भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 188
अ० १ ]द्वितीय स्कन्ध१७९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पार्श्वस्थं श्येनमाभाष्य राजोवाच द्विजं प्रति।<br>गृहाणेदं महाभाग गच्छ शीघ्रं गृहं मम॥ २२<br><br>मत्प्रियार्थमिदं सौम्य गृहीत्वा त्वं गृहं नय।<br>गिरिकायै प्रयच्छाशु तस्यास्त्वार्तवमद्य वै॥ २३राजाने पास ही बैठे हुए बाज पक्षीको बुलाकर उससे कहा—‘हे महाभाग! तुम इसे ग्रहण करो और शीघ्र ही मेरे घर चले जाओ। हे सौम्य! मेरा हित करनेके लिये इसे लेकर तुम मेरे घर जाओ और इसे शीघ्र ही गिरिकाको दे देना; क्योंकि आज ही उसका ऋतुकाल है’॥ २१—२३॥
सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा प्रददौ पर्णं श्येनाय नृपसत्तमः।<br>स गृहीत्वोत्पपाताशु गगनं गतिवित्तमः॥ २४**सूतजी बोले—**ऐसा कहकर नृपश्रेष्ठने बाजको वह दोना दे दिया और वह द्रुतगामी बाज भी उसे लेकर शीघ्र ही आकाशमें उड़ने लगा॥ २४॥
गच्छन्तं गगनं श्येनं धृत्वा चञ्चुपुटे पुटम्।<br>तमपश्यदथायान्तं खगं श्येनस्तथापरः॥ २५चोंचमें पत्तेका दोना लेकर आकाशमें उड़ते हुए उस बाजको एक दूसरे बाजपक्षीने अपनी ओर आते हुए देखा॥ २५॥
आमिषं स तु विज्ञाय शीघ्रमभ्यद्रवत्खगम्।<br>तुण्डयुद्धमथाकाशे तावुभौ सम्प्रचक्रतुः॥ २६<br><br>युद्ध्यतोरपतद्रेतस्तच्चापि यमुनाम्भसि।<br>खगौ तौ निर्गतौ कामं पुटके पतिते तदा॥ २७बाजकी चोंचमें मांसका टुकड़ा समझकर तत्काल उसने उस बाजपर आक्रमण कर दिया। दोनों बाजोंके बीच आकाशमें चोंचोंसे घोर युद्ध होने लगा। उन दोनोंके युद्ध करते समय वीर्यवाला वह दोना यमुनाजीके जलमें जा गिरा। दोनेके गिर जानेपर दोनों पक्षी वहाँसे यथेच्छ दिशामें चले गये॥ २६-२७॥
एतस्मिन्समये काचिदद्रिका नाम चाप्सराः।<br>ब्राह्मणं समनुप्राप्तं सन्ध्यावन्दनतत्परम्॥ २८<br><br>कुर्वन्ती जलकेलिं सा जले मग्ना चचार सा।<br>जग्राह चरणं नारी द्विजस्य वरवर्णिनी॥ २९उसी समय अद्रिका नामकी एक अप्सरा जलमें निमग्न होकर जलक्रीडा कर रही थी। उस सुन्दरी स्त्रीने वहाँपर उपस्थित सन्ध्यावन्दन करनेमें तत्पर एक ब्राह्मणको देखा और उन ब्राह्मणका पैर पकड़ लिया॥ २८-२९॥
प्राणायामपरः सोऽथ दृष्ट्वा तां कामचारिणीम्।<br>शशाप भव मत्स्यी त्वं ध्यानविघ्नकरी यतः॥ ३०<br><br>सा शप्ता विप्रमुख्येन बभूव यमुनाचरी।<br>शफरी रूपसम्पन्ना ह्यद्रिका च वराप्सराः॥ ३१प्राणायाम करते हुए ब्राह्मणने उस स्वेच्छाचारिणीको देखकर उसे यह शाप दे दिया कि ‘तुमने मेरे ध्यानमें विघ्न डाला है, अतएव तुम मछली हो जाओ।’ इस प्रकार ब्राह्मणश्रेष्ठसे शाप पाकर वह अद्रिका नामकी रूपवती श्रेष्ठ अप्सरा मछली बनकर यमुनाके जलमें विचरने लगी॥ ३०-३१॥
श्येनपादपरिभ्रष्टं तच्छुक्रमथ वासवी।<br>जग्राह तरसाभ्येत्य साद्रिका मत्स्यरूपिणी॥ ३२बाजके पादाघातसे गिरे हुए उस वीर्यके पास जाकर मत्स्यरूपधारिणी अद्रिका अप्सराने उसे शीघ्रतापूर्वक निगल लिया॥ ३२॥
अथ कालेन कियता मत्स्यीं तां मत्स्यजीवनः।<br>सम्प्राप्ते दशमे मासि बबन्ध तां मनोरमाम्॥ ३३कुछ समय बाद दस महीने बीतनेपर एक मछुआरेने उस सुन्दर मछलीको अपने जालमें फँसा लिया॥ ३३॥
उदरं विददाराशु स तस्या मत्स्यजीवनः।<br>युग्मं विनिःसृतं तस्मादुदरान्मानुषाकृति॥ ३४उस मछुआरेने शीघ्र ही उस मछलीका पेट चीर दिया। उसके उदरसे मनुष्यके आकारवाली जुड़वाँ सन्तति निकली॥ ३४॥