देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 196, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 196
अ० ३ ] द्वितीय स्कन्ध १८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सापि तं प्रेमसंयुक्तं नृपं ज्ञातवती नदी।<br>दृष्ट्वा तौ प्रेमसंयुक्तौ निर्लज्जौ काममोहितौ ॥ २०<br>ब्रह्मा चुकोप तौ तूर्णं शशाप च रुषान्वितः।<br>मर्त्यलोकेषु भूपाल जन्म प्राप्य पुनर्दिवम् ॥ २१<br>पुण्येन महताविष्टस्त्वमवाप्स्यसि सर्वथा।<br>गङ्गां तथोक्तवान्ब्रह्मा वीक्ष्य प्रेमवतीं नृपे ॥ २२ | उन गंगानदीने भी राजाको अपनेपर प्रेमासक्त जाना। उन दोनोंको इस प्रकार मुग्ध देखकर ब्रह्माजी क्रोधित हो गये और कोपाविष्ट होकर शीघ्र ही उन दोनोंको शाप दे दिया—हे राजन्! मनुष्यलोकमें तुम्हारा जन्म होगा। वहाँ जब तुम अधिक पुण्य एकत्र कर लोगे, तब पुनः स्वर्गलोकमें आओगे। गंगाको महाभिष-राजापर प्रेमासक्त जानकर ब्रह्माजीने उन्हें [गंगाको] भी उसी प्रकार शाप दे दिया॥ २०—२२॥ |
| विमनस्कौ तु तौ तूर्णं निःसृतौ ब्रह्मणोऽन्तिकात्।<br>स नृपांश्चिन्तयित्वाथ भूलोके धर्मतत्परान् ॥ २३<br>प्रतीपं चिन्तयामास पितरं पुरुवंशजम्।<br>एतस्मिन्समये चाष्टौ वसवः स्त्रीसमन्विताः ॥ २४<br>वसिष्ठस्याश्रमं प्राप्ता रममाणा यदृच्छया।<br>पृथ्वादीनां वसूनां च मध्ये कोऽपि वसूत्तमः ॥ २५<br>द्यौर्नामा तस्य भार्याथ नन्दिनीं गां ददर्श ह।<br>दृष्ट्वा पतिं सा पप्रच्छ कस्येयं धेनुरुत्तमा ॥ २६ | इस प्रकार वे दोनों दुःखी मनसे ब्रह्माजीके पाससे शीघ्र ही चले गये। राजा अपने मनमें सोचने लगे कि इस मृत्युलोकमें कौन ऐसे राजा हैं, जो धर्मपरायण हैं। ऐसा विचारकर उन्होंने पुरुवंशीय महाराज 'प्रतीप' को ही पिता बनानेका निश्चय कर लिया। इसी बीच आठों वसु अपनी-अपनी स्त्रीके साथ विहार करते हुए स्वेच्छाया महर्षि वसिष्ठके आश्रमपर आ पहुँचे। उन पृथु आदि वसुओंमें 'द्यौ' नामक एक श्रेष्ठ वसु थे। उनकी पत्नीने 'नन्दिनी' गौको देखकर अपने पतिसे पूछा कि यह सुन्दर गाय किसकी है?॥ २३—२६॥ |
| द्यौस्तामाह वसिष्ठस्य गौरियं शृणु सुन्दरि।<br>दुग्धमस्याः पिबेद्यस्तु नारी वा पुरुषोऽथ वा ॥ २७<br>अयुतायुर्भवेन्नूनं सदैवागतयौवनः।<br>तच्छ्रुत्वा सुन्दरी प्राह मृत्युलोकेऽस्ति मे सखी ॥ २८<br>उशीनरस्य राजर्षेः पुत्री परमशोभना।<br>तस्या हेतोर्महाभाग सवत्सां गां पयस्विनीम् ॥ २९<br>आनयस्वाश्रमं श्रेष्ठं नन्दिनीं कामदां शुभाम्।<br>यावदस्याः पयः पीत्वा सखी मम सदैव हि ॥ ३०<br>मानुषेषु भवेदेका जरारोगविवर्जिता।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या द्यौर्जहार च नन्दिनीम् ॥ ३१<br>अवमन्य मुनिं दान्तं पृथ्वाद्यैः सहितोऽनघः। | द्यौने उससे कहा—हे सुन्दरि! सुनो, यह महर्षि वसिष्ठजीकी गाय है। इस गायका दूध स्त्री या पुरुष जो कोई भी पीता है, उसकी आयु दस हजार वर्षकी हो जाती है और उसका यौवन सर्वदा बना रहता है। यह सुनकर उस सुन्दरी स्त्रीने कहा—मृत्युलोकमें मेरी एक सखी है। मेरी वह सखी राजर्षि उशीनरकी परम सुन्दरी कन्या है। हे महाभाग! उसके लिये अत्यन्त सुन्दर तथा सब प्रकारकी कामनाओंको देनेवाली इस गायको बछड़े-सहित अपने आश्रममें ले चलिये। जब मेरी सखी इसका दूध पीयेगी तब वह निर्जरा एवं रोगरहित होकर मनुष्योंमें एकमात्र अद्वितीय बन जायगी। उसका वचन सुनकर द्यौ नामके वसुने 'पृथु' आदि अष्टवसुओंके साथ जितेन्द्रिय मुनिका अपमान करके नन्दिनीका अपहरण कर लिया॥ २७—३१ १/२॥ |
| हृतायामथ नन्दिन्यां वसिष्ठस्तु महातपाः ॥ ३२<br>आजगामाश्रमपदं फलान्यादाय सत्वरः।<br>नापश्यत यदा धेनुं सवत्सां स्वाश्रमे मुनिः ॥ ३३ | नन्दिनीका हरण हो जानेपर महातपस्वी वसिष्ठ फल लेकर शीघ्र ही अपने आश्रम आ गये। जब मुनिने अपने आश्रममें बछड़ेसहित नन्दिनीगायको नहीं देखा तब वे तेजस्वी वनों एवं गुफाओंमें उसे ढूँढ़ने |