देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० ५ ] | द्वितीय स्कन्ध | १९५ |
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| समालिङ्ग्य सुतं राजा समाघ्राय च मस्तकम्।<br>समारोप्य रथे पुत्रं स्वपुरं स प्रचक्रमे॥ ६१ | राजा शन्तनु पुत्रका आलिंगन करके तथा उसका मस्तक सूँघकर और उसे अपने रथपर बैठाकर अपने नगरकी ओर चल पड़े॥ ६१॥ |
| गत्वा गजाह्वयं राजा चकारोत्सवमुत्तमम्।<br>दैवज्ञं च समाहूय पप्रच्छ च शुभं दिनम्॥ ६२ | राजाने हस्तिनापुर जाकर महान् उत्सव किया और दैवज्ञको बुलाकर शुभ मुहूर्त पूछा॥ ६२॥ |
| समाहूय प्रजाः सर्वाः सचिवान्सर्वशः शुभान्।<br>यौवराज्येऽथ गाङ्गेयं स्थापयामास पार्थिवः॥ ६३ | राजा शन्तनुने सब प्रजाजनों तथा सभी श्रेष्ठ मन्त्रियोंको बुलाकर गंगापुत्रको युवराज पदपर बैठा दिया॥ ६३॥ |
| कृत्वा तं युवराजानं पुत्रं सर्वगुणान्वितम्।<br>सुखमास स धर्मात्मा न सस्मार च जाह्नवीम्॥ ६४ | उस सर्वगुणसम्पन्न पुत्रको युवराज बनाकर वे धर्मात्मा शन्तनु सुखपूर्वक रहने लगे। अब उन्हें गंगाजीकी भी सुधि नहीं रही॥ ६४॥ |
| सूत उवाच<br>एतद्वः कथितं सर्वं कारणं वसुशापजम्।<br>गाङ्गेयस्य तथोत्पत्तिं जाह्नव्याः सम्भवं तथा॥ ६५ | सूतजी बोले— इस प्रकार मैंने आप सबको वसुओंके शापका कारण, गंगाके प्राकट्य तथा भीष्मकी उत्पत्तिका वृत्तान्त कह दिया॥ ६५॥ |
| गङ्गावतरणं पुण्यं वसूनां सम्भवं तथा।<br>यः शृणोति नरः पापान्मुच्यते नात्र संशयः॥ ६६ | जो मनुष्य गंगावतरण तथा वसुओंके उद्भवकी इस पवित्र कथाको सुनता है, वह सब प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६६॥ |
| पुण्यं पवित्रमाख्यानं कथितं मुनिसत्तमाः।<br>यथा मया श्रुतं व्यासात्पुराणं वेदसम्मितम्॥ ६७ | हे मुनिश्रेष्ठो! मैंने यह पवित्र, पुण्यदायक तथा वेद-सम्मत पौराणिक आख्यान जैसा व्यासजीके मुखारविन्दसे सुना था, वैसा आपलोगोंसे कह दिया॥ ६७॥ |
| श्रीमद्भागवतं पुण्यं नानाख्यानकथान्वितम्।<br>द्वैपायनमुखोद्भूतं पञ्चलक्षणसंयुतम्॥ ६८ | द्वैपायन व्यासजीके मुखसे निःसृत यह श्रीमद्देवी-भागवतमहापुराण बड़ा ही पवित्र, अनेकानेक कथाओंसे परिपूर्ण तथा सर्ग-प्रतिसर्ग आदि पाँच पुराण-लक्षणोंसे युक्त है॥ ६८॥ |
| शृण्वतां सर्वपापघ्नं शुभदं सुखदं तथा।<br>इतिहासमिमं पुण्यं कीर्तितं मुनिसत्तमाः॥ ६९ | हे मुनिश्रेष्ठो! सुननेवालोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाले, कल्याणकारी, सुखदायक तथा पुण्यप्रद इस इतिहासका मैंने आपलोगोंसे वर्णन कर दिया॥ ६९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितयां द्वितीयस्कन्धे देवव्रतोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
मत्स्यगन्धा (सत्यवती)-को देखकर राजा शन्तनुका मोहित होना, भीष्मद्वारा आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रत धारण करनेकी प्रतिज्ञा करना और शन्तनुका सत्यवतीसे विवाह
| ऋषय ऊचुः<br>वसूनां सम्भवः सूत कथितः शापकारणात्।<br>गाङ्गेयस्य तथोत्पत्तिः कथिता लोमहर्षणे॥ १ | ऋषिगण बोले— हे लोमहर्षणतनय सूतजी! आपने शापवश अष्टवसुओंके जन्म तथा गंगाजीकी उत्पत्तिका वर्णन किया। हे धर्मज्ञ! व्यासजीकी सत्यवती |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—7 C