देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० ३ ] द्वितीय स्कन्ध १८५
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| एतच्च कथितं सर्वं कारणं मुनिसत्तमाः ॥ ४६<br><br>सत्यवत्याः सुतस्यापि समुत्पत्तिस्तथा शुभा।<br>संशयोऽत्र न कर्तव्यः सम्भवे मुनिसत्तमाः ॥ ४७<br><br>महतां चरिते चैव गुणा ग्राह्या मुनेरिति।<br>कारणाच्च समुत्पत्तिः सत्यवत्या झषोदरे ॥ ४८<br><br>पराशरेण संयोगः पुनः शन्तनुना तथा।<br>अन्यथा तु मुनेश्चित्तं कथं कामाकुलं भवेत् ॥ ४९<br><br>अनार्यजुष्टं धर्मज्ञः कृतवान्स कथं मुनिः।<br>सकारणेयमुत्पत्तिः कथिताश्चर्यकारिणी ॥ ५०<br><br>श्रुत्वा पापाच्च निर्मुक्तो नरो भवति सर्वथा।<br>य एतच्छुभमाख्यानं शृणोति श्रुतिमान्नरः ॥ ५१<br>न दुर्गतिमवाप्नोति सुखी भवति सर्वदा ॥ ५२ | हे श्रेष्ठ मुनियो! मैंने यह सब उत्पत्तिका कारण आपलोगोंसे बता दिया, साथ ही सत्यवतीके पुत्र व्यासजीकी पवित्र उत्पत्तिका वर्णन कर दिया है। हे श्रेष्ठ मुनिगण! व्यासजीकी इस उत्पत्तिके विषयमें आपलोगोंको सन्देह नहीं करना चाहिये। महापुरुषोंके चरितसे केवल गुण ही ग्रहण करना चाहिये। किसी विशेष कारणसे ही मुनि व्यासका तथा मछलीके उदरसे सत्यवतीका जन्म, पराशरमुनिके साथ उनका संयोग और फिर राजा शन्तनुके साथ उनका विवाह हुआ। अन्यथा मुनि पराशरका चित्त कामासक्त ही क्यों होता ? और धर्मके ज्ञाता वे महामुनि पराशर अनार्य लोगोंद्वारा आचरित किया जानेवाला ऐसा कृत्य क्यों करते ! किसी विशेष कारणसे युक्त तथा आश्चर्यकारिणी यह उत्पत्ति मैंने बता दी, जिसे सुनकर मनुष्य निश्चितरूपसे पापसे मुक्त हो जाता है। जो श्रुतिपरायण मनुष्य इस शुभ आख्यानको सुनता है; वह दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है तथा सर्वदा सुखी रहता है॥ ४६—५२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे
व्यासजन्मवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
राजा शन्तनु, गंगा और भीष्मके पूर्वजन्मकी कथा
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
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| उत्पत्तिस्तु त्वया प्रोक्ता व्यासस्यामिततेजसः।<br>सत्यवत्यास्तथा सूत विस्तरेण त्वयानघ ॥ १<br><br>तथाप्येकस्तु सन्देहश्चित्तेऽस्माकं तु संस्थितः।<br>न निवर्तति धर्मज्ञ कथितेन त्वयानघ ॥ २ | हे सूतजी! हे अनघ! यद्यपि आपने परम तेजस्वी व्यास तथा सत्यवतीके जन्मकी कथा विस्तारपूर्वक कही तथापि हमलोगोंके चित्तमें एक बड़ी भारी शंका बनी हुई है। हे धर्मज्ञ! हे अनघ! वह शंका आपके कहनेपर भी दूर नहीं हो रही है ॥ १-२॥ |
| माता व्यासस्य या प्रोक्ता नाम्ना सत्यवती शुभा।<br>सा कथं नृपतिं प्राप्ता शन्तनुं धर्मवित्तमम् ॥ ३<br><br>निषादपुत्रीं स कथं वृतवान्नृपतिः स्वयम्।<br>धर्मिष्ठः पौरवो राजा कुलहीनामसंवृताम् ॥ ४ | व्यासजीकी कल्याणमयी माता जो सत्यवती नामसे जानी जाती थीं, वे धर्मात्मा राजा शन्तनुको कैसे प्राप्त हुईं? कुल तथा आचरणसे हीन उस निषादकन्याका पुरुकुलमें उत्पन्न उन धर्मात्मा राजाने स्वयं कैसे वरण कर लिया? ॥ ३-४॥ |
| शन्तनोः प्रथमा पत्नी का ह्यभूत्कथयाधुना।<br>भीष्मः पुत्रोऽथ मेधावी वसोरांशः कथं पुनः ॥ ५ | आप कृपा करके हमलोगोंको यह भी बतलाइये कि राजा शन्तनुकी पहली पत्नी कौन थी? वसुके अंशसे उत्पन्न मेधावी भीष्म उनके पुत्र कैसे हुए? ॥ ५॥ |