देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 201, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 201
| १९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निवारयामि यदि मां त्यक्त्वा यास्यति सर्वथा।<br>अष्टमोऽयं सुसम्प्राप्तो गर्भो मे मनसीप्सितः॥ २४<br><br>न वारयामि चेदद्य सर्वथेयं जले क्षिपेत्।<br>भविता वा न वा चाग्रे संशयोऽयं ममाद्भुतः॥ २५<br><br>सम्भवेऽपि च दुष्टेयं रक्षेद्यद्वा न रक्षयेत्।<br>एवं संशयिते कार्ये किं कर्तव्यं मयाधुना॥ २६ | यह मुझे त्यागकर चली जायगी। मेरा अभिलषित आठवाँ गर्भ भी इसे प्राप्त हो गया है। यदि अब भी मैं इसे रोकता नहीं हूँ तो यह इसे भी जलमें फेंक देगी। यह भी मुझे महान् सन्देह है कि भविष्यमें कोई और सन्तति होगी अथवा नहीं। यदि उत्पन्न हो भी तो पता नहीं कि यह दुष्टा उसकी रक्षा करेगी अथवा नहीं? इस संशयकी स्थितिमें मैं अब क्या करूँ?॥ २३–२६॥ |
| वंशस्य रक्षणार्थं हि यत्नः कार्यः परो मया।<br>ततः काले यदा जातः पुत्रोऽयमष्टमो वसुः॥ २७<br><br>मुनेर्येन हृता धेनुर्नन्दिनी स्त्रीजितेन हि।<br>तं दृष्ट्वा नृपतिः पुत्रं तामुवाच पतन्पदे॥ २८ | वंशकी रक्षाके लिये मुझे कोई दूसरा यत्न करना ही होगा। तदनन्तर यथासमय जब वह आठवाँ 'द्यौ' नामक वसु पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ, जिसने अपनी स्त्रीके वशीभूत होकर वसिष्ठकी नन्दिनी गौका हरण कर लिया था, तब उस पुत्रको देखकर राजा शान्तनु गंगाजीके पैरोंपर गिरते हुए कहने लगे॥ २७-२८॥ |
| दासोऽस्मि तव तन्वङ्गि प्रार्थयामि शुचिस्मिते।<br>पुत्रमेकं पुषाम्येनं देहि जीवितमद्य मे॥ २९ | हे तन्वंगि! मैं तुम्हारा दास हूँ। हे शुचिस्मिते! मैं प्रार्थना करता हूँ। मैं इस पुत्रको पालना चाहता हूँ, अतः इसे जीवित ही मुझे दे दो॥ २९॥ |
| हिंसिताः सप्त पुत्रा मे करभोरु त्वया शुभाः।<br>अष्टमं रक्ष सुश्रोणि पतामि तव पादयोः॥ ३० | हे करभोरु! तुमने मेरे सात सुन्दर पुत्रोंको मार डाला, किंतु इस आठवें पुत्रकी रक्षा करो। हे सुश्रोणि! मैं तुम्हारे पैरोंपर पड़ता हूँ॥ ३०॥ |
| अन्यद्वै प्रार्थितं तेऽद्य ददाम्यथ च दुर्लभम्।<br>वंशो मे रक्षणीयोऽद्य त्वया परमशोभने॥ ३१ | हे परम रूपवती! इसके बदले तुम मुझसे जो माँगोगी, मैं वह दुर्लभ वस्तु भी तुम्हें दूँगा। अब तुम मेरे वंशकी रक्षा करो॥ ३१॥ |
| अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गे वेदविदो विदुः।<br>तस्मादद्य वरारोहे प्रार्थयाम्यष्टमं सुतम्॥ ३२ | वेदविद् विद्वानोंने कहा है कि पुत्रहीन मनुष्यकी स्वर्गमें भी गति नहीं होती। इसी कारण हे सुन्दरि! अब मैं इस आठवें पुत्रके लिये याचना करता हूँ॥ ३२॥ |
| इत्युक्तापि गृहीत्वा तं यदा गन्तुं समुत्सुका।<br>तदातिकुपतो राजा तामुवाचातिदुःखितः॥ ३३<br><br>पापिष्ठे किं करोम्यद्य निरयान्न बिभेषि किम्।<br>कासि पापकराणां त्वं पुत्री पापरता सदा॥ ३४<br><br>यथेच्छं गच्छ वा तिष्ठ पुत्रो मे स्थीयतामिह।<br>किं करोमि त्वया पापे वंशान्तकरयानया॥ ३५ | राजा शान्तनुके ऐसा कहनेपर भी जब गंगा उस पुत्रको लेकर जानेको उद्यत हुईं, तब उन्होंने अत्यन्त कुपित एवं दुःखित होकर उनसे कहा—'हे पापिनि! अब मैं क्या करूँ? क्या तुम नरकसे भी नहीं डरती? तुम कौन हो? लगता है कि तुम पापियोंकी पुत्री हो, तभी तो तुम सदा पापकर्ममें लगी रहती हो, अब तुम जहाँ चाहो वहाँ जाओ या रहो, किंतु यह पुत्र यहीं रहेगा। हे पापिनि! अपने वंशका अन्त करनेवाली ऐसी तुम्हें रखकर भी मैं क्या करूँगा?'॥ ३३–३५॥ |