भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

| १९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |

| माता व्यासस्य धर्मज्ञ नाम्ना सत्यवती सती।<br>कथं शन्तनुना प्राप्ता भार्या गन्धवती शुभा॥ २<br>तन्ममाचक्ष्व विस्तारं दाशपुत्री कथं वृता।<br>राज्ञा धर्मवरिष्ठेन संशयं छिन्धि सुव्रत॥ ३ | नामकी साध्वी माता जो पवित्र गन्धवाली थीं, वे राजा शन्तनुको पत्नीरूपसे कैसे प्राप्त हुईं? यह हमें विस्तारके साथ बताइये। महान् धर्मनिष्ठ राजा शन्तनुने निषादपुत्रीके साथ विवाह क्यों किया? हे सुव्रत! यह बताकर आप हमारे सन्देहका निवारण कीजिये॥ १-३॥ | | सूत उवाच<br>शन्तनुर्नाम राजर्षिर्मृगयानिरतः सदा।<br>वनं जगाम निघ्नन्वौ मृगांश्च महिषान् रुरून्॥ ४ | सूतजी बोले— राजर्षि शन्तनु सदा आखेट करनेमें तत्पर रहते थे। वे वनमें जाकर मृग, महिष तथा रुरुमृगोंका वध किया करते थे॥ ४॥ | | चत्वार्येव तु वर्षाणि पुत्रेण सह भूपतिः।<br>रममाणः सुखं प्राप कुमारेण यथा हरः॥ ५ | राजा शन्तनु केवल चार वर्षतक भीष्मके साथ उसी प्रकार सुखसे रहे, जिस प्रकार भगवान् शंकर कार्तिकेयके साथ आनन्दपूर्वक रहते थे॥ ५॥ | | एकदा विक्षिपन्बाणान्विनिघ्नन्खड्गसूकरान्।<br>स कदाचिद्वनं प्राप्तः कालिन्दीं सरितां वराम्॥ ६ | एक बार वे महाराज शन्तनु वनमें बाण छोड़ते हुए बहुतसे गैंडों तथा सूकरोंका वध करते हुए किसी समय नदियोंमें श्रेष्ठ यमुनाके किनारे जा पहुँचे॥ ६॥ | | महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद् गन्धमुत्तमम्।<br>तस्य प्रभवमन्विच्छन्सञ्चचार वनं तदा॥ ७ | राजाने वहाँपर कहींसे आती हुई उत्तम गन्धको सूँघा। तब उस सुगन्धिके उद्गमका पता लगानेके लिये वे वनमें विचरने लगे॥ ७॥ | | न मन्दारस्य गन्धोऽयं मृगनाभिमदस्य न।<br>चम्पकस्य न मालत्या न केतक्या मनोहरः॥ ८ | वे बड़े असमंजसमें पड़ गये कि यह मनोहर सुगन्धि न मन्दारपुष्पकी है, न कस्तूरीकी है, न मालतीकी है, न चम्पाकी है और न तो केतकीकी ही है!॥ ८॥ | | न चानुभूतपूर्वोऽयं वाति गन्धवहः शुभः।<br>कुतोऽयमेति वायुर्वै मम घ्राणविमोहनः॥ ९ | मैंने ऐसी अनुपम सुगन्धिका पूर्वमें कभी नहीं अनुभव किया था। [इस दिव्य सुगन्धिको लेकर] सुन्दर वायु बह रही है। मेरी घ्राणेन्द्रियको मुग्ध कर देनेवाली यह वायु कहाँसे आ रही है?॥ ९॥ | | इति सञ्चिन्त्यमानोऽसौ बभ्राम वनमण्डलम्।<br>मोहितो गन्धलोभेन शन्तनुः पवनानुगः॥ १० | इस प्रकार सोचते-विचारते राजा शन्तनु गन्धके लोभसे मोहित सुगन्धित वायुका अनुसरण करते हुए वनप्रदेशमें विचरण करने लगे॥ १०॥ | | स ददर्श नदीतीरे संस्थितां चारुदर्शनाम्।<br>शृङ्गाररहितां कान्तां सुस्थितां मलिनाम्बराम्॥ ११ | उन्होंने यमुनानदीके तटपर बैठी हुई एक दिव्यदर्शनवाली स्त्रीको देखा, जो मलिन वस्त्र धारण करने और शृंगार न करनेपर भी मनोहर दीख रही थी॥ ११॥ | | दृष्ट्वा तामसितापाङ्गीं विस्मितः स महीपतिः।<br>अस्या देहस्य गन्धोऽयमिति सञ्जातनिश्चयः॥ १२ | उस श्याम नयनोंवाली स्त्रीको देखकर राजा आश्चर्यमें पड़ गये और उन्हें इस बातका विश्वास हो गया कि यह सुगन्धि इसी स्त्रीके शरीरकी है॥ १२॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 7 D