देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 202, कुल 889 में से
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| अ० ४ ] | द्वितीय स्कन्ध | १९३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवं वदति भूपाले सा गृहीत्वा सुतं शिशुम्।<br>गच्छन्ती वचनं कोपसंयुता तमुवाच ह॥ ३६<br><br>पुत्रकामा सुतं त्वेनं पालयामि वने गता।<br>समयो मे गमिष्यामि वचनं ह्यन्यथाकृतम्॥ ३७<br><br>गङ्गां मां वै विजानीहि देवकार्यार्थमागताम्।<br>वसवस्तु पुरा शप्ता वसिष्ठेन महात्मना॥ ३८<br><br>व्रजन्तु मानुषीं योनिं स्थितां चिन्तातुरास्तु माम्।<br>दृष्ट्वेदं प्रार्थयामासुर्जननी नो भवानघे॥ ३९<br><br>तेभ्यो दत्त्वा वरं जाता पत्नी ते नृपसत्तम।<br>देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं जानीहि सम्भवो मम॥ ४० | राजाके ऐसा कहनेपर उस नवजात शिशुको लेकर जाती हुई गंगाने क्रोधपूर्वक उनसे कहा—पुत्रकी कामनावाली मैं भी इस पुत्रको वनमें ले जाकर पालूंगी। शर्तके अनुसार अब मैं चली जाऊँगी; क्योंकि आपने अपना वचन तोड़ा है। [हे राजन्!] मुझे आप गंगा जानिये; देवताओंका कार्य सम्पन्न करनेके लिये ही मैं यहाँ आयी थी। महात्मा वसिष्ठने प्राचीन कालमें आठों वसुओंको शाप दिया था कि तुम सब मनुष्ययोनिमें जाकर जन्म लो। तब चिन्तासे व्याकुल होकर आठों वसु मुझे वहाँ स्थित देखकर कहने लगे—हे अनघे! आप हमारी माता बनें। अतः हे नृपश्रेष्ठ! उन्हें वरदान देकर मैं आपकी पत्नी बन गयी। आप ऐसा समझ लीजिये कि देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये ही मेरा जन्म हुआ है॥ ३६—४०॥ |
| सप्त ते वसवः पुत्रा मुक्ताः शापाद्बृहैस्तु ते।<br>कियन्तं कालमेकोऽयं तव पुत्रो भविष्यति॥ ४१<br><br>गङ्गादत्तमिमं पुत्रं गृहाण शन्तनो स्वयम्।<br>वसुं देवं विदित्वैनं सुखं भुंक्ष्व सुतोद्भवम्॥ ४२<br><br>गाङ्गेयोऽयं महाभाग भविष्यति बलाधिकः।<br>अद्य तत्र नयाम्येनं यत्र त्वं वै मया वृतः॥ ४३ | वे सातों वसु तो आपके पुत्र बनकर ऋषिके शापसे विमुक्त हो गये। यह आठवाँ वसु कुछ समयतक आपके पुत्ररूपमें विद्यमान रहेगा। अतः हे महाराज शन्तनु! मुझ गंगाके द्वारा दिये हुए पुत्रको आप स्वीकार कीजिये। इसे आठवाँ वसु जानते हुए आप पुत्र-सुखका भोग करें; क्योंकि हे महाभाग! यह 'गांगेय' बड़ा ही बलवान् होगा। अब इसे मैं वहीं ले जा रहीं हूँ, जहाँ मैंने आपका पतिरूपसे वरण किया था॥ ४१—४३॥ |
| दास्यामि यौवनप्राप्तं पालयित्वा महीपते।<br>न मातुरहितः पुत्रो जीवेन्न च सुखी भवेत्॥ ४४ | हे राजन्! इसे पालकर इसके युवा होनेपर मैं पुनः आपको दे दूँगी; क्योंकि मातृहीन बालक न जी पाता है और न सुखी रहता है॥ ४४॥ |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे गङ्गा तं गृहीत्वा च बालकम्।<br>राजा चातीव दुःखार्तः संस्थितो निजमन्दिरे॥ ४५ | ऐसा कहकर उस बालकको लेकर गंगा वहीं अन्तर्धान हो गयीं। राजा भी अत्यन्त दुःखित होकर अपने राजभवनमें रहने लगे॥ ४५॥ |
| भार्याविरहजं दुःखं तथा पुत्रस्य चाद्भुतम्।<br>सर्वदा चिन्तयन्नास्ते राज्यं कुर्वन्महीपतिः॥ ४६ | महाराज शन्तनु स्त्री तथा पुत्रके वियोगजन्य महान् कष्टका सदा अनुभव करते हुए भी किसी प्रकार राज्यकार्य सँभालने लगे॥ ४६॥ |
| एवं गच्छति कालेऽथ नृपतिर्मृगयां गतः।<br>निघ्नन्मृगगणान्बाणैर्महिषान्सूकरानपि ॥ ४७<br><br>गङ्गातीरमनुप्राप्तः स राजा शन्तनुस्तदा।<br>नदीं स्तोकजलां दृष्ट्वा विस्मितः स महीपतिः॥ ४८ | कुछ समय बीतनेपर महाराज आखेटके लिये वनमें गये। वहाँ अनेक प्रकारके मृगगणों, भैंसों तथा सूकरोंको अपने बाणोंसे मारते हुए वे गंगाजीके तटपर जा पहुँचे। उस नदीमें बहुत थोड़ा जल देखकर वे राजा शन्तनु बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ ४७-४८॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—7 A