देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 199, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 199
| १९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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अथ चतुर्थोऽध्यायः
गंगाजीद्वारा राजा शन्तनुका पतिरूपमें वरण, सात पुत्रोंका जन्म तथा गंगाका उन्हें अपने जलमें प्रवाहित करना, आठवें पुत्रके रूपमें भीष्मका जन्म तथा उनकी शिक्षा-दीक्षा
| संस्कृत | हिन्दी |
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| सूत उवाच<br>प्रतीपेऽथ दिवं याते शन्तनुः सत्यविक्रमः।<br>बभूव मृगयाशीलो निघ्नन्व्याघ्रान्मृगान्नृपः॥ १ | सूतजी बोले—प्रतीपके स्वर्ग चले जानेपर सत्यपराक्रमी राजा शन्तनु व्याघ्र तथा मृगोंको मारते हुए मृगयामें तत्पर हो गये॥ १॥ |
| स कदाचिद्वने घोरे गङ्गातीरे चरन्नृपः।<br>ददर्श मृगशावाक्षीं सुन्दरीं चारुभूषणाम्॥ २ | किसी समय गंगाके किनारे घने वनमें विचरण करते हुए राजाने मृगके बच्चे-जैसी आँखोंवाली तथा सुन्दर आभूषणोंसे युक्त एक सुन्दर स्त्रीको देखा॥ २॥ |
| दृष्ट्वा तां नृपतिर्मग्नः पित्रोक्तेयं वरानना।<br>रूपयौवनसम्पन्ना साक्षाल्लक्ष्मीरिवापरा॥ ३ | उसे देखकर राजा शन्तनु हर्षित हो गये और सोचने लगे कि साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान रूप-यौवनसे सम्पन्न यह स्त्री वही है, जिसके विषयमें पिताजीने मुझे बताया था॥ ३॥ |
| पिबन्मुखाम्बुजं तस्या न तृप्तिमगमन्नृपः।<br>हृष्टरोमाभवत्तत्र व्याप्तचित्त इवानघः॥ ४ | उसके मुखकमलका पान करते हुए राजा तृप्त नहीं हुए। हर्षातिरेकसे उन निष्पाप राजाको रोमांच हो गया और उनका चित्त उस स्त्रीमें रम गया॥ ४॥ |
| महाभिषं सापि मत्वा प्रेमयुक्ता बभूव ह।<br>किञ्चिन्मन्दस्मितं कृत्वा तस्थावग्रे नृपस्य च॥ ५<br><br>वीक्ष्य तामसितापाङ्गीं राजा प्रीतमना भृशम्।<br>उवाच मधुरं वाक्यं सान्त्वयन् श्लक्ष्णया गिरा॥ ६ | वह स्त्री भी उन्हें राजा महाभिष जानकर प्रेमासक्त हो गयी। वह मन्द-मन्द मुसकराती हुई राजाके सामने खड़ी हो गयी। उस सुन्दरीको देखकर राजा अत्यन्त प्रेमविवश हो गये तथा कोमल वाणीसे उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वचन कहने लगे॥ ५-६॥ |
| देवी वा त्वं च वामोरु मानुषी वा वरानने।<br>गन्धर्वी वाथ यक्षी वा नागकन्याप्सरापि वा॥ ७<br><br>यासि कासि वरारोहे भार्या मे भव सुन्दरि।<br>प्रेमयुक्तस्मितैव त्वं धर्मपत्नी भवाद्य मे॥ ८ | हे वामोरु! हे सुमुखि! तुम कोई देवी, मानुषी, गन्धर्वी, यक्षी, नागकन्या अथवा अप्सरा तो नहीं हो। हे वरारोहे! तुम जो कोई भी हो, मेरी भार्या बन जाओ। हे सुन्दरि! तुम प्रेमपूर्वक मुसकरा रही हो; अब मेरी धर्मपत्नी बन जाओ॥ ७-८॥ |
| सूत उवाच<br>राजा तां नाभिजानाति गङ्गेयमिति निश्चितम्।<br>महाभिषं समुत्पन्नं नृपं जानाति जाह्नवी॥ ९<br><br>पूर्वप्रेमसमायोगाच्छ्रुत्वा वाचं नृपस्य ताम्।<br>उवाच नारी राजानं स्मितपूर्वमिदं वचः॥ १० | सूतजी बोले—राजा शन्तनु तो निश्चितरूपसे नहीं जान सके कि ये वे ही गंगा हैं, किंतु गंगाने उन्हें पहचान लिया कि ये शन्तनुके रूपमें उत्पन्न वही राजा महाभिष हैं। पूर्वकालीन प्रेमवश राजा शन्तनुके उस वचनको सुनकर उस स्त्रीने मन्द मुसकान करके यह वचन कहा॥ ९-१०॥ |
| स्त्र्युवाच<br>जानामि त्वां नृपश्रेष्ठ प्रतीपतनयं शुभम्।<br>का न वाञ्छति चार्वङ्गी भावित्वात्सदृशं पतिम्॥ ११ | स्त्री बोली—हे नृपश्रेष्ठ! मैं यह जानती हूँ कि आप महाराज प्रतीपके योग्य पुत्र हैं। अतः भला कौन ऐसी स्त्री होगी, जो संयोगवश अपने अनुरूप पुरुषको पाकर भी उसे पतिरूपमें स्वीकार न करेगी॥ ११॥ |