भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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१८६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वया प्रोक्तं पुरा सूत राजा चित्राङ्गदः कृतः।<br>सत्यवत्याः सुतो वीरो भीष्मेणामिततेजसा॥ ६<br>चित्राङ्गदे हते वीरे कृतस्तदनुजस्तथा।<br>विचित्रवीर्यनामासौ सत्यवत्याः सुतो नृपः॥ ७हे सूतजी! आप यह पहले ही कह चुके हैं कि सत्यवतीके वीर पुत्र चित्रांगदको अमित तेजवाले भीष्मने राजा बनाया था और वीर चित्रांगदके मारे जानेपर उसके अनुज तथा सत्यवतीके पुत्र विचित्रवीर्यको उन्होंने राजा बनाया॥ ६-७॥
ज्येष्ठे भीष्मे स्थिते पूर्वं धर्मिष्ठे रूपवत्यपि।<br>कृतवान्स कथं राज्यं स्थापितस्तेन जानता॥ ८रूपसम्पन्न तथा ज्येष्ठ पुत्र धर्मात्मा भीष्मके रहते हुए विचित्रवीर्यने राज्य कैसे किया और सब कुछ जानते हुए भी भीष्मने उन्हें राज्यपर कैसे स्थापित किया ?॥ ८॥
मृते विचित्रवीर्ये तु सत्यवत्यतिदुःखिता।<br>वध्वभ्यां गोलकौ पुत्रौ जनयामास सा कथम्॥ ९विचित्रवीर्यके मरनेपर अत्यन्त दुःखित माता सत्यवतीने अपनी दोनों पुत्रवधुओंसे दो गोलक पुत्र कैसे उत्पन्न कराये ?॥ ९॥
कथं राज्यं न भीष्माय ददौ सा वरवर्णिनी।<br>न कृतस्तु कथं तेन वीरेण दारसंग्रहः॥ १०उन सुन्दरी सत्यवतीने उस समय ज्येष्ठ पुत्र भीष्मको राजा क्यों नहीं बनाया और उन पराक्रमी भीष्मने अपना विवाह क्यों नहीं किया ?॥ १०॥
अधर्मस्तु कृतः कस्माद्व्यासेनामिततेजसा।<br>ज्येष्ठेन भ्रातृभार्यायां पुत्रावुत्पादिताविति॥ ११अमित तेजस्वी बड़े भाई व्यासजीने ऐसा अधर्म क्यों किया जो कि उन्होंने नियोगद्वारा दो पुत्र उत्पन्न किये ?॥ ११॥
पुराणकर्ता धर्मात्मा स कथं कृतवान्मुनिः।<br>सेवनं परदाराणां भ्रातुश्चैव विशेषतः॥ १२<br>जुगुप्सितमिदं कर्म स कथं कृतवान्मुनिः।<br>शिष्टाचारः कथं सूत वेदानुमितिकारकः॥ १३पुराणोंके रचयिता व्यासमुनिने धर्मज्ञ होते हुए भी ऐसा कार्य क्यों किया; हे सूतजी! क्या यही वेदोंसे अनुमोदित शिष्टाचार है ?॥ १२-१३॥
व्यासशिष्योऽसि मेधाविन् सन्देहं छेत्तुमर्हसि।<br>श्रोतुकामा वयं सर्वे धर्मक्षेत्रे कृतक्षणाः॥ १४हे मेधाविन्! आप व्यासजीके शिष्य हैं, इसलिये आप हमारी इन सभी शंकाओंका समाधान करनेमें समर्थ हैं। हम सभी इस धर्मक्षेत्रमें इन प्रश्नोंके उत्तर सुननेको उत्सुक हो रहे हैं॥ १४॥
सूत उवाच<br>इक्ष्वाकुवंशप्रभवो महाभिष इति स्मृतः।<br>सत्यवाग्धर्मशीलश्च चक्रवर्ती नृपोत्तमः॥ १५सूतजी बोले— [हे मुनियो!] इक्ष्वाकुकुलमें महाभिष नामके एक सत्यवादी, धर्मात्मा और चक्रवर्ती राजा उत्पन्न हुए—ऐसा कहा जाता है॥ १५॥
अश्वमेधसहस्रेण वाजपेयशतेन च।<br>तोषयामास देवेन्द्रं स्वर्गं प्राप महामतिः॥ १६उन बुद्धिमान् राजाने हजारों अश्वमेध तथा सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करके इन्द्रको सन्तुष्ट किया और स्वर्ग प्राप्त किया था॥ १६॥
एकदा ब्रह्मसदनं गतो राजा महाभिषः।<br>सुराः सर्वे समाजग्मुः सेवनार्थं प्रजापतिम्॥ १७<br>गङ्गा महानदी तत्र संस्थिता सेवितुं विभुम्।<br>तस्या वासः समुद्भूतं मारुतेन तरस्विना॥ १८<br>अधोमुखाः सुराः सर्वे न विलोक्यैव तां स्थिताः।<br>राजा महाभिषस्तां तु निःशङ्कः समपश्यत॥ १९एक बार राजा महाभिष ब्रह्मलोक गये। वहाँ प्रजापतिकी सेवाके लिये सभी देवता आये हुए थे। उस समय देवनदी गंगाजी भी ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थीं। उस समय तीव्रगामी पवनने उनका वस्त्र उड़ा दिया। सभी देवता अपना सिर नीचा किये उन्हें बिना देखे खड़े रहे, किंतु राजा महाभिष निःशंक भावसे उनकी ओर देखते रह गये॥ १७-१९॥