भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 207
१९८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ५

| गता प्रिया मां परिहृत्य कान्ता<br>नान्या वृताहं विधुरोऽस्मि कान्ते।<br>त्वां वीक्ष्य सर्वावयवातिरम्यां<br>मनो हि जातं विवशं मदीयम्॥ २२ | मेरी प्रियतमा मुझे छोड़कर चली गयी है, तबसे मैंने अपना दूसरा विवाह नहीं किया। हे कान्ते! मैं इस समय विधुर हूँ। तुम जैसी सर्वांगसुन्दरीको देखकर मेरा मन अपने वशमें नहीं रह गया है॥ २२॥ | | श्रुत्वामृतास्वादरसं नृपस्य<br>वचोऽतिरम्यं खलु दाशकन्या।<br>उवाच तं सात्त्विकभावयुक्ता<br>कृत्वातिधैर्यं नृपतिं सुगन्धा॥ २३<br>यदात्थ राजन् मयि तत्तथैव<br>मन्येऽहमेतत्तु यथा वचस्ते।<br>नास्मि स्वतन्त्रा त्वमवेहि कामं<br>दाता पिता मेऽर्थय तं त्वमाशु॥ २४ | राजाकी अमृतरसके समान मधुर तथा मनोहारी बात सुनकर वह दाशकन्या सुगन्धा सात्त्विक भावसे युक्त होकर धैर्य धारण करके राजासे बोली—हे राजन्! आपने मुझसे जो कुछ कहा, वह यथार्थ है; किंतु आप अच्छी तरह जान लीजिये कि मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। मेरे पिताजी ही मुझे दे सकते हैं। अतएव आप उन्हींसे मेरे लिये याचना कीजिये॥ २३-२४॥ | | न स्वैरिणीहास्म्यपि दाशपुत्री<br>पितुर्वशेऽहं सततं चरामि।<br>स चेद्ददाति प्रथितः पिता मे<br>गृहाण पाणिं वशगास्मि तेऽहम्॥ २५ | मैं एक निषादकी कन्या होती हुई भी स्वेच्छाचारिणी नहीं हूँ। मैं सदा पिताके वशमें रहती हुई सब काम करती हूँ। यदि मेरे पिताजी मुझे आपको देना स्वीकार कर लें तब आप मेरा पाणिग्रहण कर लीजिये और मैं सदाके लिये आपके अधीन हो जाऊँगी॥ २५॥ | | मनोभवस्त्वां नृप किं दुनोति<br>यथा पुनर्मां नवयौवनां च।<br>दुनोति तत्रापि हि रक्षणीया<br>धृतिः कुलाचारपरम्परासु॥ २६ | हे राजन्! परस्पर आसक्त होनेपर भी कुलकी मर्यादा तथा परम्पराके अनुसार धैर्य धारण करना चाहिये॥ २६॥ | | सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्या नृपतिः काममोहितः।<br>गतो दाशपतेर्गेहं तस्या याचनहेतवे॥ २७ | **सूतजी बोले—**उस सुगन्धाकी यह बात सुनकर कामातुर राजा उसे माँगनेके लिये निषादराजके घर गये॥ २७॥ | | दृष्ट्वा नृपतिमायान्तं दाशोऽतिविस्मयं गतः।<br>प्रणामं नृपतेः कृत्वा कृताञ्जलिरभाषत॥ २८ | इस प्रकार महाराज शन्तनुको अपने घर आया देखकर निषादराजको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर वह बोला—॥ २८॥ | | दाश उवाच<br>दासोऽस्मि तव भूपाल कृतार्थोऽहं तवागमे।<br>आज्ञां देहि महाराज यदर्थमिह चागमः॥ २९ | **निषादने कहा—**हे राजन्! मैं आपका दास हूँ। आपके आगमनसे मैं कृतकृत्य हो गया। हे महाराज! आप जिस कार्यके लिये आये हों, मुझे आज्ञा दीजिये॥ २९॥ | | राजोवाच<br>धर्मपत्नीं करिष्यामि सुतामेतां तवानघ।<br>त्वया चेद्दीयते मह्यं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ ३० | **राजा बोले—**हे अनघ! यदि आप अपनी यह कन्या मुझे प्रदान कर दें तो मैं इसे अपनी धर्मपत्नी बना लूँगा; यह मैं सत्य कह रहा हूँ॥ ३०॥ | | दाश उवाच<br>कन्यारत्नं मदीयं चेद्यत्त्वं प्रार्थयसे नृप।<br>दातव्यं तु प्रदास्यामि न त्वदेयं कदाचन॥ ३१<br>तस्याः पुत्रो महाराज त्वदन्ते पृथिवीपतिः।<br>सर्वथा चाभिषेक्तव्यो नान्यः पुत्रस्तवेति वै॥ ३२ | **निषादने कहा—**हे महाराज! यदि आप मेरे इस कन्यारत्नके लिये प्रार्थना कर रहे हैं तो मैं अवश्य दूँगा; क्योंकि देनेयोग्य वस्तु तो कभी अदेय नहीं होती है; किंतु हे महाराज! आपके बाद इस कन्याका पुत्र ही राजाके रूपमें अभिषिक्त होना चाहिये, आपका दूसरा पुत्र नहीं॥ ३१-३२॥ |