भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 208

अ० ५ ] द्वितीय स्कन्ध १९९

सूत उवाचसूतजी बोले—
श्रुत्वा वाक्यं तु दाशस्य राजा चिन्तातुरोऽभवत्।<br>गाङ्गेयं मनसा कृत्वा नोवाच नृपतिस्तदा॥ ३३निषादकी बात सुनकर राजा शन्तनु चिन्तित हो उठे। उस समय मनमें भीष्मका स्मरण करके राजा कुछ भी उत्तर न दे सके॥ ३३॥
कामातुरो गृहं प्राप्तश्चिन्ताविष्टो महीपतिः।<br>न सस्नौ बुभुजे नाथ न सुष्वाप गृहं गतः॥ ३४तब कामातुर तथा चिन्तित राजा राजमहलमें चले गये। उन्होंने घर जानेपर न स्नान किया, न भोजन किया और न शयन ही किया॥ ३४॥
चिन्तातुरं तु तं दृष्ट्वा पुत्रो देवव्रतस्तदा।<br>गत्वापृच्छन्महीपालं तदसन्तोषकारणम्॥ ३५<br>दुर्जयः कोऽस्ति शत्रुस्ते करोमि वशगं तव।<br>का चिन्ता नृपशार्दूल सत्यं वद नृपोत्तम॥ ३६तब उन्हें चिन्तित देखकर पुत्र देवव्रत राजाके पास जाकर उनकी इस चिन्ताका कारण पूछने लगे—हे नृपश्रेष्ठ! कौन-सा ऐसा शत्रु है जिसको आप जीत न सके; मैं उसे आपके अधीन कर दूँ। हे नृपोत्तम! आपकी क्या चिन्ता है, मुझे सही-सही बताइये॥ ३५-३६॥
किं तेन जातेन सुतेन राजन्<br>दुःखं न जानाति न नाशयेद्यः।<br>ऋणं ग्रहीतुं समुपागतोऽसौ<br>प्राग्जन्मजं नात्र विचारणास्ति॥ ३७हे राजन्! भला उस उत्पन्न हुए पुत्रसे क्या लाभ? जो पैदा होकर अपने पिताका दुःख न समझे तथा उसको दूर करनेका उपाय न कर सके। ऐसा कुपुत्र तो पूर्वजन्मके किसी ऋणको वापस लेनेके लिये यहाँ आता है; इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है॥ ३७॥
विमुच्य राज्यं रघुनन्दनोऽपि<br>ताताज्ञया दाशरथिस्तु रामः।<br>वनं गतो लक्ष्मणजानकीभ्यां<br>सहैव शैलं किल चित्रकूटम्॥ ३८दशरथके पुत्र रामचन्द्रजी भी पिताकी आज्ञासे राज्य त्यागकर लक्ष्मण और सीताके साथ वनमें चले गये तथा चित्रकूटपर्वतपर निवास करने लगे॥ ३८॥
सुतो हरिश्चन्द्रनृपस्य राजन्<br>यो रोहितश्चेति प्रसिद्धनामा।<br>क्रीतोऽथ पित्रा विपणोद्यतश्च<br>दासार्पितो विप्रगृहे तु नूनम्॥ ३९इसी प्रकार हे राजन्! राजा हरिश्चन्द्रका पुत्र जो रोहित नामसे प्रसिद्ध था, अपने पिताके इच्छानुसार बिकनेके लिये तत्पर हो गया और खरीदा हुआ वह बालक ब्राह्मणके घरमें सेवकका कार्य करने लगा॥ ३९॥
तथाजिगर्तस्य सुतो वरिष्ठो<br>नाम्ना शुनःशेप इति प्रसिद्धः।<br>क्रीतस्तु पित्राप्यथ यूपबद्धः<br>सम्मोचितो गाधिसुतेन पश्चात्॥ ४०'अजीगर्त' ब्राह्मणका एक श्रेष्ठ पुत्र था, जो शुनःशेप नामसे प्रसिद्ध था। खरीद लिये जानेपर वह पिताके द्वारा यूपमें बाँध दिया गया, जिसे बादमें विश्वामित्रने छुड़ाया था॥ ४०॥
पित्राज्ञया जामदग्न्येन पूर्वं<br>छिन्नं शिरो मातुरिति प्रसिद्धम्।<br>अकार्यमप्याचरितं च तेन<br>गुरोरनुज्ञा च गरीयसी कृता॥ ४१पूर्वकालमें पिताकी आज्ञासे ही परशुरामने अपनी माताका सिर काट दिया था, ऐसा लोकमें प्रसिद्ध है। इस अनुचित कर्मको करके भी उन्होंने पिताकी आज्ञाका महत्त्व बढ़ाया था॥ ४१॥
इदं शरीरं तव भूपते न<br>क्षमोऽस्मि नूनं वद किं करोम्यहम्।<br>न शोचनीयं मयि वर्तमाने-<br>ऽप्यसाध्यमर्थं प्रतिपादयाम्यदः॥ ४२हे पृथ्वीपते! यह मेरा शरीर आपका ही है। यद्यपि मैं समर्थ नहीं हूँ; फिर भी आप कहिये मैं आपकी क्या सेवा करूँ? मेरे रहते आपको किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं होनी चाहिये। मैं आपका असाध्य कार्य भी तत्काल पूरा करूँगा॥ ४२॥