देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 197, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ | | :--- | :--- |
| मृगयामास तेजस्वी गहरेषु वनेष्वपि।<br>नासादिता यदा धेनुश्चुकोपातिशयं मुनिः॥ ३४<br><br>वारुणिश्चापि विज्ञाय ध्यानेन वसुभिर्हृताम्।<br>वसुभिर्मे हृता धेनुर्यस्मान्मामवमन्य वै॥ ३५<br><br>तस्मात्सर्वे जनिष्यन्ति मानुषेषु न संशयः।<br>एवं शशाप धर्मात्मा वसूंस्तान्वारुणिः स्वयम्॥ ३६<br><br>श्रुत्वा विमनसः सर्वे प्रययुर्दुःखिताश्च ते।<br>शप्ताः स्म इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमुः॥ ३७<br><br>प्रसादयन्तस्तमृषिं वसवः शरणं गताः।<br>मुनिस्तानाह धर्मात्मा वसून्दीनान्पुरःस्थितान्॥ ३८<br><br>अनुसंवत्सरं सर्वे शापमोक्षमवाप्स्यथ।<br>येनेयं विहृता धेनुर्नन्दिनी मम वत्सला॥ ३९<br><br>तस्माद् द्यौर्मानुषे देहे दीर्घकालं वसिष्यति।<br>ते शप्ताः पथि गच्छन्तीं गङ्गां दृष्ट्वा सरिद्वराम्॥ ४०<br><br>ऊचुस्तां प्रणताः सर्वे शप्तां चिन्तातुरां नदीम्।<br>भविष्यामो वयं देवि कथं देवाः सुधाशनाः॥ ४१<br><br>मानुषाणां च जठरे चिन्तेयं महती हि नः।<br>तस्मात्त्वं मानुषी भूत्वा जनयास्मान्सरिद्वरे॥ ४२<br><br>शन्तनुर्नाम राजर्षिस्तस्य भार्या भवानघे।<br>जाताञ्जाताञ्जले चास्मान्निःक्षिपस्व सुरापगे॥ ४३<br><br>एवं शापविनिर्मोक्षो भविता नात्र संशयः।<br>तथेत्युक्ताश्च ते सर्वे जग्मुर्लोकं स्वकं पुनः॥ ४४<br><br>गङ्गापि निर्गता देवी चिन्त्यमाना पुनः पुनः।<br>महाभिषो नृपो जातः प्रतीपस्य सुतस्तदा॥ ४५<br><br>शन्तनुर्नाम राजर्षिर्धर्मात्मा सत्यसङ्गरः।<br>प्रतीपस्तु स्तुतिं चक्रे सूर्यस्यामिततेजसः॥ ४६<br><br>तदा च सलिलात्तस्मान्निःसृता वरवर्णिनी।<br>दक्षिणं शालसंकाशमूरूं भेजे शुभानना॥ ४७ | लगे, जब वह गाय नहीं मिली तब वरुणपुत्र मुनि वसिष्ठजी ध्यानयोगसे उसे वसुओंके द्वारा हरी गयी जानकर अत्यन्त कुपित हुए। वसुओंने मेरी अवमानना करके मेरी गौ चुरा ली है। वे सभी मानवयोनिमें जन्म ग्रहण करेंगे, इसमें सन्देह नहीं है। इस प्रकार धर्मात्मा वसिष्ठजीने उन वसुओंको शाप दिया॥ ३२—३६॥<br><br>यह सुनकर वे सभी वसु खिन्नमनस्क और दुःखित हो गये और वहाँसे चल दिये। हमें शाप दे दिया गया है—यह जानकर वे ऋषि वसिष्ठके पास पहुँचे और उन्हें प्रसन्न करते हुए वे सभी वसु उनके शरणागत हो गये। तब धर्मात्मा मुनि वसिष्ठजीने उन सामने खड़े वसुओंको देखकर कहा—तुमलोगोंमेंसे [सात वसु] एक-एक वर्षके अन्तरालसे ही शापसे मुक्त हो जायँगे; परंतु जिसने मेरी प्रिय वत्सला नन्दिनीका अपहरण किया है, वह 'द्यौ' नामक वसु मनुष्य-शरीरमें ही बहुत दिनोंतक रहेगा॥ ३७—३९ ½॥<br><br>उन अभिशप्त वसुओंने मार्गमें जाती हुई नदियोंमें उत्तम गङ्गाजीको देखकर उन अभिशस्त तथा चिन्तातुर गङ्गाजीसे प्रणामपूर्वक कहा—हे देवि! अमृत पीनेवाले हम देवता मानवकुक्षिसे कैसे उत्पन्न होंगे, यह हमें महान् चिन्ता है, अतः हे नदियोंमें श्रेष्ठ! आप ही मानुषी बनकर हमलोगोंको जन्म दें। पृथ्वीपर शन्तनु नामक एक राजर्षि हैं, हे अनघे! आप उन्हींकी भार्या बन जायँ और हे सुरापगे! हमें क्रमशः जन्म लेनेपर आप जलमें छोड़ती जायँ। आपके ऐसा करनेसे हमलोग भी शापसे मुक्त हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं है। गङ्गाजीने जब उनसे 'तथास्तु' कह दिया तब वे सब वसु अपने-अपने लोकको चले गये और गङ्गाजी भी बार-बार विचार करती हुई वहाँसे चली गयीं॥ ४०—४४ ½॥<br><br>उस समय राजा महाभिषने राजा प्रतीपके पुत्रके रूपमें जन्म लिया। उन्हींका नाम शन्तनु पड़ा, जो सत्यप्रतिज्ञ एवं धर्मात्मा राजर्षि हुए। महाराज प्रतीपने परम तेजस्वी भगवान् सूर्यकी आराधना की। उस समय जलमेंसे एक परम सुन्दर स्त्री निकल पड़ी और वह सुमुखी आकर तुरंत ही महाराजके शाल वृक्षके समान विशाल दाहिने जंघेपर विराजमान हो गयी। |