देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| अ० ५ ] | द्वितीय स्कन्ध | १९५ |
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| समालिङ्ग्य सुतं राजा समाघ्राय च मस्तकम्।<br>समारोप्य रथे पुत्रं स्वपुरं स प्रचक्रमे॥ ६१ | राजा शन्तनु पुत्रका आलिंगन करके तथा उसका मस्तक सूँघकर और उसे अपने रथपर बैठाकर अपने नगरकी ओर चल पड़े॥ ६१॥ |
| गत्वा गजाह्वयं राजा चकारोत्सवमुत्तमम्।<br>दैवज्ञं च समाहूय पप्रच्छ च शुभं दिनम्॥ ६२ | राजाने हस्तिनापुर जाकर महान् उत्सव किया और दैवज्ञको बुलाकर शुभ मुहूर्त पूछा॥ ६२॥ |
| समाहूय प्रजाः सर्वाः सचिवान्सर्वशः शुभान्।<br>यौवराज्येऽथ गाङ्गेयं स्थापयामास पार्थिवः॥ ६३ | राजा शन्तनुने सब प्रजाजनों तथा सभी श्रेष्ठ मन्त्रियोंको बुलाकर गंगापुत्रको युवराज पदपर बैठा दिया॥ ६३॥ |
| कृत्वा तं युवराजानं पुत्रं सर्वगुणान्वितम्।<br>सुखमास स धर्मात्मा न सस्मार च जाह्नवीम्॥ ६४ | उस सर्वगुणसम्पन्न पुत्रको युवराज बनाकर वे धर्मात्मा शन्तनु सुखपूर्वक रहने लगे। अब उन्हें गंगाजीकी भी सुधि नहीं रही॥ ६४॥ |
| सूत उवाच<br>एतद्वः कथितं सर्वं कारणं वसुशापजम्।<br>गाङ्गेयस्य तथोत्पत्तिं जाह्नव्याः सम्भवं तथा॥ ६५ | सूतजी बोले— इस प्रकार मैंने आप सबको वसुओंके शापका कारण, गंगाके प्राकट्य तथा भीष्मकी उत्पत्तिका वृत्तान्त कह दिया॥ ६५॥ |
| गङ्गावतरणं पुण्यं वसूनां सम्भवं तथा।<br>यः शृणोति नरः पापान्मुच्यते नात्र संशयः॥ ६६ | जो मनुष्य गंगावतरण तथा वसुओंके उद्भवकी इस पवित्र कथाको सुनता है, वह सब प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६६॥ |
| पुण्यं पवित्रमाख्यानं कथितं मुनिसत्तमाः।<br>यथा मया श्रुतं व्यासात्पुराणं वेदसम्मितम्॥ ६७ | हे मुनिश्रेष्ठो! मैंने यह पवित्र, पुण्यदायक तथा वेद-सम्मत पौराणिक आख्यान जैसा व्यासजीके मुखारविन्दसे सुना था, वैसा आपलोगोंसे कह दिया॥ ६७॥ |
| श्रीमद्भागवतं पुण्यं नानाख्यानकथान्वितम्।<br>द्वैपायनमुखोद्भूतं पञ्चलक्षणसंयुतम्॥ ६८ | द्वैपायन व्यासजीके मुखसे निःसृत यह श्रीमद्देवी-भागवतमहापुराण बड़ा ही पवित्र, अनेकानेक कथाओंसे परिपूर्ण तथा सर्ग-प्रतिसर्ग आदि पाँच पुराण-लक्षणोंसे युक्त है॥ ६८॥ |
| शृण्वतां सर्वपापघ्नं शुभदं सुखदं तथा।<br>इतिहासमिमं पुण्यं कीर्तितं मुनिसत्तमाः॥ ६९ | हे मुनिश्रेष्ठो! सुननेवालोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाले, कल्याणकारी, सुखदायक तथा पुण्यप्रद इस इतिहासका मैंने आपलोगोंसे वर्णन कर दिया॥ ६९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितयां द्वितीयस्कन्धे देवव्रतोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
मत्स्यगन्धा (सत्यवती)-को देखकर राजा शन्तनुका मोहित होना, भीष्मद्वारा आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रत धारण करनेकी प्रतिज्ञा करना और शन्तनुका सत्यवतीसे विवाह
| ऋषय ऊचुः<br>वसूनां सम्भवः सूत कथितः शापकारणात्।<br>गाङ्गेयस्य तथोत्पत्तिः कथिता लोमहर्षणे॥ १ | ऋषिगण बोले— हे लोमहर्षणतनय सूतजी! आपने शापवश अष्टवसुओंके जन्म तथा गंगाजीकी उत्पत्तिका वर्णन किया। हे धर्मज्ञ! व्यासजीकी सत्यवती |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—7 C
| १९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| माता व्यासस्य धर्मज्ञ नाम्ना सत्यवती सती।<br>कथं शन्तनुना प्राप्ता भार्या गन्धवती शुभा॥ २<br>तन्ममाचक्ष्व विस्तारं दाशपुत्री कथं वृता।<br>राज्ञा धर्मवरिष्ठेन संशयं छिन्धि सुव्रत॥ ३ | नामकी साध्वी माता जो पवित्र गन्धवाली थीं, वे राजा शन्तनुको पत्नीरूपसे कैसे प्राप्त हुईं? यह हमें विस्तारके साथ बताइये। महान् धर्मनिष्ठ राजा शन्तनुने निषादपुत्रीके साथ विवाह क्यों किया? हे सुव्रत! यह बताकर आप हमारे सन्देहका निवारण कीजिये॥ १-३॥ | | सूत उवाच<br>शन्तनुर्नाम राजर्षिर्मृगयानिरतः सदा।<br>वनं जगाम निघ्नन्वौ मृगांश्च महिषान् रुरून्॥ ४ | सूतजी बोले— राजर्षि शन्तनु सदा आखेट करनेमें तत्पर रहते थे। वे वनमें जाकर मृग, महिष तथा रुरुमृगोंका वध किया करते थे॥ ४॥ | | चत्वार्येव तु वर्षाणि पुत्रेण सह भूपतिः।<br>रममाणः सुखं प्राप कुमारेण यथा हरः॥ ५ | राजा शन्तनु केवल चार वर्षतक भीष्मके साथ उसी प्रकार सुखसे रहे, जिस प्रकार भगवान् शंकर कार्तिकेयके साथ आनन्दपूर्वक रहते थे॥ ५॥ | | एकदा विक्षिपन्बाणान्विनिघ्नन्खड्गसूकरान्।<br>स कदाचिद्वनं प्राप्तः कालिन्दीं सरितां वराम्॥ ६ | एक बार वे महाराज शन्तनु वनमें बाण छोड़ते हुए बहुतसे गैंडों तथा सूकरोंका वध करते हुए किसी समय नदियोंमें श्रेष्ठ यमुनाके किनारे जा पहुँचे॥ ६॥ | | महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद् गन्धमुत्तमम्।<br>तस्य प्रभवमन्विच्छन्सञ्चचार वनं तदा॥ ७ | राजाने वहाँपर कहींसे आती हुई उत्तम गन्धको सूँघा। तब उस सुगन्धिके उद्गमका पता लगानेके लिये वे वनमें विचरने लगे॥ ७॥ | | न मन्दारस्य गन्धोऽयं मृगनाभिमदस्य न।<br>चम्पकस्य न मालत्या न केतक्या मनोहरः॥ ८ | वे बड़े असमंजसमें पड़ गये कि यह मनोहर सुगन्धि न मन्दारपुष्पकी है, न कस्तूरीकी है, न मालतीकी है, न चम्पाकी है और न तो केतकीकी ही है!॥ ८॥ | | न चानुभूतपूर्वोऽयं वाति गन्धवहः शुभः।<br>कुतोऽयमेति वायुर्वै मम घ्राणविमोहनः॥ ९ | मैंने ऐसी अनुपम सुगन्धिका पूर्वमें कभी नहीं अनुभव किया था। [इस दिव्य सुगन्धिको लेकर] सुन्दर वायु बह रही है। मेरी घ्राणेन्द्रियको मुग्ध कर देनेवाली यह वायु कहाँसे आ रही है?॥ ९॥ | | इति सञ्चिन्त्यमानोऽसौ बभ्राम वनमण्डलम्।<br>मोहितो गन्धलोभेन शन्तनुः पवनानुगः॥ १० | इस प्रकार सोचते-विचारते राजा शन्तनु गन्धके लोभसे मोहित सुगन्धित वायुका अनुसरण करते हुए वनप्रदेशमें विचरण करने लगे॥ १०॥ | | स ददर्श नदीतीरे संस्थितां चारुदर्शनाम्।<br>शृङ्गाररहितां कान्तां सुस्थितां मलिनाम्बराम्॥ ११ | उन्होंने यमुनानदीके तटपर बैठी हुई एक दिव्यदर्शनवाली स्त्रीको देखा, जो मलिन वस्त्र धारण करने और शृंगार न करनेपर भी मनोहर दीख रही थी॥ ११॥ | | दृष्ट्वा तामसितापाङ्गीं विस्मितः स महीपतिः।<br>अस्या देहस्य गन्धोऽयमिति सञ्जातनिश्चयः॥ १२ | उस श्याम नयनोंवाली स्त्रीको देखकर राजा आश्चर्यमें पड़ गये और उन्हें इस बातका विश्वास हो गया कि यह सुगन्धि इसी स्त्रीके शरीरकी है॥ १२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 7 D
अ० ५] द्वितीय स्कन्ध १९७
अ० ५] द्वितीय स्कन्ध १९७
| तदद्भुतं रूपमतीव सुन्दरं<br>तथैव गन्धोऽखिललोकसम्मतः।<br>वयश्च तादृङ् नवयौवनं शुभं<br>दृष्ट्वैव राजा किल विस्मितोऽभवत्॥१३ | उसका अद्भुत एवं अतिशय सुन्दर रूप, सब प्राणियोंका मन स्वाभाविक रूपसे अपनी ओर आकर्षित करनेवाली सुगन्धि, उसकी अवस्था तथा उसका वैसा शुभ नवयौवन देखकर राजा शान्तनुको महान् विस्मय हुआ॥१३॥ |
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| केयं कुतो वा समुपागताधुना<br>देवाङ्गना वा किमु मानुषी वा।<br>गन्धर्वपुत्री किल नागकन्या<br>जाने कथं गन्धवतीं नु कामिनीम्॥१४ | यह कौन है और इस समय यह कहाँसे आयी है? यह कोई देवांगना है या मानवी स्त्री, यह कोई गन्धर्वकन्या अथवा नागकन्या है? मैं इस सुगन्धा कामिनीके विषयमें कैसे जानकारी प्राप्त करूँ?॥१४॥ |
| सञ्चिन्त्य चैवं मनसा नृपोऽसौ<br>न निश्चयं प्राप यदा ततः स्वयम्।<br>गङ्गां स्मरन्कामवशं गतोऽथ<br>पप्रच्छ कान्तां तटसंस्थितां च॥१५<br>कासि प्रिये कस्य सुतासि कस्मा-<br>दिह स्थिता त्वं विजने वरोरु।<br>एकाकिनी किं वद चारुनेत्रे<br>विवाहिता वा न विवाहितासि॥१६ | इस प्रकार विचार करके भी वे राजा जब कुछ निश्चय नहीं कर सके, तब तत्क्षण गंगाजीका स्मरण करते हुए वे कामके वशीभूत हो गये और तटपर बैठी हुई उस सुन्दरीसे उन्होंने पूछा—हे प्रिये! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? हे वरोरु! तुम इस निर्जन वनमें क्यों बैठी हो? हे सुनयने! क्या तुम अकेली ही हो? तुम विवाहिता हो या कुमारी; यह बताओ॥१५-१६॥ |
| सञ्जातकामोऽहमरालनेत्रे<br>त्वां वीक्ष्य कान्तां च मनोरमां च।<br>ब्रूहि प्रिये यासि चिकीर्षसि त्वं<br>किं चेति सर्वं मम विस्तरेण॥१७ | हे अरालनेत्रे! तुम जैसी मनोरमा स्त्रीको देखकर मैं कामातुर हो गया हूँ। हे प्रिये! विस्तारपूर्वक मुझे यह बतलाओ कि तुम कौन हो और क्या करना चाहती हो?॥१७॥ |
| इत्येवमुक्ता सुदती नृपेण<br>प्रोवाच तं सस्मितमम्बुजेक्षणा।<br>दाशस्य पुत्रीं त्वमवेहि राजन्<br>कन्यां पितुः शासनसंस्थितां च॥१८ | महाराज शान्तनुके वचन सुनकर वह सुन्दर दाँतोंवाली तथा कमलके समान नयनोंवाली स्त्री मुसकराकर बोली—हे राजन्! आप मुझे निषादकन्या और अपने पिताकी आज्ञामें रहनेवाली कन्या समझें॥१८॥ |
| तरीमिमां धर्मनिमित्तमेव<br>संवाहयामीह जले नृपेन्द्र।<br>पिता गृहे मेऽद्य गतोऽस्ति कामं<br>सत्यं ब्रवीम्यर्थपते तवाग्रे॥१९ | हे नृपेन्द्र! मैं अपने धर्मका अनुसरण करती हुई जलमें यह नौका चलाती हूँ। हे अर्थपते! पिताजी अभी ही घर गये हैं। आपके सम्मुख यह बातें मैंने सत्य कही हैं॥१९॥ |
| इत्येवमुक्त्वा विरराम बाला<br>कामातुरस्तां नृपतिर्बभाषे।<br>कुरुप्रवीरं कुरु मां पतिं त्वं<br>वृथा न गच्छेन्ननु यौवनं ते॥२० | यह कहकर वह निषादकन्या मौन हो गयी। तब कामसे पीड़ित महाराज शान्तनुने उससे कहा—मुझ कुरुवंशी वीरको तुम अपना पति बना लो, जिससे तुम्हारा यौवन व्यर्थ न जाय॥२०॥ |
| न चास्ति पत्नी मम वै द्वितीया<br>त्वं धर्मपत्नी भव मे मृगाक्षि।<br>दासोऽस्मि तेऽहं वशगः सदैव<br>मनोभवस्तापयति प्रिये माम्॥२१ | मेरी कोई दूसरी पत्नी नहीं है। अतः हे मृगनयनी! तुम मेरी धर्मपत्नी बन जाओ। हे प्रिये! मैं सर्वदाके लिये तुम्हारा वशवर्ती दास बन जाऊँगा। मुझे कामदेव पीड़ित कर रहा है॥२१॥ |
| १९८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| गता प्रिया मां परिहृत्य कान्ता<br>नान्या वृताहं विधुरोऽस्मि कान्ते।<br>त्वां वीक्ष्य सर्वावयवातिरम्यां<br>मनो हि जातं विवशं मदीयम्॥ २२ | मेरी प्रियतमा मुझे छोड़कर चली गयी है, तबसे मैंने अपना दूसरा विवाह नहीं किया। हे कान्ते! मैं इस समय विधुर हूँ। तुम जैसी सर्वांगसुन्दरीको देखकर मेरा मन अपने वशमें नहीं रह गया है॥ २२॥ | | श्रुत्वामृतास्वादरसं नृपस्य<br>वचोऽतिरम्यं खलु दाशकन्या।<br>उवाच तं सात्त्विकभावयुक्ता<br>कृत्वातिधैर्यं नृपतिं सुगन्धा॥ २३<br>यदात्थ राजन् मयि तत्तथैव<br>मन्येऽहमेतत्तु यथा वचस्ते।<br>नास्मि स्वतन्त्रा त्वमवेहि कामं<br>दाता पिता मेऽर्थय तं त्वमाशु॥ २४ | राजाकी अमृतरसके समान मधुर तथा मनोहारी बात सुनकर वह दाशकन्या सुगन्धा सात्त्विक भावसे युक्त होकर धैर्य धारण करके राजासे बोली—हे राजन्! आपने मुझसे जो कुछ कहा, वह यथार्थ है; किंतु आप अच्छी तरह जान लीजिये कि मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। मेरे पिताजी ही मुझे दे सकते हैं। अतएव आप उन्हींसे मेरे लिये याचना कीजिये॥ २३-२४॥ | | न स्वैरिणीहास्म्यपि दाशपुत्री<br>पितुर्वशेऽहं सततं चरामि।<br>स चेद्ददाति प्रथितः पिता मे<br>गृहाण पाणिं वशगास्मि तेऽहम्॥ २५ | मैं एक निषादकी कन्या होती हुई भी स्वेच्छाचारिणी नहीं हूँ। मैं सदा पिताके वशमें रहती हुई सब काम करती हूँ। यदि मेरे पिताजी मुझे आपको देना स्वीकार कर लें तब आप मेरा पाणिग्रहण कर लीजिये और मैं सदाके लिये आपके अधीन हो जाऊँगी॥ २५॥ | | मनोभवस्त्वां नृप किं दुनोति<br>यथा पुनर्मां नवयौवनां च।<br>दुनोति तत्रापि हि रक्षणीया<br>धृतिः कुलाचारपरम्परासु॥ २६ | हे राजन्! परस्पर आसक्त होनेपर भी कुलकी मर्यादा तथा परम्पराके अनुसार धैर्य धारण करना चाहिये॥ २६॥ | | सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्या नृपतिः काममोहितः।<br>गतो दाशपतेर्गेहं तस्या याचनहेतवे॥ २७ | **सूतजी बोले—**उस सुगन्धाकी यह बात सुनकर कामातुर राजा उसे माँगनेके लिये निषादराजके घर गये॥ २७॥ | | दृष्ट्वा नृपतिमायान्तं दाशोऽतिविस्मयं गतः।<br>प्रणामं नृपतेः कृत्वा कृताञ्जलिरभाषत॥ २८ | इस प्रकार महाराज शन्तनुको अपने घर आया देखकर निषादराजको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर वह बोला—॥ २८॥ | | दाश उवाच<br>दासोऽस्मि तव भूपाल कृतार्थोऽहं तवागमे।<br>आज्ञां देहि महाराज यदर्थमिह चागमः॥ २९ | **निषादने कहा—**हे राजन्! मैं आपका दास हूँ। आपके आगमनसे मैं कृतकृत्य हो गया। हे महाराज! आप जिस कार्यके लिये आये हों, मुझे आज्ञा दीजिये॥ २९॥ | | राजोवाच<br>धर्मपत्नीं करिष्यामि सुतामेतां तवानघ।<br>त्वया चेद्दीयते मह्यं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ ३० | **राजा बोले—**हे अनघ! यदि आप अपनी यह कन्या मुझे प्रदान कर दें तो मैं इसे अपनी धर्मपत्नी बना लूँगा; यह मैं सत्य कह रहा हूँ॥ ३०॥ | | दाश उवाच<br>कन्यारत्नं मदीयं चेद्यत्त्वं प्रार्थयसे नृप।<br>दातव्यं तु प्रदास्यामि न त्वदेयं कदाचन॥ ३१<br>तस्याः पुत्रो महाराज त्वदन्ते पृथिवीपतिः।<br>सर्वथा चाभिषेक्तव्यो नान्यः पुत्रस्तवेति वै॥ ३२ | **निषादने कहा—**हे महाराज! यदि आप मेरे इस कन्यारत्नके लिये प्रार्थना कर रहे हैं तो मैं अवश्य दूँगा; क्योंकि देनेयोग्य वस्तु तो कभी अदेय नहीं होती है; किंतु हे महाराज! आपके बाद इस कन्याका पुत्र ही राजाके रूपमें अभिषिक्त होना चाहिये, आपका दूसरा पुत्र नहीं॥ ३१-३२॥ |
अ० ५ ] द्वितीय स्कन्ध १९९
अ० ५ ] द्वितीय स्कन्ध १९९
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| श्रुत्वा वाक्यं तु दाशस्य राजा चिन्तातुरोऽभवत्।<br>गाङ्गेयं मनसा कृत्वा नोवाच नृपतिस्तदा॥ ३३ | निषादकी बात सुनकर राजा शन्तनु चिन्तित हो उठे। उस समय मनमें भीष्मका स्मरण करके राजा कुछ भी उत्तर न दे सके॥ ३३॥ |
| कामातुरो गृहं प्राप्तश्चिन्ताविष्टो महीपतिः।<br>न सस्नौ बुभुजे नाथ न सुष्वाप गृहं गतः॥ ३४ | तब कामातुर तथा चिन्तित राजा राजमहलमें चले गये। उन्होंने घर जानेपर न स्नान किया, न भोजन किया और न शयन ही किया॥ ३४॥ |
| चिन्तातुरं तु तं दृष्ट्वा पुत्रो देवव्रतस्तदा।<br>गत्वापृच्छन्महीपालं तदसन्तोषकारणम्॥ ३५<br>दुर्जयः कोऽस्ति शत्रुस्ते करोमि वशगं तव।<br>का चिन्ता नृपशार्दूल सत्यं वद नृपोत्तम॥ ३६ | तब उन्हें चिन्तित देखकर पुत्र देवव्रत राजाके पास जाकर उनकी इस चिन्ताका कारण पूछने लगे—हे नृपश्रेष्ठ! कौन-सा ऐसा शत्रु है जिसको आप जीत न सके; मैं उसे आपके अधीन कर दूँ। हे नृपोत्तम! आपकी क्या चिन्ता है, मुझे सही-सही बताइये॥ ३५-३६॥ |
| किं तेन जातेन सुतेन राजन्<br>दुःखं न जानाति न नाशयेद्यः।<br>ऋणं ग्रहीतुं समुपागतोऽसौ<br>प्राग्जन्मजं नात्र विचारणास्ति॥ ३७ | हे राजन्! भला उस उत्पन्न हुए पुत्रसे क्या लाभ? जो पैदा होकर अपने पिताका दुःख न समझे तथा उसको दूर करनेका उपाय न कर सके। ऐसा कुपुत्र तो पूर्वजन्मके किसी ऋणको वापस लेनेके लिये यहाँ आता है; इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है॥ ३७॥ |
| विमुच्य राज्यं रघुनन्दनोऽपि<br>ताताज्ञया दाशरथिस्तु रामः।<br>वनं गतो लक्ष्मणजानकीभ्यां<br>सहैव शैलं किल चित्रकूटम्॥ ३८ | दशरथके पुत्र रामचन्द्रजी भी पिताकी आज्ञासे राज्य त्यागकर लक्ष्मण और सीताके साथ वनमें चले गये तथा चित्रकूटपर्वतपर निवास करने लगे॥ ३८॥ |
| सुतो हरिश्चन्द्रनृपस्य राजन्<br>यो रोहितश्चेति प्रसिद्धनामा।<br>क्रीतोऽथ पित्रा विपणोद्यतश्च<br>दासार्पितो विप्रगृहे तु नूनम्॥ ३९ | इसी प्रकार हे राजन्! राजा हरिश्चन्द्रका पुत्र जो रोहित नामसे प्रसिद्ध था, अपने पिताके इच्छानुसार बिकनेके लिये तत्पर हो गया और खरीदा हुआ वह बालक ब्राह्मणके घरमें सेवकका कार्य करने लगा॥ ३९॥ |
| तथाजिगर्तस्य सुतो वरिष्ठो<br>नाम्ना शुनःशेप इति प्रसिद्धः।<br>क्रीतस्तु पित्राप्यथ यूपबद्धः<br>सम्मोचितो गाधिसुतेन पश्चात्॥ ४० | 'अजीगर्त' ब्राह्मणका एक श्रेष्ठ पुत्र था, जो शुनःशेप नामसे प्रसिद्ध था। खरीद लिये जानेपर वह पिताके द्वारा यूपमें बाँध दिया गया, जिसे बादमें विश्वामित्रने छुड़ाया था॥ ४०॥ |
| पित्राज्ञया जामदग्न्येन पूर्वं<br>छिन्नं शिरो मातुरिति प्रसिद्धम्।<br>अकार्यमप्याचरितं च तेन<br>गुरोरनुज्ञा च गरीयसी कृता॥ ४१ | पूर्वकालमें पिताकी आज्ञासे ही परशुरामने अपनी माताका सिर काट दिया था, ऐसा लोकमें प्रसिद्ध है। इस अनुचित कर्मको करके भी उन्होंने पिताकी आज्ञाका महत्त्व बढ़ाया था॥ ४१॥ |
| इदं शरीरं तव भूपते न<br>क्षमोऽस्मि नूनं वद किं करोम्यहम्।<br>न शोचनीयं मयि वर्तमाने-<br>ऽप्यसाध्यमर्थं प्रतिपादयाम्यदः॥ ४२ | हे पृथ्वीपते! यह मेरा शरीर आपका ही है। यद्यपि मैं समर्थ नहीं हूँ; फिर भी आप कहिये मैं आपकी क्या सेवा करूँ? मेरे रहते आपको किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं होनी चाहिये। मैं आपका असाध्य कार्य भी तत्काल पूरा करूँगा॥ ४२॥ |
| २०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
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| प्रब्रूहि राजंस्तव कास्ति चिन्ता निवारयाम्यद्य धनुर्गृहीत्वा।<br>देहेन मे चेच्चरितार्थता वा भवत्वमोघा भवतश्चिकीर्षा॥ ४३<br>धिक् तं सुतं यः पितुरीप्सितार्थं क्षमोऽपि सन् प्रतिपादयेन्न।<br>जातेन किं तेन सुतेन कामं पितुर्न चिन्तां हि समुद्धरेद्यः॥ ४४ | हे राजन्! आप बताइये कि आपको किस बातकी चिन्ता है? मैं अभी धनुष लेकर उसका निवारण कर दूँगा। यदि मेरे इस शरीरसे भी आपका कार्य सिद्ध हो सके तो मैं आपकी अभिलाषा पूर्ण करनेको तत्पर हूँ। उस पुत्रको धिक्कार है, जो समर्थ होकर भी अपने पिताकी इच्छाको पूर्ण नहीं करता। जिस पुत्रके द्वारा पिताकी चिन्ता दूर न हुई, उस पुत्रका जन्म लेनेका क्या प्रयोजन ?॥ ४३-४४॥ |
| सूत उवाच<br>निशम्येति वचस्तस्य पुत्रस्य शन्तनुर्नृपः।<br>लज्जमानस्तु मनसा तमाह त्वरितं सुतम्॥ ४५ | सूतजी बोले—अपने पुत्र गांगेयका वचन सुनकर महाराज शन्तनु मनमें लज्जित होते हुए उससे शीघ्र ही कहने लगे॥ ४५॥ |
| राजोवाच<br>चिन्ता मे महती पुत्र यस्त्वमेकोऽसि मे सुतः।<br>शूरोऽतिबलवान्मानी संग्रामेष्वपराङ्मुखः॥ ४६<br>एकापत्यस्य मे तात वृथेदं जीवितं किल।<br>मृते त्वयि मृधे क्वापि किं करोमि निराश्रयः॥ ४७<br>एषा मे महती चिन्ता तेनाद्य दुःखितोऽस्म्यहम्।<br>नान्या चिन्तास्ति मे पुत्र यां तवाग्रे वदाम्यहम्॥ ४८ | राजा बोले—हे पुत्र! मुझे यही महान् चिन्ता है कि तुम मेरे इकलौते पुत्र हो। यद्यपि तुम बलवान्, स्वाभिमानी, रणस्थलमें पीठ न दिखानेवाले साहसी पुत्र हो तथापि केवल एक पुत्र होनेके कारण मुझ पिताका जीवन व्यर्थ है; क्योंकि यदि कहीं किसी समरमें तुम्हें अमरगति प्राप्त हो गयी तो मैं असहाय होकर क्या कर सकूँगा ? यही मुझे सबसे बड़ी चिन्ता लगी है; इसी कारण मैं आजकल दुःखित रहता हूँ। हे पुत्र! इसके अतिरिक्त मुझे दूसरी कोई चिन्ता नहीं है, जिसे मैं तुम्हारे सामने कहूँ॥ ४६-४८॥ |
| सूत उवाच<br>तदाकर्ण्याथ गाङ्गेयो मन्त्रिवृद्धानपृच्छत।<br>न मां वदति भूपालो लज्जयाद्य परिप्लुतः॥ ४९ | सूतजी बोले—यह सुनकर गांगेयने वृद्ध मन्त्रियोंसे पूछा कि लज्जासे परिपूर्ण महाराज मुझे कुछ बता नहीं रहे हैं॥ ४९॥ |
| वित्त वार्तां नृपस्याद्य पृष्ट्वा यूयं विनिश्चयात्।<br>सत्यं ब्रुवन्तु मां सर्वं तत्करोमि निराकुलः॥ ५० | आपलोग राजाकी भावना जानकर सही एवं निश्चित कारण मुझे बताइये; मैं प्रसन्नतापूर्वक उसे सम्पन्न करूँगा॥ ५०॥ |
| तच्छ्रुत्वा ते नृपं गत्वा संविज्ञाय च कारणम्।<br>शशंसुर्विदितार्थैस्तु गाङ्गेयस्तदचिन्तयत्॥ ५१<br>सहितस्तैर्जगामाशु दाशस्य सदनं तदा।<br>प्रेमपूर्वमुवाचेदं विनम्रो जाह्नवीसुतः॥ ५२ | यह सुनकर मन्त्रिगण राजाके पास गये और सब कारण सही-सही जानकर उन्होंने युवराज गांगेयसे आकर कह दिया। तब उनका अभिप्राय जानकर गांगेय विचार करने लगे। मन्त्रियोंके साथ गंगापुत्र देवव्रत उस निषादके घर शीघ्र गये और प्रेमके साथ विनम्र होकर यह कहने लगे॥ ५१-५२॥ |
| गाङ्गेय उवाच<br>पित्रे देहि सुतां तेऽद्य प्रार्थयामि सुमध्यमाम्।<br>माता मेऽस्तु सुतेयं ते दासोऽस्म्यस्याः परन्तप॥ ५३ | गांगेय बोले—हे परन्तप! आप अपनी सुन्दरी कन्या मेरे पिताजीके लिये प्रदान कर दें—यही मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। आपकी ये कन्या मेरी माता हों और मैं इनका सेवक रहूँगा॥ ५३॥ |
| अ० ६ ] | द्वितीय स्कन्ध | २०१ | | :--- | :--- |
| दाश उवाच | निषादने कहा—हे महाभाग! हे नृपनन्दन! | | त्वं गृहाण महाभाग पत्नीं कुरु नृपात्मज।<br>पुत्रोऽस्या न भवेद् राजा वर्तमाने त्वयीति वै॥ ५४ | आप स्वयं ही इसे अपनी भार्या बनाइये; क्योंकि आपके रहते इसका पुत्र राजा नहीं हो सकेगा॥ ५४॥ | | गाङ्गेय उवाच<br>मातेयं मम दाशेयी राज्यं नैव करोम्यहम्।<br>पुत्रोऽस्याः सर्वथा राज्यं करिष्यति न संशयः॥ ५५ | गांगेय बोले— आपकी यह कन्या मेरी माता है। मैं राज्य नहीं करूँगा। इसका पुत्र ही निश्चितरूपसे राज्य करेगा; इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है॥ ५५॥ | | दाश उवाच<br>सत्यं वाक्यं मया ज्ञातं पुत्रस्ते बलवान्भवेत्।<br>सोऽपि राज्यं बलान्नूनं गृह्णीयादिति निश्चयः॥ ५६ | निषादने कहा— मैंने आपकी बात सही मान ली; परंतु यदि आपका पुत्र बलवान् हुआ तो वह बलपूर्वक राज्यको निश्चय ही ले लेगा॥ ५६॥ | | गाङ्गेय उवाच<br>न दारसंग्रहं नूनं करिष्यामि हि सर्वथा।<br>सत्यं मे वचनं तात मया भीष्मं व्रतं कृतम्॥ ५७ | गांगेय बोले— हे तात! मैं कभी विवाह नहीं करूँगा; मेरा यह वचन सर्वथा सत्य है—यह मैंने भीष्म-प्रतिज्ञा कर ली॥ ५७॥ | | सूत उवाच<br>एवं कृतां प्रतिज्ञां तु निशम्य झषजीवकः।<br>ददौ सत्यवतीं तस्मै राज्ञे सर्वाङ्गशोभनाम्॥ ५८ | सूतजी बोले— गांगेयद्वारा की गयी ऐसी प्रतिज्ञा सुनकर निषादने उन राजा शन्तनुको अपनी सर्वाङ्गसुन्दरी कन्या सत्यवती सौंप दी॥ ५८॥ | | अनेन विधिना तेन वृता सत्यवती प्रिया।<br>न जानाति परं जन्म व्यासस्य नृपसत्तमः॥ ५९ | इस प्रकार राजा शन्तनुने प्रिया सत्यवतीसे विवाह कर लिया। वे नृपश्रेष्ठ शन्तनु पूर्वमें सत्यवतीसे व्यासजीका जन्म नहीं जानते थे॥ ५९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे देवव्रतप्रतिज्ञावर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
दुर्वासाका कुन्तीको अमोघ कामद मन्त्र देना, मन्त्रके प्रभावसे कन्यावस्थामें ही कर्णका जन्म, कुन्तीका राजा पाण्डुसे विवाह, शापके कारण पाण्डुका सन्तानोत्पादनमें असमर्थ होना, मन्त्र-प्रयोगसे कुन्ती और माद्रीका पुत्रवती होना, पाण्डुकी मृत्यु और पाँचों पुत्रोंको लेकर कुन्तीका हस्तिनापुर आना
| सूत उवाच | सूतजी बोले—इस प्रकार उन शन्तनुने सत्यवतीसे |
|---|---|
| एवं सत्यवती तेन वृता शन्तनुना किल।<br>द्वौ पुत्रौ च तया जातौ मृतौ कालवशादपि॥ १ | विवाह कर लिया। उसको [चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक] दो पुत्र उत्पन्न हुए और कालवश वे दोनों मृत्युको भी प्राप्त हो गये॥ १॥ |
| व्यासवीर्यात्तु सञ्जातो धृतराष्ट्रोऽन्ध एव च।<br>मुनिं दृष्ट्वाथ कामिन्या नेत्रसम्मीलने कृते॥ २ | पुनः व्यासजीके तेजसे धृतराष्ट्र उत्पन्न हुए, जो जन्मसे ही अन्धे थे; क्योंकि मुनिको देखकर उस स्त्रीने अपने नेत्र बन्द कर लिये थे॥ २॥ |
| श्वेतरूपा यतो जाता दृष्ट्वा व्यासं नृपात्मजा।<br>व्यासकोपात्समुत्पन्नः पाण्डुस्तेन न संशयः॥ ३ | तत्पश्चात् छोटी रानी व्यासजीको देखकर पीली पड़ गयी, जिससे व्यासजीके कोपके कारण उससे पीतवर्ण पाण्डुका जन्म हुआ; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३॥ |
| २०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ | | :--- | :--- |
| सन्तोषितास्तया व्यासो दास्या कामकलाविदा।<br>विदुरस्तु समुत्पन्नो धर्मांशः सत्यवाक् शुचिः॥ ४ | निपुण दासीने व्यासजीको सन्तुष्ट किया, जिसके परिणामस्वरूप धर्मके अंश, सत्यवादी तथा पवित्र विचारवाले विदुर उत्पन्न हुए॥ ४॥ |
| राज्ये संस्थापितः पाण्डुः कनीयानपि मन्त्रिभिः।<br>अन्धत्वाद् धृतराष्ट्रोऽसौ नाधिकारे नियोजितः॥ ५<br><br>भीष्मस्यानुमते राज्यं प्राप्तः पाण्डुर्महाबलः।<br>विदुरोऽप्यथ मेधावी मन्त्रकार्ये नियोजितः॥ ६ | [बड़े होनेपर भी] अन्धे होनेके कारण धृतराष्ट्रको राज्य नहीं दिया गया और छोटे होते हुए भी पाण्डुको ही मन्त्रियोंने राजसिंहासनपर अभिषिक्त किया। भीष्मकी सम्मतिसे ही महाबली पाण्डुको राज्य प्राप्त हुआ तथा प्रतिभासम्पन्न विदुरजी मन्त्रणा-कार्यमें नियुक्त किये गये॥ ५-६॥ |
| धृतराष्ट्रस्य द्वे भार्ये गान्धारी सौबली स्मृता।<br>द्वितीया च तथा वैश्या गार्हस्थ्येषु प्रतिष्ठिता॥ ७ | धृतराष्ट्रकी दो स्त्रियाँ थीं। उनमें पहली सुबलपुत्री गान्धारी कही गयी है और दूसरी एक वैश्यपुत्री थी, जो गृहकार्योंमें प्रतिष्ठित की गयी थी॥ ७॥ |
| पाण्डोरपि तथा पत्न्यौ द्वे प्रोक्ते वेदवादिभिः।<br>शौरसेनी तथा कुन्ती माद्री च मद्रदेशजा॥ ८ | वेदवादी विद्वानोंने पाण्डुकी भी दो पत्नियाँ बतायी हैं। एक शूरसेनकी पुत्री कुन्ती और दूसरी मद्रदेशकी राजकुमारी माद्री॥ ८॥ |
| गान्धारी सुषुवे पुत्रशतं परमशोभनम्।<br>वैश्याप्येकं सुतं कान्तं युयुत्सुं सुषुवे प्रियम्॥ ९ | गान्धारीने परम सुन्दर सौ पुत्र उत्पन्न किये एवं वैश्या रानीने युयुत्सु नामका एक कान्तिमान् और प्रिय पुत्र उत्पन्न किया॥ ९॥ |
| कुन्ती तु प्रथमं कन्या सूर्यात्कर्णं मनोहरम्।<br>सुषुवे पितृगेहस्था पश्चात्पाण्डुपरिग्रहः॥ १० | कुन्तीने कुमारी अवस्थामें ही अपने पिताके घर रहते हुए सूर्यसे कर्ण नामक एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया था; तदनन्तर कुन्तीका विवाह पाण्डुसे हुआ॥ १०॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>किमेतत्सूत चित्रं त्वं भाषसे मुनिसत्तम।<br>जनितश्च सुतः पूर्वं पाण्डुना सा विवाहिता॥ ११ | ऋषिगण बोले— हे मुनिवर सूतजी! आप यह कैसी आश्चर्यजनक बात बता रहे हैं? पहले पुत्र उत्पन्न हुआ और बादमें पाण्डुके साथ कुन्तीका विवाह हुआ!॥ ११॥ |
| सूर्यात्कर्णः कथं जातः कन्यायां वद विस्तरात्।<br>कन्या कथं पुनर्जाता पाण्डुना सा विवाहिता॥ १२ | सूर्यके द्वारा कन्या कुन्तीसे कर्णकी उत्पत्ति कैसे हुई? वह कुन्ती पुनः कन्या कैसे रह गयी, जो पाण्डुके साथ उसका विवाह हो गया। यह आप विस्तारपूर्वक बताइये॥ १२॥ |
| सूत उवाच<br>शूरसेनसुता कुन्ती बालभावे यदा द्विजाः।<br>कुन्तिभोजेन राज्ञा तु प्रार्थिता कन्यका शुभा॥ १३<br><br>कुन्तिभोजेन सा बाला पुत्री तु परिकल्पिता।<br>सेवनार्थं तु दीप्तस्य विहिता चारुहासिनी॥ १४ | सूतजी बोले— हे द्विजगण! शूरसेनकी वह पुत्री कुन्ती जब शिशु थी, तभी राजा कुन्तिभोजने उस सुन्दर कन्याको माँग लिया था। उन्होंने उस चारुहासिनी कन्याको अपनी पुत्री बनाकर रखा और उसे अग्निहोत्रके काममें नियुक्त कर दिया॥ १३-१४॥ |
| दुर्वासास्तु मुनिः प्राप्तश्चातुर्मास्ये स्थितो द्विजः।<br>परिचर्या कृता कुन्त्या मुनिस्तोषं जगाम ह॥ १५ | एक बार महर्षि दुर्वासा वहाँ आ पहुँचे और चातुर्मास्यके लिये वहीं रहने लगे। कुन्तीने उनकी सेवा की, जिससे मुनिवर सन्तुष्ट हुए और उसको |
| अ० ६ ] | द्वितीय स्कन्ध | २०३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ददौ मन्त्रं शुभं तस्यै येनाहूतः सुरः स्वयम्।<br>समायाति तथा कामं पूरयिष्यति वाञ्छितम् ॥ १६ | एक ऐसे मन्त्रका उपदेश दिया, जिसके प्रयोगसे आवाहित किये गये देवता स्वयं उपस्थित होंगे और उसकी अभिलाषा पूर्ण करेंगे॥ १५-१६॥ |
| गते मुनौ ततः कुन्ती निश्चयार्थं गृहे स्थिता।<br>चिन्तयामास मनसा कं सुरं समचिन्तये ॥ १७ | दुर्वासामुनिके वहाँसे चले जानेपर अपने गृहमें बैठी हुई कुन्ती उस मन्त्रकी परीक्षाके लिये मनमें सोचने लगी कि मैं किस देवताका ध्यान करूँ?॥ १७॥ |
| उदितश्च तदा भानुस्तया दृष्टो दिवाकरः।<br>मन्त्रोच्चारं तया कृत्वा चाहूतस्तिग्मगुस्तदा ॥ १८ | उसने पूर्व दिशामें उदित होते हुए सूर्यको देखा और उस मन्त्रका उच्चारण करके उसने सूर्यका आवाहन किया। तब सूर्य अपने मण्डलसे अत्यन्त |
| मण्डलान्मानुषं रूपं कृत्वा सर्वातिपेशलम्।<br>अवातरत्तदाकाशात्समीपे तत्र मन्दिरे ॥ १९ | सुन्दर मनुष्यका रूप धारण करके आकाशसे कुन्तीके पास उस भवनमें उतर आये॥ १८-१९॥ |
| दृष्ट्वा देवं समायान्तं कुन्ती भानुं सुविस्मिता।<br>वेपमाना रजोदोषं प्राप्ता सद्यस्तु भामिनी ॥ २० | सूर्यदेवको आते हुए देखकर कुन्ती आश्चर्यचकित हो गयी। वह सुन्दरी काँपती हुई तत्काल रजोधर्मको प्राप्त हो गयी॥ २०॥ |
| कृताञ्जलिः स्थिता सूर्यं बभाषे चारुलोचना।<br>सुप्रीता दर्शनेनाद्य गच्छ त्वं निजमण्डलम्॥ २१ | उस समय सुन्दर नेत्रवाली कुन्ती हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी और सूर्यसे बोली—मैं आपके दर्शनसे प्रसन्न हो गयी; अब आप अपने मण्डलको चले जाइये॥ २१॥ |
| सूर्य उवाच<br>आहूतोऽस्मि कथं कुन्ति त्वया मन्त्रबलेन वै।<br>न मां भजसि कस्मात्त्वं समाहूय पुरोगतम् ॥ २२ | सूर्य बोले—हे कुन्ति! तुमने मन्त्रबलसे मुझे क्यों बुलाया है? तुम मुझे बुला करके भी अपने समक्ष उपस्थित मुझ सूर्यकी सेवा क्यों नहीं करती?॥ २२॥ |
| कामार्तोऽस्म्यसितापाङ्गि भज मां भावसंयुतम्।<br>मन्त्रेणाधीनतां प्राप्तं क्रीडितुं नय मामिति ॥ २३ | हे चारुलोचने! मैं इस समय कामार्त हूँ, अतः प्रेमके साथ मेरा सेवन करो। मन्त्रके द्वारा अधीनताको प्राप्त मुझको तुम विहार करनेके लिये ले चलो॥ २३॥ |
| कुन्त्युवाच<br>कन्यास्म्यहं तु धर्मज्ञ सर्वसाक्षिन्नमाम्यहम्।<br>तवाप्यहं न दुर्वाच्या कुलकन्यास्मि सुव्रत ॥ २४ | कुन्ती बोली—हे धर्मज्ञ! मैं अभी कन्या हूँ। हे सर्वसाक्षिन्! मैं आपको प्रणाम करती हूँ। हे सुव्रत! आप मेरे प्रति अनुचित बातें न कहें; क्योंकि मैं कुलीन कन्या हूँ॥ २४॥ |
| सूर्य उवाच<br>लज्जा मे महती चाद्य यदि गच्छाम्यहं वृथा।<br>वाच्यतां सर्वदेवानां यास्याम्यत्र न संशयः ॥ २५ | सूर्य बोले—यदि मैं इस समय व्यर्थ लौट जाता हूँ तो मेरे लिये बड़ी लज्जाकी बात होगी और मैं सभी देवताओंमें निन्दाका पात्र बनूँगा; इसमें संशय नहीं है॥ २५॥ |
| शप्स्यामि तं द्विजं चाद्य येन मन्त्रः समर्पितः।<br>त्वां चापि सुभृशं कुन्ति नोचेन्मां त्वं भजिष्यसि ॥ २६<br><br>कन्याधर्मः स्थिरस्ते स्यान्न ज्ञास्यन्ति जनाः किल।<br>मत्समस्तु तथा पुत्रो भविता ते वरानने॥ २७ | हे कुन्ति! यदि तुम मेरे साथ रमण नहीं करोगी तो मैं तुम्हें तथा उस मुनिको शाप दे दूँगा, जिसने तुम्हें वह मन्त्र बताया है। हे सुन्दरि! तुम्हारा कन्याधर्म स्थिर रहेगा। इस रहस्यको लोग नहीं जान सकेंगे तथा हे वरानने! मेरे समान ही तेजस्वी पुत्र तुमको प्राप्त होगा॥ २६-२७॥ |
| २०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इत्युक्त्वा तरणिः कुन्तीं तन्मनस्कां सुलज्जिताम्।<br>भुक्त्वा जगाम देवेशो वरं दत्त्वातिवाञ्छितम्॥ २८ | यह कहकर सूर्यदेव अपनी ओर आसक्त मनवाली एवं लज्जाशील उस कुन्तीसे संसर्ग करके तथा उसे मनोवांछित वरदान देकर चले गये॥ २८॥ |
| गर्भं दधार सुश्रोणी सुगुप्ते मन्दिरे स्थिता।<br>धात्री वेद प्रिया चैका न माता न जनस्तथा॥ २९ | इस प्रकार उस सुश्रोणी कुन्तीने गर्भ धारण किया और वह अत्यन्त गुप्त भवनमें रहने लगी। केवल उसकी एक प्रिय दासी ही इस रहस्यको जानती थी, कुन्तीके माता-पिता भी इसे नहीं जानते थे॥ २९॥ |
| गुप्तः सद्मनि पुत्रस्तु जातश्चातिमनोहरः।<br>कवचेनातिरम्येण कुण्डलाभ्यां समन्वितः॥ ३० | यथासमय उसी गुप्त भवनमें कुन्तीको एक अत्यन्त सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सुन्दर कवच तथा दो कुण्डलोंसे युक्त था और दूसरे सूर्य तथा कुमार कार्तिकेयके समान प्रतीत हो रहा था। धात्रीने उसे अपने हाथमें उठाकर लज्जायुक्त कुन्तीसे कहा—हे सुन्दरि! मैं यहाँ हूँ, अतः तुम किस बातकी चिन्ता कर रही हो?॥ ३०-३१ १/२॥ |
| द्वितीय इव सूर्यस्तु कुमार इव चापरः।<br>करे कृत्वाथ धात्रेयी तामुवाच सुलज्जिताम्॥ ३१ | |
| कां चिन्तां करभोरु त्वमाधत्सेऽद्य स्थितास्म्यहम्।<br>मञ्जूषायां सुतं कुन्ती मुञ्चन्ती वाक्यमब्रवीत्॥ ३२ | तत्पश्चात् काष्ठमञ्जूषामें पुत्रको छोड़ती हुई कुन्ती कहने लगी—हे पुत्र! मैं क्या करूँ? मैं अत्यन्त दुःखित हूँ, जो कि तुझ प्राणप्रियको त्याग रही हूँ। मैं अभागिन तुझ सर्वलक्षणसम्पन्नका परित्याग कर दे रही हूँ॥ ३२-३३॥ |
| किं करोमि सुतातार्हं त्यजे त्वां प्राणवल्लभम्।<br>मन्दभाग्या त्यजामि त्वां सर्वलक्षणसंयुतम्॥ ३३ | |
| पातु त्वां सगुणागुणा भगवती सर्वेश्वरी चाम्बिका<br>स्तन्यं सैव ददातु विश्वजननी कात्यायनी कामदा।<br>द्रक्ष्येऽहं मुखपङ्कजं सुललितं प्राणप्रियार्हं कदा<br>त्यक्त्वा त्वां विजने वने रविसुतं दुष्टा यथा स्वैरिणी॥ ३४ | सगुणा, निर्गुणा तथा सबकी स्वामिनी वे भगवती अम्बिका तुम्हारी रक्षा करें। वे जगज्जननी कामप्रदा कात्यायनी तुम्हें दुग्धपान करायें। हे पुत्र! तुम साक्षात् सूर्यनारायणके पुत्र हो और मेरे प्राणप्रिय हो—ऐसे तुमको इस निर्जन वनमें एक दुष्ट तथा कुलटा स्त्रीकी भाँति छोड़कर मैं कब तुम्हारा अति सुन्दर मुखकमल देख पाऊँगी॥ ३४॥ |
| पूर्वस्मिन्नपि जन्मनि त्रिजगतां माता न चाराधिता<br>न ध्यातं पदपङ्कजं सुखकरं देव्याः शिवायाश्चिरम्।<br>तेनाहं सुत दुर्भगास्मि सततं त्यक्त्वा पुनस्त्वां वने<br>तप्स्यामि प्रिय पातकं स्मृतवती बुद्ध्या कृतं यत्स्वयम्॥ ३५ | हे पुत्र! प्रतीत होता है कि मैंने पूर्वजन्ममें भी तीनों लोकोंकी जननी भगवतीकी आराधना नहीं की थी तथा भगवती शिवाके सुखदायक चरणकमलका भी मैंने कभी ध्यान नहीं किया था; इसी कारण मैं सदा अभागिनी हूँ। हे प्रिय! मैं तुम्हें इस वनमें त्यागकर जान-बूझकर स्वयं किये गये इस पापका स्मरण करती हुई सन्ताप सहूँगी॥ ३५॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा तं सुतं कुन्ती मञ्जूषायां धृतं किल।<br>धात्रीहस्ते ददौ भीता जनदर्शनतस्तथा॥ ३६ | सूतजी बोले— इस प्रकार कहकर कुन्तीने मंजूषामें रखे हुए उस पुत्रको लोगोंकी दृष्टिसे बचाते हुए भयभीतभावसे धात्रीके हाथमें दे दिया॥ ३६॥ |
| अ० ६ ] | द्वितीय स्कन्ध | २०५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्नात्वा त्रस्ता तदा कुन्ती पितृवेश्मन्युवास सा।<br>मञ्जूषा वहमाना च प्राप्ता ह्याधिरथेन वै॥ ३७<br>राधा सूतस्य भार्या वै तयाऽसौ प्रार्थितः सुतः।<br>कर्णोऽभूद् बलवान्वीरः पालितः सूतसद्मनि॥ ३८ | तत्पश्चात् स्नान करके भयभीत वह कुन्ती अपने पिताके घरमें रहने लगी। जलमें बहती हुई वह मंजूषा अधिरथ नामक सूतको प्राप्त हुई। उस सूतकी भार्या राधा थी। उसने बच्चेको माँग लिया। इस प्रकार सूतके घरमें पलकर वह कर्ण बलवान् तथा वीर हो गया॥ ३७-३८॥ |
| कुन्ती विवाहिता कन्या पाण्डुना सा स्वयंवरे।<br>माद्री चैवापरा भार्या मद्रराजसुता शुभा॥ ३९ | इसके बाद स्वयंवरमें कुन्तीका विवाह पाण्डुके साथ हुआ। उनकी दूसरी पत्नी मद्रदेशके राजाकी सुलक्षणा कन्या माद्री थी॥ ३९॥ |
| मृगयां रममाणस्तु वने पाण्डुर्महाबलः।<br>जघान मृगबुद्ध्या तु रममाणं मुनिं वने॥ ४०<br>शप्तस्तेन तदा पाण्डुर्मुनिना कुपितेन च।<br>स्त्रीसङ्गं यदि कर्तासि तदा ते मरणं ध्रुवम्॥ ४१ | एक बार वनमें आखेट करनेमें तत्पर महाबली पाण्डुने मृग समझकर रमण करते हुए एक मुनिपर प्रहार कर दिया। तब उस कुपित मुनिने पाण्डुको शाप दे दिया कि यदि तुम स्त्रीके साथ संसर्ग करोगे तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है॥ ४०-४१॥ |
| इति शप्तस्तु मुनिना पाण्डुः शोकसमान्वितः।<br>त्यक्त्वा राज्यं वने वासं चकार भृशदुःखितः॥ ४२ | मुनिके यह शाप दे देनेपर पाण्डु शोकाकुल हो गये। वे राज्य त्यागकर अत्यन्त दुःखित हो वनमें रहने लगे॥ ४२॥ |
| कुन्ती माद्री च भार्ये द्वे जग्मतुः सह सङ्गते।<br>सेवनार्थं सतीधर्मं संश्रिते मुनिसत्तमाः॥ ४३ | हे मुनिवरो! उनकी दोनों पत्नियाँ माद्री और कुन्ती भी सतीधर्मका आश्रय लेकर उनकी सेवा करनेके लिये उनके साथ ही वनमें चली गयीं॥ ४३॥ |
| गङ्गातीरे स्थितः पाण्डुर्मुनीनामाश्रमेषु च।<br>शृण्वानो धर्मशास्त्राणि चकार दुश्चरं तपः॥ ४४ | राजा पाण्डु गङ्गाजीके तटपर मुनियोंके आश्रमोंमें रहने लगे और धर्मशास्त्रोंका श्रवण करते हुए कठिन तपस्या करने लगे॥ ४४॥ |
| कथायां वर्तमानायां कदाचिद्धर्मसंश्रितम्।<br>अशृणोद्वचनं राजा सुपृष्टं मुनिभाषितम्॥ ४५<br>अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गे गन्तुं परन्तप।<br>येन केनाप्युपायेन पुत्रस्य जननं चरेत्॥ ४६ | किसी समय कथाप्रसंगमें सम्यक् प्रकारसे पूछनेपर किसी मुनिके द्वारा कहा गया यह धार्मिक वचन राजाने सुना—हे परन्तप! अपुत्रकी गति नहीं होती; वह स्वर्ग जानेका अधिकारी नहीं होता अतएव जिस किसी भी उपायसे पुत्र उत्पन्न करना चाहिये॥ ४५-४६॥ |
| अंशजः पुत्रिकापुत्रः क्षेत्रजो गोलकस्तथा।<br>कुण्डः सहोढः कानीनः क्रीतः प्राप्तस्तथा वने॥ ४७<br>दत्तः केनापि चाशक्तौ धनग्राहिसुताः स्मृताः।<br>उत्तरोत्तरतः पुत्रा निकृष्टा इति निश्चयः॥ ४८ | अंशज, पुत्रिकापुत्र, क्षेत्रज , गोलक, कुण्ड, सहोढ, कानीन, क्रीत, वनमें प्राप्त, पालन करनेमें असमर्थ किसीका दिया हुआ—इतने प्रकारके पुत्र पिताकी सम्पत्तिके उत्तराधिकारी कहे गये हैं, इनमें उत्तरोत्तर एक दूसरेसे निकृष्ट पुत्र हैं; यह सुनिश्चित है॥ ४७-४८॥ |
| २०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
|---|
| इत्याकर्ण्य तदा प्राह कुन्तीं कमललोचनाम्।<br>सुतमुत्पादयाशु त्वं मुनिं गत्वा तपोऽन्वितम्॥ ४९<br>ममाज्ञया न दोषस्ते पुरा राज्ञा महात्मना।<br>वसिष्ठाज्जनितः पुत्रः सौदासेनेति मे श्रुतम्॥ ५० | यह सुनकर राजा पाण्डुने कमलके समान नेत्रवाली कुन्तीसे कहा—तुम किसी तपोनिष्ठ मुनिके पास जाकर शीघ्र पुत्र उत्पन्न करो। मेरी आज्ञा होनेके कारण तुम्हें दोष नहीं लगेगा। मैंने सुना है कि पूर्वकालमें महात्मा राजा सौदासेने वसिष्ठसे पुत्र उत्पन्न कराया था॥ ४९-५०॥ | | तं कुन्ती वचनं प्राह मम मन्त्रोऽस्ति कामदः।<br>दत्तो दुर्वाससा पूर्वं सिद्धिदः सर्वथा प्रभो॥ ५१ | कुन्ती उनसे यह वचन बोली—सभी कामनाएँ पूर्ण करनेवाला एक मन्त्र मेरे पास है। हे प्रभो! पूर्वकालमें महर्षि दुर्वासाने सिद्धि प्रदान करनेवाला वह मन्त्र मुझे प्रदान किया था॥ ५१॥ | | निमन्त्रयेऽहं यं देवं मन्त्रेणानेन पार्थिव।<br>आगच्छेत्सर्वथासौ वै मम पार्श्वं निमन्त्रितः॥ ५२ | हे राजन्! मैं इस मन्त्रद्वारा जिस देवताका आवाहन करूँगी, वह निमन्त्रित होकर निश्चय ही मेरे पास आ जायगा॥ ५२॥ | | भर्तुर्वाक्येन सा तत्र स्मृत्वा धर्मं सुरोत्तमम्।<br>सङ्गम्य सुषुवे पुत्रं प्रथमं च युधिष्ठिरम्॥ ५३ | पतिकी आज्ञासे वहाँ कुन्तीने देवताओंमें श्रेष्ठ धर्मराजका स्मरण करके उनके संयोगसे सर्वप्रथम युधिष्ठिरको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया॥ ५३॥ | | वायोर्वृकोदरं पुत्रं जिष्णुं चैव शतक्रतोः।<br>वर्षे वर्षे त्रयः पुत्राः कुन्त्या जाता महाबलाः॥ ५४ | तत्पश्चात् उसने वायुके द्वारा भीमको और इन्द्रके द्वारा अर्जुनको उत्पन्न किया। इस प्रकार एक-एक वर्षके अन्तरालमें कुन्तीके तीन महाबली पुत्र उत्पन्न हुए॥ ५४॥ | | माद्री प्राह पतिं पाण्डुं पुत्रं मे कुरु सत्तम।<br>किं करोमि महाराज दुःखं नाशय मे प्रभो॥ ५५ | इसके बाद माद्रीने भी अपने पति पाण्डुसे कहा—हे श्रेष्ठ! मुझे भी पुत्र प्रदान कीजिये। हे महाराज! मैं क्या करूँ? हे प्रभो! मेरा दुःख दूर कीजिये॥ ५५॥ | | प्रार्थिता पतिना कुन्ती ददौ मन्त्रं दयान्विता।<br>एकपुत्रप्रबन्धेन माद्री पतिमते स्थिता॥ ५६<br>स्मृत्वा तदाश्विनौ देवौ मद्रराजसुता सुतौ।<br>नकुलः सहदेवश्च सुषुवे वरवर्णिनी॥ ५७ | तब पति पाण्डुके प्रार्थना करनेपर दयालु कुन्तीने वह मन्त्र माद्रीको बता दिया। सुन्दरी माद्रीने भी एक पुत्रकी प्राप्तिके लिये पतिसे अनुमति पाकर अश्विनीकुमारोंका स्मरण करके नकुल और सहदेव नामक दो पुत्र उत्पन्न किये॥ ५६-५७॥ | | एवं ते पाण्डवाः पञ्च क्षेत्रोत्पन्नाः सुरात्मजाः।<br>वर्षवर्षान्तरे जाता वने तस्मिन्द्विजोत्तमाः॥ ५८ | हे मुनिवरो! इस प्रकार वे पाँचों पाण्डव देवताओंके पुत्र थे। वे क्षेत्रज पुत्रके रूपमें उस वनमें क्रमशः एक-एक वर्षके अन्तरसे उत्पन्न हुए॥ ५८॥ | | एकस्मिन्समये पाण्डुर्माद्रीं दृष्ट्वाथ निर्जने।<br>आश्रम चातिकामातों जग्राहागतवैशसः॥ ५९ | एक बार राजा पाण्डुने माद्रीको निर्जन आश्रममें देखकर अपनी मृत्यु निकट आयी होनेके कारण अत्यन्त कामातुर हो पकड़ लिया। माद्रीके द्वारा 'नहीं-नहीं'—ऐसा कहकर बार-बार निषेध करनेपर |
अ० ६ ] द्वितीय स्कन्ध २०७
अ० ६ ] द्वितीय स्कन्ध २०७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मा मा मा मेति बहुधा निषिद्धोऽपि तया भृशम्।<br>आलिलिङ्ग प्रियां दैवात्पपात धरणीतले॥ ६० | भी उन्होंने बलपूर्वक अपनी उस प्रियाका आलिंगन कर लिया और वे दैववश [शापके कारण] पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ५९-६०॥ |
| यथा वृक्षगता वल्ली छिन्ने पतति वै द्रुमे।<br>तथा सा पतिता बाला कुर्वन्ती रोदनं बहु॥ ६१ | जैसे वृक्षपर चढ़ी हुई लता वृक्षके कट जानेपर गिर पड़ती है, वैसे ही वह रानी माद्री भी बहुत रुदन करती हुई गिर पड़ी॥ ६१॥ |
| प्रत्यागता तदा कुन्ती रुदती बालकास्तथा।<br>मुनयश्च महाभागाः श्रुत्वा कोलाहलं तदा॥ ६२ | उस समय कोलाहल सुनकर रोती हुई कुन्ती, सभी बालक और महाभाग मुनिगण भी वहाँ आ गये॥ ६२॥ |
| मृतः पाण्डुस्तदा सर्वे मुनयः संशितव्रताः।<br>सहाग्निभिर्विधिं कृत्वा गङ्गातीरे तदादहन्॥ ६३<br>चक्रे सहैव गमनं माद्री दत्त्वा सुतौ शिशू।<br>कुन्त्यै धर्मं पुरस्कृत्य सतीनां सत्यकामतः॥ ६४ | इस प्रकार जब पाण्डु मर गये, तब सभी व्रतधारी मुनियोंने गंगाके तटपर चिता लगाकर उनका दाह-संस्कार कर दिया। तत्पश्चात् अपने दोनों पुत्र कुन्तीको सौंप करके सती-धर्मका पालन करते हुए वह माद्री सत्यकी कामनासे उनके साथ ही सती हो गयी॥ ६३-६४॥ |
| जलदानादिकं कृत्वा मुनयस्तत्र वासिनः।<br>पञ्चपुत्रयुतां कुन्तीमनयन्हस्तिनापुरम्॥ ६५ | वहाँके निवासी मुनिगण जलांजलि आदि देकर पाँचों पुत्रोंसहित कुन्तीको हस्तिनापुर ले आये॥ ६५॥ |
| तां प्राप्तां च समाज्ञाय गाङ्गेयो विदुरस्तथा।<br>नगरीं धृतराष्ट्रस्य सर्वे तत्र समाययुः॥ ६६ | धृतराष्ट्रकी नगरी हस्तिनापुरमें कुन्तीके आनेका समाचार पाकर भीष्म, विदुर आदि सभी लोग वहाँ आ पहुँचे॥ ६६॥ |
| पप्रच्छुश्च जनाः सर्वे कस्य पुत्रा वरानने।<br>पाण्डोः शापं समाज्ञाय कुन्ती दुःखान्विता तदा॥ ६७<br>तानुवाच सुराणां वै पुत्राः कुरुकुलोद्भवाः।<br>विश्वासार्थं समाहूताः कुन्त्या सर्वे सुरास्तदा॥ ६८<br>आगत्य खे तदा तैस्तु कथितं नः सुताः किल।<br>भीष्मेण सत्कृतं वाक्यं देवानां सत्कृताः सुताः॥ ६९ | सभी लोगोंने कुन्तीसे पूछा—हे सुमुखि! ये किसके पुत्र हैं? तब कुन्ती अत्यन्त दुःखित होकर पाण्डुकी शापजन्य मृत्युका उल्लेख करके बोली—कुरुवंशमें उत्पन्न हुए ये सब बालक देवताओंके पुत्र हैं। उन्हें विश्वास दिलानेके लिये कुन्तीने उस समय सभी देवताओंका आह्वान भी किया, तब उन देवताओंने आकाशमें प्रकट होकर कहा—ये पाँचों निःसन्देह हमलोगोंके पुत्र हैं। भीष्मने देवताओंके वचनका अनुमोदन किया तथा कुन्तीके पाँचों पुत्रोंका स्वागत किया॥ ६७-६९॥ |
| गता नागपुरं सर्वे तानादाय सुतान्वधूम्।<br>भीष्मादयः प्रीतचित्ताः पालयामासुरर्थतः॥ ७०<br>एवं पार्थाः समुत्पन्ना गाङ्गेयेनाथ पालिताः॥ ७१ | तत्पश्चात् उन पुत्रों तथा वधू कुन्तीको लेकर भीष्म आदि सभी लोग हस्तिनापुर चले गये और प्रसन्नचित्त होकर प्रयत्नपूर्वक उनका पालन-पोषण करने लगे। इस प्रकार पाण्डव उत्पन्न हुए और भीष्मने उनका परिपालन किया॥ ७०-७१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे युधिष्ठिरादीनामुत्पत्तिवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
२०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७
अथ सप्तमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरसे दुर्योधनके पिण्डदानहेतु धन माँगना, भीमसेनका प्रतिरोध; धृतराष्ट्र, गान्धारी, कुन्ती, विदुर और संजयका वनके लिये प्रस्थान, वनवासी धृतराष्ट्र तथा माता कुन्तीसे मिलनेके लिये युधिष्ठिरका भाइयोंके साथ वनगमन, विदुरका महाप्रयाण, धृतराष्ट्रसहित पाण्डवोंका व्यासजीके आश्रमपर आना, देवीकी कृपासे व्यासजीद्वारा महाभारत-युद्धमें मरे कौरवों-पाण्डवोंके परिजनोंको बुला देना
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| पञ्चानां द्रौपदी भार्या सा मान्या सा पतिव्रता।<br>पञ्च पुत्रास्तु तस्याः स्युर्भर्तृभ्योऽतीव सुन्दराः ॥ १ | [हे मुनिगण!] माननीया द्रौपदी उन पाँचों पाण्डवोंकी पतिव्रता पत्नी थी। उन द्रौपदीको अत्यन्त सुन्दर पाँच पुत्र उन पतियोंसे उत्पन्न हुए॥ १॥ |
| अर्जुनस्य तथा भार्या कृष्णस्य भगिनी शुभा।<br>सुभद्रा या हृता पूर्वं जिष्णुना हरिसम्मते ॥ २ | अर्जुनकी एक दूसरी सुन्दर पत्नी श्रीकृष्णकी बहन सुभद्रा थीं, जिन्हें अर्जुनने पूर्वकालमें भगवान् श्रीकृष्णकी अनुमतिसे हर लिया था॥ २॥ |
| तस्यां जातो महावीरो निहतोऽसौ रणाजिरे।<br>अभिमन्युर्हतास्तत्र द्रौपद्याश्च सुताः किल ॥ ३ | उन्हीं सुभद्राके गर्भसे महान् वीर अभिमन्युका जन्म हुआ। वह संग्राम-भूमिमें मारा गया था। उसी युद्धमें द्रौपदीके पाँचों पुत्र भी मारे गये थे॥ ३॥ |
| अभिमन्योर्वरा भार्या वैराटी चातिसुन्दरी।<br>कुलान्ते सुषुवे पुत्रं मृतो बाणाग्निना शिशुः ॥ ४<br><br>जीवितः स तु कृष्णेन भागिनेयसुतः स्वयम्।<br>द्रौणिबाणाग्निनिर्दग्धः प्रतापेनाद्भुतेन च ॥ ५ | वीर अभिमन्युकी श्रेष्ठ तथा अत्यन्त सुन्दर पत्नी महाराज विराटकी पुत्री उत्तरा थी। [महाभारतके युद्धमें] कुरुकुलका नाश हो जानेपर उसने एक पुत्र उत्पन्न किया था; वह द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी बाणाग्निसे [पहले गर्भमें ही] मर गया था, किंतु बादमें भगवान् श्रीकृष्णने अश्वत्थामाकी बाणाग्निसे निर्दग्ध अपने भांजेके पुत्रको अपने अद्भुत प्रतापसे पुनः जीवित कर दिया था॥ ४-५॥ |
| परिक्षीणेषु वंशेषु जातो यस्माद्वरः सुतः।<br>तस्मात्परीक्षितो नाम विख्यातः पृथिवीतले ॥ ६ | कुरुवंशके समाप्त होनेपर वह श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ था; इसलिये वह बालक ‘परीक्षित्’ नामसे पृथवीतलपर प्रसिद्ध हुआ॥ ६॥ |
| निहतेषु च पुत्रेषु धृतराष्ट्रोऽतिदुःखितः।<br>तस्थौ पाण्डवराज्ये च भीमवाग्बाणपीडितः ॥ ७<br><br>गान्धारी च तथातिष्ठत् पुत्रशोकातुरा भृशम्।<br>सेवां तयोर्दिवारात्रं चकारार्तो युधिष्ठिरः ॥ ८ | अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेपर अत्यन्त दुःखित राजा धृतराष्ट्र भीमके वाग्बाणोंसे सन्तप्त रहते हुए अब पाण्डवोंके राज्यमें रहने लगे। वैसे ही गान्धारी भी अत्यन्त दुःखी होकर जीवन-यापन करने लगी। दुःखित युधिष्ठिर दिन-रात उन दोनोंकी सेवा करने लगे॥ ७-८॥ |
| विदुरोऽप्यतिधर्मात्मा प्रज्ञानेत्रमबोधयत्।<br>युधिष्ठिरस्यानुमते भ्रातृपार्श्वे व्यतिष्ठत ॥ ९ | महान् धर्मात्मा विदुर युधिष्ठिरकी अनुमतिसे अपने भाई धृतराष्ट्रके पासमें ही रहते थे और वे उन प्रज्ञाचक्षुको समझाते-बुझाते रहते थे॥ ९॥ |
| अ० ७ ] | द्वितीय स्कन्ध | २०९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| धर्मपुत्रोऽपि धर्मात्मा चकार सेवनं पितुः।<br>पुत्रशोकोद्भवं दुःखं तस्य विस्मारयन्निव॥ १० | धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिर भी अपने पितातुल्य धृतराष्ट्रके पुत्रशोकजनित दुःखको विस्मारित कराते हुए उनकी सेवा करने लगे॥ १०॥ |
| यथा शृणोति वृद्धोऽसौ तथा भीमोऽतिरोषितः।<br>वाग्बाणेनाहनत्तं तु श्रावयन्संस्थिताञ्जनान्॥ ११<br>मया पुत्रा हताः सर्वे दुष्टस्यान्धस्य ते रणे।<br>दुःशासनस्य रुधिरं पीतं हृद्यं तथा भृशम्॥ १२<br>भुनक्ति पिण्डमन्धोऽयं मया दत्तं गतत्रपः।<br>ध्वांक्षवद्वा श्ववच्चापि वृथा जीवत्यसौ जनः॥ १३ | जिस किसी भी प्रकार यह वृद्ध धृतराष्ट्र सुन ले [यह ध्यानमें रखकर] भीम अत्यन्त क्रोधित होकर अपने वचनरूपी बाणोंसे उनपर सर्वदा प्रहार किया करते थे। वहाँ उपस्थित लोगोंको सुना-सुनाकर भीम कहा करते थे कि मैंने इस दुष्ट अन्धेके सभी पुत्रोंको रणभूमिमें मार डाला और दुःशासनके हृदयका रक्त जी-भरके पी लिया है। अब यह अन्धा निर्लज्ज होकर मेरे दिये हुए पिण्डको कौओं एवं कुत्तोंकी भाँति खाता है। अब तो यह व्यर्थ ही जीवन बिता रहा है॥ ११-१३॥ |
| एवंविधानि रूक्षाणि श्रावयत्यनुवासरम्।<br>आश्वासयति धर्मात्मा मूर्खोऽयमिति च ब्रुवन्॥ १४ | भीम इस प्रकारकी कठोर बातें प्रतिदिन उन्हें सुनाते थे; परंतु धर्मात्मा युधिष्ठिर यह कहते हुए धृतराष्ट्रको धैर्य प्रदान करते थे कि यह भीम मूर्ख है॥ १४॥ |
| अष्टादशैव वर्षाणि स्थित्वा तत्रैव दुःखितः।<br>धृतराष्ट्रो वने यानं प्रार्थयामास धर्मजम्॥ १५<br>अयाचत धर्मपुत्रं धृतराष्ट्रो महीपतिः।<br>पुत्रेभ्योऽहं प्रदाम्यद्य निर्वापं विधिपूर्वकम्॥ १६<br>वृकोदरेण सर्वेषां कृतमत्रौर्ध्वदैहिकम्।<br>न कृतं मम पुत्राणां पूर्ववैरमनुस्मरन्॥ १७<br>ददासि चेद्धनं मह्यं कृत्वा चैवौर्ध्वदैहिकम्।<br>गमिष्येऽहं वनं तप्तुं तपः स्वर्गफलप्रदम्॥ १८ | इस प्रकार उस दुःखी धृतराष्ट्रने अठारह वर्षतक वहाँ रहकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे वनमें जानेकी इच्छा प्रकट की। महाराज धृतराष्ट्रने धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे यह भी प्रार्थना की कि अब मैं अपने पुत्रोंके लिये विधि-पूर्वक पिण्डदान करूँगा। यद्यपि भीमने सभीका और्ध्वदैहिककर्म कर दिया था, किंतु पूर्व वैरका स्मरण करते हुए उन्होंने मेरे पुत्रोंका नहीं किया। अतः यदि आप मुझे कुछ धन दें तो मैं अपने पुत्रोंका और्ध्वदैहिककर्म करके स्वर्गफल देनेवाला तप करनेके लिये वनमें चला जाऊँगा॥ १५-१८॥ |
| एकान्ते विदुरेणोक्तो राजा धर्मसुतः शुचिः।<br>धनं दातुं मनश्चक्रे धृतराष्ट्राय चार्थिने॥ १९<br>समाहूय निजान्सर्वानुवाच पृथिवीपतिः।<br>धनं दास्ये महाभागाः पित्रे निर्वापकामिने॥ २० | विदुरने भी एकान्तमें पवित्रात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे जब ऐसा कहा तब उन्होंने धनार्थी धृतराष्ट्रको धन देनेका निश्चय कर लिया। राजा युधिष्ठिरने परिवारके सभी जनोंको बुलाकर कहा— हे महाभाग ! मैं कौरवोंका श्राद्ध करनेके इच्छुक ज्येष्ठ पिताको धन प्रदान करूँगा॥ १९-२०॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं भ्रातुर्ज्येष्ठस्यामिततेजसः।<br>संग्रहेऽस्य महाबाहुर्मारुतिः कुपितोऽब्रवीत्॥ २१<br>धनं देयं महाभाग दुर्योधनहिताय किम्।<br>अन्धोऽपि सुखमाप्नोति मूर्खत्वं किमतः परम्॥ २२ | महातेजस्वी ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिरका वचन सुनकर वायुपुत्र महाबली भीमने अत्यन्त क्रोधित होकर कहा— हे महाभाग! दुर्योधनके कल्याणके लिये राजकोषका धन क्यों दिया जाय? इससे अन्धे धृतराष्ट्रको भी सुख मिलेगा; इससे बड़ी मूर्खता और क्या होगी ?॥ २१-२२॥ |
| २१० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तव दुर्मन्त्रितेनाथ दुःखं प्राप्ता वने वयम्।<br>द्रौपदी च महाभागा समानीता दुरात्मना॥ २३ | आपकी दूषित मन्त्रणाके फलस्वरूप ही हमलोगोंने वनवासका कठोर कष्ट सहा। दुरात्मा दुःशासन महारानी द्रौपदीको अपमानपूर्वक सभामें खींच लाया॥ २३॥ |
| विराटभवने वासः प्रसादात्तव सुव्रत।<br>दासत्वं च कृतं सर्वैर्मत्स्यस्यामितविक्रमैः॥ २४ | हे सुव्रत! आपकी कृपासे ही हमलोगोंको विराट राजाके घर रहना पड़ा तथा हम अमित पराक्रमवालोंको मत्स्यदेशके राजाकी दासता करनी पड़ी थी॥ २४॥ |
| देविता त्वं न चेज्ज्येष्ठः प्रभवेत्संक्षयः कथम्।<br>सूपकारो विराटस्य हत्वाभूवं तु मागधम्॥ २५ | हम सबमें ज्येष्ठ आप यदि जुआ न खेलते तो हम लोगोंकी दुर्गति क्यों होती? मगधनरेश जरासंधका वध करनेवाले मुझको राजा विराटके यहाँ रसोइया बनना पड़ा॥ २५॥ |
| बृहन्नला कथं जिष्णुर्भवेद् बालस्य नर्तकः।<br>कृत्वा वेषं महाबाहुर्योषाया वासवात्मजः॥ २६<br><br>गाण्डीवशोभितौ हस्तौ कृतौ कङ्कणशोभितौ।<br>मानुषं च वपुः प्राप्य किं दुःखं स्यादतः परम्॥ २७<br><br>दृष्ट्वा वेणीं कृतां मूर्ध्नि कज्जलं लोचने तथा।<br>असिं गृहीत्वा तरसा छेत्स्यहं नान्यथा सुखम्॥ २८ | आपके ही कारण इन्द्रपुत्र महाबाहु अर्जुनको विराट राजाके यहाँ स्त्रीका रूप धारण करके उनके बच्चोंको नृत्यकी शिक्षा देनेके लिये बृहन्नला बनना पड़ा। गाण्डीव धनुषके स्थानपर अर्जुनको अपने हाथोंमें कंकण धारण करना पड़ा। मनुष्यका शरीर पाकर भला इससे बड़ा कष्ट और क्या हो सकता है? अर्जुनके सिरपर चोटी और आँखोंमें काजलकी बातका स्मरण करके तो मनमें यही आता है कि मैं अभी तलवार लेकर शीघ्र ही धृतराष्ट्रका सिर काट दूँ; इसके अतिरिक्त मुझे शान्ति नहीं मिल सकती॥ २६—२८॥ |
| अपृष्ट्वा च महीपालं निक्षिप्तोऽग्निर्मया गृहे।<br>दग्धुकामश्च पापात्मा निर्दग्धोऽसौ पुरोचनः॥ २९ | आप महाराजसे बिना पूछे ही मैंने लाक्षागृहमें अग्नि लगा दी थी, जिससे हमलोगोंको जलानेकी इच्छावाला वह पापी पुरोचन स्वयं जल गया॥ २९॥ |
| कीचका निहताः सर्वे त्वामपृष्ट्वा जनाधिप।<br>न तथा निहताः सर्वे सभार्या धृतराष्ट्रजाः॥ ३० | हे राजन्! मैंने आपसे परामर्श किये बिना ही जैसे सभी कीचकोंका वध कर डाला, वैसे ही स्त्रियोंसमेत धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंका भी वध मैं नहीं कर पाया॥ ३०॥ |
| मूर्खत्वं तव राजेन्द्र गन्धर्वेभ्यश्च मोचिताः।<br>दुर्योधनादयः कामं शत्रवो निगडीकृताः॥ ३१ | हे राजेन्द्र! यह आपकी नासमझी ही थी कि जब गन्धर्वोंने दुर्योधन आदि हमारे शत्रुओंको बन्दी बना लिया था, तब आपने ही उन्हें छुड़ा दिया॥ ३१॥ |
| दुर्योधनहितायाद्य धनं दातुं त्वमिच्छसि।<br>नाहं ददे महीपाल सर्वथा प्रेरितस्त्वया॥ ३२ | हे राजन्! आज पुनः उसी दुष्ट दुर्योधनके कल्याणके लिये आप धन देनेकी इच्छा कर रहे हैं। आपके कहनेपर भी मैं उन्हें धन नहीं देने दूँगा॥ ३२॥ |
| इत्युक्त्वा निर्गते भीमे त्रिभिः परिवृतो नृपः।<br>ददौ वित्तं सुबहुलं धृतराष्ट्राय धर्मजः॥ ३३ | ऐसा कहकर भीमके चले जानेपर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने [अर्जुन, नकुल तथा सहदेव—इन] तीनोंकी सम्मति लेकर धृतराष्ट्रको बहुत-सा धन दे दिया॥ ३३॥ |
| अ० ७ ] | द्वितीय स्कन्ध | २११ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कारयामास विधिवत्पुत्राणां चौर्ध्वदैहिकम्।<br>ददौ दानानि विप्रेभ्यो धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः॥ ३४ | तब अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्रने धन लेकर अपने पुत्रोंका विधिवत् श्राद्धकर्म कराया और ब्राह्मणोंको विविध दान दिये॥ ३४॥ |
| कृत्वौर्ध्वदैहिकं सर्वं गान्धारीसहितो नृपः।<br>प्रविवेश वनं तूर्णं कुन्त्या च विदुरेण च॥ ३५ | इस प्रकार अपने पुत्रोंका श्राद्धकर्म करके गान्धारीसहित महाराज धृतराष्ट्र कुन्ती तथा विदुरके साथ शीघ्र ही वनमें चले गये॥ ३५॥ |
| सञ्जयेन परिज्ञातो निर्गतोऽसौ महामतिः।<br>पुत्रैर्निवार्यमाणापि शूरसेनसुता गता॥ ३६ | संजयद्वारा सबको यह समाचार मिला कि महामति धृतराष्ट्र वनमें जा रहे हैं, उस समय अपने पुत्रोंके मना करनेपर भी शूरसेनकी पुत्री कुन्ती उनके साथ चली गयी॥ ३६॥ |
| विलपन्भीमसेनोऽपि तथान्ये चापि कौरवाः।<br>गङ्गातीरात्परावृत्य ययुः सर्वे गजाह्वयम्॥ ३७ | यह देखकर भीम भी रोने लगे। वे तथा अन्यान्य सभी कौरव उन लोगोंको गंगातटतक पहुँचाकर पुनः हस्तिनापुरको लौट आये॥ ३७॥ |
| ते गत्वा जाह्नवतीरे शतयूपाश्रमं शुभम्।<br>कृत्वा तृणैः कुटीं तत्र तपस्तेपुः समाहिताः॥ ३८ | तत्पश्चात् धृतराष्ट्र आदि गंगातटपर स्थित शुभ शतयूप-आश्रममें पहुँचे और वहाँ पर्णकुटी बनाकर एकचित्त हो तपस्या करने लगे॥ ३८॥ |
| गतान्यब्दानि षट् तेषां यदा याता हि तापसाः।<br>युधिष्ठिरस्तु विरहादनुजानिदमब्रवीत्॥ ३९<br><br>स्वप्ने दृष्टा मया कुन्ती दुर्बला वनसंस्थिता।<br>मनो मे जायते द्रष्टुं मातरं पितरौ तथा॥ ४०<br><br>विदुरं च महात्मानं सञ्जयं च महामतिम्।<br>रोचते यदि वः सर्वान् व्रजाम इति मे मतिः॥ ४१ | जब वे तपस्वी चले गये और इस प्रकार छः वर्ष बीत गये, तब उनके विरहसे सन्तप्त युधिष्ठिर अपने भाइयोंसे कहने लगे—मैंने स्वप्न देखा है कि वनमें रहती हुई माता कुन्ती अत्यन्त दुर्बल हो गयी हैं, अतः माता तथा पितृजनोंको देखनेकी मनमें इच्छा हो रही है। साथ ही महात्मा विदुर तथा महाबुद्धिमान् संजयसे भी मिलनेकी मेरी इच्छा है। यदि आप लोगोंको भी यह उचित प्रतीत होता हो तो हमलोग वहाँ चलें—ऐसा मेरा विचार है॥ ३९-४१॥ |
| ततस्ते भ्रातरः सर्वे सुभद्रा द्रौपदी तथा।<br>वैराटी च महाभागा तथा नागरिको जनः॥ ४२<br><br>प्राप्ताः सर्वजनैः सार्धं पाण्डवा दर्शनोत्सुकाः।<br>शतयूपाश्रमं प्राप्य ददृशुः सर्व एव ते॥ ४३ | तब वे सभी भाई, सुभद्रा, द्रौपदी, महाभागा उत्तरा तथा अन्यान्य नागरिकजन वहाँ एकत्र हुए। दर्शनके लिये उत्सुक उन पाण्डवोंने सभी लोगोंके साथ शतयूप-आश्रममें जाकर धृतराष्ट्र आदिको देखा॥ ४२-४३॥ |
| विदुरो न यदा दृष्टो धर्मस्तं पृष्टवांस्तदा।<br>क्वास्ते स विदुरो धीमांस्तमुवाचाम्बिकासुतः॥ ४४<br><br>विरक्तश्चरते क्षत्ता निरीहो निष्परिग्रहः।<br>कुतोऽप्येकान्तसंवासी ध्यायतेऽन्तः सनातनम्॥ ४५ | वहाँ जब विदुरजी दिखायी नहीं दिये, तब धर्मराज युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रसे पूछा—वे बुद्धिमान् विदुरजी कहाँ हैं? तब अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्रने उनसे कहा—विदुर तो विरक्त एवं निष्काम होकर तथा सब कुछ त्यागकर कहीं एकान्तमें रहते हुए अन्तःकरणमें परमात्माका ध्यान कर रहे होंगे॥ ४४-४५॥ |
| २९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| गङ्गां गच्छन्द्वितीयेऽह्नि वने राजा युधिष्ठिरः।<br>ददर्श विदुरं क्षामं तपसा संशितव्रतम्॥ ४६<br><br>दृष्ट्वोवाच महीपालो वन्देऽहं त्वां युधिष्ठिरः।<br>तस्थौ श्रुत्वा च विदुरः स्थाणुभूत इवानघः॥ ४७ | दूसरे दिन गंगाजीकी ओर जाते हुए युधिष्ठिरने वनमें तपस्याके कारण क्षीण देहवाले व्रतधारी विदुरजीको देखा। उन्हें देखकर महाराज युधिष्ठिरने कहा—मैं आपको प्रणाम करता हूँ। यह सुनकर भी निष्पाप विदुरजी ठूँठवृक्षके समान अचल स्थित रहे॥ ४६-४७॥ |
| क्षणेन विदुरस्यास्यान्निःसृतं तेज अद्भुतम्।<br>लीनं युधिष्ठिरस्यास्ये धर्मांशत्वात्परस्परम्॥ ४८ | उसी क्षण विदुरजीके मुखसे एक अद्भुत तेज निकला और वह तत्काल युधिष्ठिरके मुखमें समा गया; क्योंकि वे दोनों ही धर्मके अंश थे॥ ४८॥ |
| क्षत्ता जहाँ तदा प्राणाञ्छुशोचाति युधिष्ठिरः।<br>दाहार्थं तस्य देहस्य कृतवानुद्यमं नृपः॥ ४९ | इस प्रकार विदुरजीने प्राणत्याग कर दिया और युधिष्ठिर अत्यन्त शोकाकुल हो गये। वे राजा युधिष्ठिर उनके शरीरका दाह-संस्कार करनेका प्रबन्ध करने लगे॥ ४९॥ |
| शृण्वतस्तु तदा राज्ञो वागुवाचाशरीरिणी।<br>विरक्तोऽयं न दाहार्हो यथेष्टं गच्छ भूपते॥ ५० | उसी समय राजाको सुनाते हुए आकाशवाणी हुई—हे राजन्! ये विदुरजी विरक्त हैं, अतः ये दाह-संस्कारके योग्य नहीं हैं। अब आप इच्छानुसार यहाँसे प्रस्थान करें॥ ५०॥ |
| श्रुत्वा ते भ्रातरः सर्वे सस्नुर्गङ्गाजलेऽमले।<br>गत्वा निवेदयामासुर्धृतराष्ट्राय विस्तरात्॥ ५१ | यह सुनकर उन सभी भाइयोंने गंगाके निर्मल जलमें स्नान किया और वहाँ जाकर धृतराष्ट्रसे [सभी वृत्तान्त] विस्तारपूर्वक बताया॥ ५१॥ |
| स्थितास्तत्राश्रमे सर्वे पाण्डवा नागरैः सह।<br>तत्र सत्यवतीसूनुर्नारदश्च समागतः॥ ५२<br><br>मुनयोऽन्ये महात्मानश्चागता धर्मनन्दनम्।<br>कुन्ती प्राह तदा व्यासं संस्थितं शुभदर्शनम्॥ ५३ | तत्पश्चात् सब पाण्डव नागरिकोंके साथ उस आश्रममें बैठ गये। उसी समय सत्यवतीपुत्र व्यासजी तथा नारदजी भी वहाँ पहुँच गये। अन्य मुनिगण भी वहाँ धर्मपुत्र युधिष्ठिरके पास आ गये। उस समय कुन्तीने वहाँ विराजमान शुभदर्शन व्यासजीसे कहा—॥ ५२-५३॥ |
| कृष्ण कर्णस्तु पुत्रो मे जातमात्रस्तु वीक्षितः।<br>मनो मे तप्यतेऽत्यर्थं दर्शयस्व तपोधन॥ ५४<br>समर्थोऽसि महाभाग कुरु मे वाञ्छितं प्रभो। | हे कृष्णद्वैपायन! मैंने अपने पुत्र कर्णको जन्मके समय ही देखा था। [उसे देखनेके लिये] मेरा मन बहुत तड़प रहा है, अतः हे तपोधन! मुझे उसको दिखा दीजिये। हे महाभाग! आप समर्थ हैं, अतः मेरी यह इच्छा पूर्ण कीजिये॥ ५४ १/२॥ |
| गान्धार्युवाच<br>दुर्योधनो रणेऽगच्छद्वीक्षितो न मया मुने॥ ५५<br><br>तं दर्शय मुनिश्रेष्ठ पुत्रं मे त्वं सहानुजम्। | गान्धारी बोली—हे मुने! दुर्योधन समरभूमिमें चला गया था और मैं उसे देख नहीं पायी। अतः हे मुनिश्रेष्ठ! छोटे भाइयोसहित उस दुर्योधनको आप मुझे दिखा दीजिये॥ ५५ १/२॥ |
| सुभद्रोवाच<br>अभिमन्युं महावीरं प्राणादप्यधिकं प्रियम्॥ ५६<br>द्रष्टुकामास्मि सर्वज्ञ दर्शयाद्य तपोधन। | सुभद्रा बोली—हे सर्वज्ञ! मैं प्राणोंसे भी अधिक प्रिय अपने महान् वीर पुत्र अभिमन्युको देखना चाहती हूँ। अतः हे तपोधन! उसे अभी दिखा दीजिये॥ ५६ १/२॥ |
| अ० ७ ] | द्वितीय स्कन्ध | २१३ |
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| सूत उवाच<br>एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वा सत्यवतीसुतः ॥ ५७<br>प्राणायामं ततः कृत्वा दध्यौ देवीं सनातनीम्।<br>सन्ध्याकालेऽथ सम्प्राप्ते गङ्गायां मुनिसत्तमः ॥ ५८<br>सर्वांस्तांश्च समाहूय युधिष्ठिरपुरोगमान्।<br>तुष्टाव विश्वजननीं स्नात्वा पुण्यसरिज्जले ॥ ५९<br>प्रकृतिं पुरुषारामां सगुणां निर्गुणां तथा।<br>देवदेवीं ब्रह्मरूपां मणिद्वीपाधिवासिनीम् ॥ ६० | सूतजी बोले— इस प्रकारके वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र व्यासजीने प्राणायाम करके सनातनी देवी भगवतीका ध्यान किया। तब सायंकाल आनेपर मुनिश्रेष्ठ व्यासजी युधिष्ठिर आदि सभी जनोंको गंगाजीके तटपर बुलाकर पुण्यनदी गंगाके पवित्र जलमें स्नान करके प्रकृतिस्वरूपिणी, परम पुरुषको प्रसन्न करनेवाली, सगुण-निर्गुणरूपा, देवताओंकी भी देवी, ब्रह्मस्वरूपिणी उन मणिद्वीपनिवासिनी भगवतीकी स्तुति करने लगे ॥ ५७—६० ॥ | | यदा न वेधा न च विष्णुरीश्वरो<br>न वासवो नैव जलाधिपस्तथा।<br>न वित्तपो नैव यमश्च पावक-<br>स्तदासि देवि त्वमहं नमामि ताम् ॥ ६१ | हे देवि! जब ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, इन्द्र, वरुण, कुबेर, यम तथा अग्नि—ये कोई भी नहीं थे, उस समय भी आपकी सत्ता थी; ऐसी उन आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६१ ॥ | | जलं न वायुर्न धरा न चाम्बरं<br>गुणा न तेषां च न चेन्द्रियाण्यहम्।<br>मनो न बुद्धिर्न च तिग्मगुः शशी<br>तदासि देवि त्वमहं नमामि ताम् ॥ ६२ | जिस समय जल, वायु, पृथ्वी, आकाश तथा उनके रस आदि गुण, समस्त इन्द्रियाँ, अहंकार, मन, बुद्धि, सूर्य तथा चन्द्रमा—ये कोई भी नहीं थे, तब भी आप विद्यमान थीं; ऐसी उन आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६२ ॥ | | इमं जीवलोकं समाधाय चित्ते<br>गुणैर्लिङ्गकोशं च नीत्वा समाधौ।<br>स्थिता कल्पकालं नयस्यात्मतन्त्रा<br>न कोऽप्यस्ति वेत्ता विवेकं गतोऽपि ॥ ६३ | इस जीवलोकको अपने चित्तमें समाहित करके सत्व-रज-तम आदि गुणोंसहित लिंग-कोशको समाधिकी अवस्थामें पहुँचाकर जब आप कल्पपर्यन्त स्वतन्त्र होकर विहार करती हैं, तब विवेकप्राप्त पुरुष भी आपको जाननेमें समर्थ नहीं होता ॥ ६३ ॥ | | प्रार्थयत्येष मां लोको मृतानां दर्शनं पुनः।<br>नाहं क्षमोऽस्मि मातस्त्वं दर्शयाशु जनान्मृतान् ॥ ६४ | हे माता! ये लोग मृत व्यक्तियोंके पुनः दर्शनके लिये मुझसे प्रार्थना कर रहे हैं, किंतु मैं ऐसा कर पानेमें समर्थ नहीं हूँ। अतएव आप इन्हें मृत व्यक्तियोंको शीघ्र ही दिखा दें ॥ ६४ ॥ | | सूत उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी माया श्रीभुवनेश्वरी।<br>स्वर्गादाहूय सर्वान्वै दर्शयामास पार्थिवान् ॥ ६५ | सूतजी बोले— व्यासजीके द्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर महामाया श्रीभुवनेश्वरी देवीने समस्त मृत राजाओंको स्वर्गसे बुलाकर दिखा दिया ॥ ६५ ॥ | | दृष्ट्वा कुन्ती च गान्धारी सुभद्रा च विराटजा।<br>पाण्डवा मुमुदुः सर्वे वीक्ष्य प्रत्यागतान्स्वकान् ॥ ६६ | कुन्ती, गान्धारी, सुभद्रा, विराटपुत्री उत्तरा एवं सभी पाण्डव वापस आये हुए स्वजनोंको देखकर प्रसन्न हो गये ॥ ६६ ॥ | | पुनर्विसर्जितास्तेन व्यासेनामिततेजसा।<br>स्मृत्वा देवीं महामायामिन्द्रजालमिवोद्यतम् ॥ ६७ | तदनन्तर अपरिमित तेजवाले व्यासजीने महामाया देवीका स्मरण करके इन्द्रजालकी भाँति प्रकट हुए उन सबको पुनः लौटा दिया ॥ ६७ ॥ |
| २१४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| तदा पृष्ट्वा ययुः सर्वे पाण्डवा मुनयस्तथा।<br>राजा नागपुरं प्राप्तः कुर्वन्व्यासकथां पथि॥ ६८ | तत्पश्चात् [धृतराष्ट्र आदि तापसोंसे] आज्ञा लेकर सभी पाण्डव तथा मुनिजन वहाँसे चल दिये। राजा युधिष्ठिर भी मार्गमें व्यासजीकी चर्चा करते हुए हस्तिनापुर आ गये॥ ६८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे पाण्डवानां कथानकं मृतानां दर्शनवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
अथाष्टमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र आदिका दावाग्निमें जल जाना, प्रभासक्षेत्रमें यादवोंका परस्पर युद्ध और संहार, कृष्ण और बलरामका परमधामगमन, परीक्षित्को राजा बनाकर पाण्डवोंका हिमालय-पर्वतपर जाना, परीक्षित्को शापकी प्राप्ति, प्रमद्वरा और रुरुका वृत्तान्त
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| ततो दिने तृतीये च धृतराष्ट्रः स भूपतिः।<br>दावाग्निना वने दग्धः सभार्यः कुन्तिसंयुतः॥ १ | वहाँसे पाण्डवोंके प्रस्थित होनेके तीसरे दिन उस वनमें लगी दावाग्निमें कुन्ती एवं गान्धारीसहित राजा धृतराष्ट्र दग्ध हो गये॥ १॥ |
| सञ्जयस्तीर्थयात्रायां गतस्त्यक्त्वा महीपतिम्।<br>श्रुत्वा युधिष्ठिरो राजा नारदाद्दुःखमाप्तवान्॥ २ | संजय पहले ही धृतराष्ट्रको छोड़कर तीर्थयात्राके लिये चले गये थे। नारदजीसे यह वृत्तान्त सुनकर राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखी हुए॥ २॥ |
| षट्त्रिंशेऽथ गते वर्षे कौरवाणां क्षयात्पुनः।<br>प्रभासे यादवाः सर्वे विप्रशापात्क्षयं गताः॥ ३<br><br>ते पीत्वा मदिरां मत्ताः कृत्वा युद्धं परस्परम्।<br>क्षयं प्राप्ता महात्मानः पश्यतो रामकृष्णयोः॥ ४ | कौरवोंके विनाशके छत्तीस वर्ष बीतनेपर विप्र-शापके प्रभावसे सभी यादव प्रभासक्षेत्रमें नष्ट हो गये। वे सभी यादव मदिरा पीकर मतवाले हो गये और आपसमें लड़कर बलराम तथा श्रीकृष्णके देखते-देखते मृत्युको प्राप्त हो गये॥ ३-४॥ |
| देहं तत्याज रामस्तु कृष्णः कमललोचनः।<br>व्याधबाणहतः शापं पालयन्भगवान्हरिः॥ ५ | तदनन्तर बलरामजीने योगक्रियाद्वारा शरीरका त्याग किया और कमलके समान नेत्रवाले भगवान् श्रीकृष्णने शापकी मर्यादा रखते हुए एक बहेलियेके बाणसे आहत होकर महाप्रयाण किया॥ ५॥ |
| वसुदेवस्तु तच्छ्रुत्वा देहत्यागं हरेरथ।<br>जहौ प्राणाञ्छुचीन्कृत्वा चित्ते श्रीभुवनेश्वरीम्॥ ६ | इसके पश्चात् जब वसुदेवजीने श्रीकृष्णके शरीर-त्यागका समाचार सुना तो उन्होंने अपने चित्तमें श्रीभुवनेश्वरी देवीका ध्यान करके अपने पवित्र प्राणोंका परित्याग कर दिया॥ ६॥ |
| अर्जुनस्तु ततो गत्वा प्रभासे चातिदुःखितः।<br>संस्कारं तत्र सर्वेषां यथायोग्यं चकार ह॥ ७ | तत्पश्चात् अत्यन्त शोक-संतप्त अर्जुनने प्रभास-क्षेत्रमें पहुँचकर सभीका यथोचित अन्तिम संस्कार सम्पन्न किया॥ ७॥ |
| समीक्ष्याथ हरेर्देहं कृत्वा काष्ठस्य सञ्चयम्।<br>अष्टाभिः सह पत्नीभिर्दहयामास पार्थिवः॥ ८ | भगवान् श्रीकृष्णका शरीर खोजकर और लकड़ी जुटाकर अर्जुनने आठ पटरानियोंके साथ उनका दाह-संस्कार किया॥ ८॥ |