देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| १९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तत्रापश्यत्कुमारं तं मुञ्चन्तं विशिखान्बहून्।<br>आकृष्य च महाचापं क्रीडन्तं सरितस्तटे ॥ ४९<br><br>तं वीक्ष्य विस्मितो राजा न स्म जानाति किञ्चन।<br>नोपलेभे स्मृतिं भूपः पुत्रोऽयं मम वा न वा॥ ५० | उन्होंने वहाँ नदीके किनारे खेलते हुए एक बालकको महान् धनुषको खींचकर बहुतसे बाणोंको छोड़ते हुए देखा। उसे देखकर राजा शन्तनु बड़े विस्मित हुए और कुछ भी नहीं जान पाये। उन्हें यह भी स्मरण न हो पाया कि यह मेरा पुत्र है या नहीं॥ ४९-५०॥ |
| दृष्ट्वाप्यमानुषं कर्म बाणेषु लघुहस्तताम्।<br>विद्यां वाप्रतिमां रूपं तस्य वै स्मरसन्निभम् ॥ ५१<br><br>पप्रच्छ विस्मितो राजा कस्य पुत्रोऽसि चानघ।<br>नोवाच किञ्चिद्वीरोऽसौ मुञ्चञ्छिलीमुखानथ ॥ ५२<br><br>अन्तर्धानं गतः सोऽथ राजा चिन्तातुरोऽभवत्।<br>कोऽयं मम सुतो बालः किं करोमि व्रजामि कम् ॥ ५३ | उस बालकके अतिमानवीय कृत्य, बाण चलानेके हस्तलाघव, असाधारण विद्या और कामदेवके समान सुन्दर रूपको देखकर अत्यन्त विस्मित राजाने उससे पूछा—‘हे निर्दोष बालक! तुम किसके पुत्र हो?’ किंतु उस वीर बालकने कोई उत्तर नहीं दिया और वह बाण चलाता हुआ अन्तर्धान हो गया। तब राजा शन्तनु चिन्तित होकर यह सोचने लगे कि कहीं यह मेरा ही पुत्र तो नहीं है? अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ?॥ ५१—५३॥ |
| गङ्गां तुष्टाव भूपालः स्थितस्तत्र समाहितः।<br>दर्शनं सा ददौ चाथ चारुरूपा यथा पुरा ॥ ५४ | जब उन्होंने वहीं खड़े होकर समाहितचित्तसे गंगाजीकी स्तुति की तब गंगाजीने प्रसन्न होकर पहलेके ही समान एक रूपवती स्त्रीके रूपमें उन्हें दर्शन दिया॥ ५४॥ |
| दृष्ट्वा तां चारुसर्वाङ्गीं बभाषे नृपतिः स्वयम्।<br>कोऽयं गङ्गे गतो बालो मम त्वं दर्शयाधुना ॥ ५५ | सर्वांगसुन्दरी गंगाजीको देखकर राजा शन्तनु बोले—हे गंगे! यह बालक कौन था और कहाँ चला गया? आप उसे मुझको दिखा दीजिये॥ ५५॥ |
| गङ्गोवाच<br>पुत्रोऽयं तव राजेन्द्र रक्षितश्चाष्टमो वसुः।<br>ददामि तव हस्ते तु गाङ्गेयोऽयं महातपाः॥ ५६ | गंगाजी बोलीं—हे राजेन्द्र! यह आपका ही पुत्र आठवाँ वसु है, जिसे मैंने पाला है। इस महातपस्वी गांगेयको मैं आपको सौंपती हूँ॥ ५६॥ |
| कीर्तिकर्ता कुलस्यास्य भविता तव सुव्रत।<br>पाठितस्त्वखिलान्वेदान्धनुर्वेदं च शाश्वतम् ॥ ५७ | हे सुव्रत! यह बालक आपके इस कुलकी कीर्तिको बढ़ानेवाला होगा। इसे सभी वेदशास्त्र एवं शाश्वत धनुर्वेदकी शिक्षा दी गयी है॥ ५७॥ |
| वसिष्ठस्याश्रमे दिव्ये संस्थितोऽयं सुतस्तव।<br>सर्वविद्याविधानज्ञः सर्वार्थकुशलः शुचिः॥ ५८ | आपका यह पुत्र वसिष्ठजीके दिव्य आश्रममें रहा है और सब विद्याओंमें पारंगत, कार्यकुशल एवं सदाचारी है॥ ५८॥ |
| यद्वेद जामदग्न्योऽसौ तद्वेदायं सुतस्तव।<br>गृहाण गच्छ राजेन्द्र सुखी भव नराधिप ॥ ५९ | जिस विद्याको जमदग्निपुत्र परशुराम जानते हैं, उसे आपका यह पुत्र जानता है। हे राजेन्द्र! हे नराधिप! आप इसे ग्रहण कीजिये, जाइये और सुखपूर्वक रहिये॥ ५९॥ |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे गङ्गा दत्त्वा पुत्रं नृपाय वै।<br>नृपतिस्तु मुदा युक्तो बभूवातिसुखान्वितः ॥ ६० | ऐसा कहकर तथा वह पुत्र राजाको देकर गंगाजी अन्तर्धान हो गयीं। उसे पाकर राजा शन्तनु बहुत आनन्दित और सुखी हुए॥ ६०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—7 B