देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 200, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 200
अ० ४] द्वितीय स्कन्ध १९१
| संस्कृत मूल (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
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| वाग्बन्धेन नृपश्रेष्ठ वरिष्यामि पतिं किल।<br>शृणु मे समयं राजन् वृणोमि त्वां नृपोत्तम॥ १२ | हे नृपश्रेष्ठ! वचनबद्ध करके ही मैं आपको अपना पति स्वीकार करूँगी। हे राजन्! हे नृपोत्तम! अब आप मेरी शर्त सुनिये, जिससे मैं आपका वरण कर सकूँ॥ १२॥ |
| यच्च कुर्यामहं कार्यं शुभं वा यदि वाशुभम्।<br>न निषेध्या त्वया राजन्न वक्तव्यं तथाप्रियम्॥ १३<br><br>यदा च त्वं नृपश्रेष्ठ न करिष्यसि मे वचः।<br>तदा मुक्त्वा गमिष्यामि यथेष्टदेशं मारिष॥ १४ | हे राजन्! मैं भला-बुरा जो भी कार्य करूँ, आप मुझे मना नहीं करेंगे तथा न कोई अप्रिय बात ही कहेंगे। जिस समय आप मेरा यह वचन नहीं मानेंगे, उसी समय हे मान्य नृपश्रेष्ठ! मैं आपको त्यागकर जहाँ चाहूँगी, उस जगह चली जाऊँगी॥ १३-१४॥ |
| स्मृत्वा जन्म वसूनां सा प्रार्थनापूर्वकं हृदि।<br>महाभिषस्य प्रेमाथ विचिन्त्यैव च जाह्नवी॥ १५<br><br>तथेत्युक्ताथ सा देवी चकार नृपतिं पतिम्।<br>एवं वृता नृपेणाथ गङ्गा मानुषरूपिणी॥ १६<br><br>नृपस्य मन्दिरं प्राप्ता सुभगा वरवर्णिनी।<br>नृपतिस्तां समासाद्य चिक्रीडोपवने शुभे॥ १७ | उस समय प्रार्थनापूर्वक वसुओंके जन्म ग्रहण करनेका स्मरण करके तथा महाभिषकके पूर्वकालीन प्रेमको अपने मनमें सोच करके गंगाजीने राजा शन्तनुके 'तथास्तु' कहनेपर उन्हें अपना पति बनाना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार मानवीरूप धारण करनेवाली रूपवती तथा सुन्दर वर्णवाली गंगा महाराज शन्तनुकी पत्नी बनकर राजभवनमें पहुँच गयीं। राजा शन्तनु उन्हें पाकर सुन्दर उपवनमें विहार करने लगे॥ १५-१७॥ |
| सापि तं रमयामास भावज्ञा वै वराङ्गना।<br>न बुबोध नृपः क्रीडनातान्वर्षगणानथ॥ १८<br><br>स तया मृगशावाक्ष्या शच्या शतक्रतुर्यथा।<br>सा सर्वगुणसम्पन्ना सोऽपि कामविचक्षणः॥ १९<br><br>रेमाते मन्दिरे दिव्ये रमानारायणाविव।<br>एवं गच्छति काले सा दधार नृपतेस्तदा॥ २० | भावोंको जाननेवाली वे सुन्दरी गंगा भी राजा शन्तनुके साथ विहार करने लगीं। उनके साथ महाराज शन्तनुको क्रीडा करते अनेक वर्ष बीत गये, पर उन्हें समय बीतनेका बोध ही न हुआ। वे उन मृगलोचनाके साथ उसी प्रकार विहार करते थे जिस प्रकार इन्द्राणीके साथ इन्द्र। सर्वगुणसम्पन्ना गंगा तथा चतुर शन्तनु भी दिव्य भवनमें लक्ष्मी तथा नारायणकी भाँति विहार करने लगे॥ १८-१९ ½॥ |
| गर्भं गङ्गा वसुं पुत्रं सुषुवे चारुलोचना।<br>जातमात्रं सुतं वारि चिक्षेपैवं द्वितीयके॥ २१<br><br>तृतीयेऽथ चतुर्थेऽथ पञ्चमे षष्ठ एव च।<br>सप्तमे वा हते पुत्रे राजा चिन्तापरोऽभवत्॥ २२ | इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर गंगाजीने महाराज शन्तनुसे गर्भ धारण किया और यथासमय उन सुनयनीने एक वसुको पुत्ररूपमें जन्म दिया। उन्होंने उस बालकको उत्पन्न होते ही तत्काल जलमें फेंक दिया। इस प्रकार दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठें तथा सातवें पुत्रके मारे जानेपर राजा शन्तनुको बड़ी चिन्ता हुई॥ २०-२२॥ |
| किं करोम्यद्य वंशो मे कथं स्यात्सुस्थिरो भुवि।<br>सप्त पुत्रा हता नूनमनया पापरूपया॥ २३ | [उन्होंने सोचा—] अब मैं क्या करूँ? मेरा वंश इस पृथ्वीपर सुस्थिर कैसे होगा? इस पापिनीने मेरे सात पुत्र मार डाले। यदि इसे रोकता हूँ तो |