भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 187
१७८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तपसा तस्य तुष्टेन विमानं स्फाटिकं शुभम्।<br>दत्तमिन्द्रेण तत्तस्मै सुन्दरं प्रियकाम्यया॥ १०देशके शासक थे। उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर देवराज इन्द्रने उन्हें प्रसन्न करनेके लिये स्फटिक मणिका बना हुआ एक सुन्दर तथा दिव्य विमान दिया॥ ९-१०॥
तेनारूढस्तु सर्वत्र याति दिव्येन भूपतिः।<br>न भूमावुपरीस्थोऽसौ तेनोपरिचरो वसुः॥ ११<br><br>विख्यातः सर्वलोकेषु धर्मनित्यः स भूपतिः।<br>तस्य भार्या वरारोहा गिरिका नाम सुन्दरी॥ १२उस दिव्य विमानपर चढ़कर चेदिराज सर्वत्र विचरण करते थे। वे कभी भूमिपर न उतरने तथा पृथ्वीसे ऊपर-ही-ऊपर चलनेके कारण सभी लोकोंमें 'उपरिचर' वसुके नामसे प्रसिद्ध हुए। वे राजा अत्यन्त धर्मपरायण थे। उनकी धर्मपत्नीका नाम गिरिका था, जो रूपवती तथा सुन्दरी थी॥ ११-१२॥
पुत्राश्चास्य महावीर्याः पञ्चासन्नमितौजसः।<br>पृथग्देशेषु राजानः स्थापितास्तेन भूभुजा॥ १३महाराज उपरिचरके पाँच पुत्र हुए जो बड़े महान् वीर एवं परम प्रतापी थे। [यथासमय] उन्होंने अपने राजकुमारोंको अलग-अलग देशोंका राजा बना दिया॥ १३॥
वसोस्तु पत्नी गिरिका कामान् काले न्यवेदयत्।<br>ऋतुकालमनुप्राप्ता स्नाता पुंसवने शुचिः॥ १४<br><br>तदहः पितरश्चैनमूचुर्जहि मृगानिति।<br>तच्छ्रुत्वा चिन्तयामास भार्यामृतुमतीं तथा॥ १५<br><br>पितृवाक्यं गुरुं मत्वा कर्तव्यमिति निश्चितम्।<br>चचार मृगयां राजा गिरिकां मनसा स्मरन्॥ १६एक बार राजा वसुकी पत्नी गिरिकाने ऋतुकालके स्नानसे पवित्र होकर राजासे पुत्रप्राप्तिकी कामना की। जिस समय वह प्रार्थना करने लगी, उसी समय उनके पितरोंने उन राजासे कहा— हे राजन्! मृगोंको मार लाओ—इस आदेशको सुनकर राजाको अपनी ऋतुमती पत्नीका भी स्मरण हो आया, किंतु पितरोंकी आज्ञा श्रेष्ठ मानकर तथा अपने कर्तव्यका निश्चयकर राजा मन-ही-मन गिरिकाका स्मरण करते हुए आखेटके लिये चल पड़े॥ १४-१६॥
वने स्थितः स राजर्षिश्चिन्तते सस्मार भामिनीम्।<br>अतीव रूपसम्पन्नां साक्षाच्छ्रियमिवापराम्॥ १७<br><br>तस्य रेतः प्रचस्कन्द स्मरतस्तां च कामिनीम्।<br>वटपत्रे तु तद्राजा स्कन्नमात्रं समाक्षिपत्॥ १८वनमें रहते हुए राजा वसु साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान रूपवती अपनी पत्नीका स्मरण करने लगे। इस प्रकार उस कामिनीके ध्यानसे एकाएक उनका वीर्य स्खलित हो गया और राजाने शीघ्र ही उस स्खलित वीर्यको बरगदके पत्तेपर रख लिया॥ १७-१८॥
इदं वृथा परिस्कन्नं रेतो वै न भवेत्कथम्।<br>ऋतुकालं च विज्ञाय मतिं चक्रे नृपस्तदा॥ १९<br><br>अमोघं सर्वथा वीर्यं मम चैतन्न संशयः।<br>प्रियायै प्रेषयाम्येतदिति बुद्धिमकल्पयत्॥ २०यह स्खलित तेज व्यर्थ न हो—[यह सोचकर] तथा स्त्रीका ऋतुकाल जानकर उन्होंने ऐसा निश्चय कर लिया कि मेरा तेज सर्वथा अमोघ है, इसमें सन्देह नहीं है अतः अवश्य ही इसे मैं रानीके पास भेज दूँ॥ १९-२०॥
शुक्रप्रस्थापने कालं महिष्याः प्रसमीक्ष्य सः।<br>अभिमन्त्र्याथ तद्वीर्यं वटपर्णपुटे कृतम्॥ २१राजा जब उस वीर्यको बरगदके दोनेमें रखकर अपनी रानीके पास भेजने लगे तब उन्होंने रानीका ऋतुकाल जानकर उस वीर्यको अभिमन्त्रित किया।