥ ४४
इत्युक्ता तेन सा प्राप मत्स्यदेहं नदीजले।<br>बालकौ जनयित्वा सा मृता मुक्ता च शापतः ॥ ४५उनके ऐसा कहनेपर वह यमुनाजलमें मछलीका शरीर पाकर तथा दो सन्तानोंको उत्पन्न करके मर गयी और शापसे मुक्त हो गयी॥ ४५॥
सन्त्यज्य रूपं मत्स्यस्य दिव्यरूपमवाप्य च।<br>जगामामरमार्गं च शापान्ते वरवर्णिनी ॥ ४६इस प्रकार शापोद्धार होनेपर वह सुन्दरी मछलीका शरीर त्यागकर दिव्य रूप धारण करके स्वर्गको चली गयी॥ ४६॥