देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 198, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 198
| अ० ३ ] | द्वितीय स्कन्ध | १८९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अङ्के स्थितां स्त्रियं चाह मा पृष्ट्वा किं वरानने।<br>ममोरावास्थितासि त्वं किमर्थं दक्षिणे शुभे॥ ४८ | अंकमें बैठी हुई उस स्त्रीसे राजाने पूछा—'हे वरानने ! तुम मुझसे बिना पूछे ही मेरे शुभ दाहिने जंघेपर क्यों बैठ गयी?'॥ ४७-४८॥ |
| सा तमाह वरारोहा यदर्थं राजसत्तम।<br>स्थितास्म्यङ्के कुरुश्रेष्ठ कामयानां भजस्व माम्॥ ४९ | उस सुन्दरीने उनसे कहा—'हे नृपश्रेष्ठ ! हे कुरुश्रेष्ठ ! मैं जिस कामनासे आपके अंकमें बैठी हूँ, उस कामनावाली मुझे आप स्वीकार करें'॥ ४९॥ |
| तामवोचत्तथो राजा रूपयौवनशालिनीम्।<br>नाहं परस्त्रियं कामाद् गच्छेयं वरवर्णिनीम्॥ ५० | उस रूपयौवनसम्पन्ना सुन्दरीसे राजाने कहा—'मैं किसी सुन्दरी परस्त्रीको कामकी इच्छासे नहीं स्वीकार करता'॥ ५०॥ |
| स्थिता दक्षिणमूरुं मे त्वमाश्लिष्य च भामिनि।<br>अपत्यानां स्नुषाणां च स्थानं विद्धि शुचिस्मिते॥ ५१<br><br>स्नुषा मे भव कल्याणि जाते पुत्रेऽतिवाञ्छिते।<br>भविष्यति च मे पुत्रस्तव पुण्यान्न संशयः॥ ५२ | हे भामिनि ! हे शुचिस्मिते ! तुम मेरे दाहिने जंघेपर प्रेमपूर्वक आकर बैठ गयी हो, उसे तुम पुत्रों तथा पुत्रवधुओंका स्थान समझो। अतः हे कल्याणि ! मेरे मनोवांछित पुत्रके उत्पन्न होनेपर तुम मेरी पुत्रवधू हो जाओ। तुम्हारे पुण्यसे मुझे पुत्र हो जायगा, इसमें संशय नहीं है॥ ५१-५२॥ |
| तथेत्युक्त्वा गता सा वै कामिनी दिव्यदर्शना।<br>राजा चापि गृहं प्राप्तश्चिन्तयंस्तां स्त्रियं पुनः॥ ५३ | वह दिव्य दर्शनवाली कामिनी 'तथास्तु' कहकर चली गयी और उस स्त्रीके विषयमें सोचते हुए राजा प्रतीप भी अपने घर चले गये॥ ५३॥ |
| ततः कालेन कियता जाते पुत्रे वयस्विनि।<br>वनं जिगमिषू राजा पुत्रं वृत्तान्तमूचिवान्॥ ५४ | समय बीतनेपर पुत्रके युवा होनेपर वन जानेकी इच्छावाले राजाने अपने पुत्रको वह समस्त पूर्व वृत्तान्त कह सुनाया॥ ५४॥ |
| वृत्तान्तं कथयित्वा तु पुनरूचे निजं सुतम्।<br>यदि प्रयाति सा बाला त्वां वने चारुहासिनी॥ ५५<br><br>कामयाना वरारोहा तां भजेथा मनोरमाम्।<br>न प्रष्टव्या त्वया कासि मन्नियोगान्नराधिप॥ ५६<br><br>धर्मपत्नीं च तां कृत्वा भविता त्वं सुखी किल। | सारी बात बताकर राजाने अपने पुत्रसे कहा—'यदि वह सुन्दरी बाला तुम्हें कभी वनमें मिले और अपनी अभिलाषा प्रकट करे तो उस मनोरमाको स्वीकार कर लेना तथा उससे मत पूछना कि तुम कौन हो? यह मेरी आज्ञा है, उसे अपनी धर्मपत्नी बनाकर तुम सुखी रहोगे'॥ ५५-५६ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>एवं सन्दिश्य तं पुत्रं भूपतिः प्रीतमानसः॥ ५७<br><br>दत्त्वा राज्यश्रियं सर्वां वनं राजा विवेश ह।<br>तत्रापि च तपस्तप्त्वा समाराध्य पराम्बिकाम्॥ ५८<br><br>जगाम स्वर्गं राजासौ देहं त्यक्त्वा स्वतेजसा।<br>राज्यं प्राप महातेजाः शान्तनुः सार्वभौमिकम्॥ ५९<br><br>प्रजां वै पालयामास धर्मदण्डो महीपतिः॥ ६० | सूतजी बोले—इस प्रकार अपने पुत्रको आदेश देकर महाराज प्रतीप प्रसन्नताके साथ उन्हें सारा राज्य-वैभव सौंपकर वनको चले गये। वहाँ जाकर वे तप करके तथा आदिशक्ति भगवती जगदम्बिकाकी आराधना करके अपने तेजसे शरीर छोड़कर स्वर्ग चले गये। महातेजस्वी राजा शान्तनुने सार्वभौम राज्य प्राप्त किया और वे धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करने लगे॥ ५७-६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे
प्रतीपसकाशाच्छन्तनुजन्मवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
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