भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

अ० ५] द्वितीय स्कन्ध १९७

तदद्भुतं रूपमतीव सुन्दरं<br>तथैव गन्धोऽखिललोकसम्मतः।<br>वयश्च तादृङ् नवयौवनं शुभं<br>दृष्ट्वैव राजा किल विस्मितोऽभवत्॥१३उसका अद्भुत एवं अतिशय सुन्दर रूप, सब प्राणियोंका मन स्वाभाविक रूपसे अपनी ओर आकर्षित करनेवाली सुगन्धि, उसकी अवस्था तथा उसका वैसा शुभ नवयौवन देखकर राजा शान्तनुको महान् विस्मय हुआ॥१३॥
केयं कुतो वा समुपागताधुना<br>देवाङ्गना वा किमु मानुषी वा।<br>गन्धर्वपुत्री किल नागकन्या<br>जाने कथं गन्धवतीं नु कामिनीम्॥१४यह कौन है और इस समय यह कहाँसे आयी है? यह कोई देवांगना है या मानवी स्त्री, यह कोई गन्धर्वकन्या अथवा नागकन्या है? मैं इस सुगन्धा कामिनीके विषयमें कैसे जानकारी प्राप्त करूँ?॥१४॥
सञ्चिन्त्य चैवं मनसा नृपोऽसौ<br>न निश्चयं प्राप यदा ततः स्वयम्।<br>गङ्गां स्मरन्कामवशं गतोऽथ<br>पप्रच्छ कान्तां तटसंस्थितां च॥१५<br>कासि प्रिये कस्य सुतासि कस्मा-<br>दिह स्थिता त्वं विजने वरोरु।<br>एकाकिनी किं वद चारुनेत्रे<br>विवाहिता वा न विवाहितासि॥१६इस प्रकार विचार करके भी वे राजा जब कुछ निश्चय नहीं कर सके, तब तत्क्षण गंगाजीका स्मरण करते हुए वे कामके वशीभूत हो गये और तटपर बैठी हुई उस सुन्दरीसे उन्होंने पूछा—हे प्रिये! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? हे वरोरु! तुम इस निर्जन वनमें क्यों बैठी हो? हे सुनयने! क्या तुम अकेली ही हो? तुम विवाहिता हो या कुमारी; यह बताओ॥१५-१६॥
सञ्जातकामोऽहमरालनेत्रे<br>त्वां वीक्ष्य कान्तां च मनोरमां च।<br>ब्रूहि प्रिये यासि चिकीर्षसि त्वं<br>किं चेति सर्वं मम विस्तरेण॥१७हे अरालनेत्रे! तुम जैसी मनोरमा स्त्रीको देखकर मैं कामातुर हो गया हूँ। हे प्रिये! विस्तारपूर्वक मुझे यह बतलाओ कि तुम कौन हो और क्या करना चाहती हो?॥१७॥
इत्येवमुक्ता सुदती नृपेण<br>प्रोवाच तं सस्मितमम्बुजेक्षणा।<br>दाशस्य पुत्रीं त्वमवेहि राजन्<br>कन्यां पितुः शासनसंस्थितां च॥१८महाराज शान्तनुके वचन सुनकर वह सुन्दर दाँतोंवाली तथा कमलके समान नयनोंवाली स्त्री मुसकराकर बोली—हे राजन्! आप मुझे निषादकन्या और अपने पिताकी आज्ञामें रहनेवाली कन्या समझें॥१८॥
तरीमिमां धर्मनिमित्तमेव<br>संवाहयामीह जले नृपेन्द्र।<br>पिता गृहे मेऽद्य गतोऽस्ति कामं<br>सत्यं ब्रवीम्यर्थपते तवाग्रे॥१९हे नृपेन्द्र! मैं अपने धर्मका अनुसरण करती हुई जलमें यह नौका चलाती हूँ। हे अर्थपते! पिताजी अभी ही घर गये हैं। आपके सम्मुख यह बातें मैंने सत्य कही हैं॥१९॥
इत्येवमुक्त्वा विरराम बाला<br>कामातुरस्तां नृपतिर्बभाषे।<br>कुरुप्रवीरं कुरु मां पतिं त्वं<br>वृथा न गच्छेन्ननु यौवनं ते॥२०यह कहकर वह निषादकन्या मौन हो गयी। तब कामसे पीड़ित महाराज शान्तनुने उससे कहा—मुझ कुरुवंशी वीरको तुम अपना पति बना लो, जिससे तुम्हारा यौवन व्यर्थ न जाय॥२०॥
न चास्ति पत्नी मम वै द्वितीया<br>त्वं धर्मपत्नी भव मे मृगाक्षि।<br>दासोऽस्मि तेऽहं वशगः सदैव<br>मनोभवस्तापयति प्रिये माम्॥२१मेरी कोई दूसरी पत्नी नहीं है। अतः हे मृगनयनी! तुम मेरी धर्मपत्नी बन जाओ। हे प्रिये! मैं सर्वदाके लिये तुम्हारा वशवर्ती दास बन जाऊँगा। मुझे कामदेव पीड़ित कर रहा है॥२१॥