भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

| २०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
प्रब्रूहि राजंस्तव कास्ति चिन्ता निवारयाम्यद्य धनुर्गृहीत्वा।<br>देहेन मे चेच्चरितार्थता वा भवत्वमोघा भवतश्चिकीर्षा॥ ४३<br>धिक् तं सुतं यः पितुरीप्सितार्थं क्षमोऽपि सन् प्रतिपादयेन्न।<br>जातेन किं तेन सुतेन कामं पितुर्न चिन्तां हि समुद्धरेद्यः॥ ४४हे राजन्! आप बताइये कि आपको किस बातकी चिन्ता है? मैं अभी धनुष लेकर उसका निवारण कर दूँगा। यदि मेरे इस शरीरसे भी आपका कार्य सिद्ध हो सके तो मैं आपकी अभिलाषा पूर्ण करनेको तत्पर हूँ। उस पुत्रको धिक्कार है, जो समर्थ होकर भी अपने पिताकी इच्छाको पूर्ण नहीं करता। जिस पुत्रके द्वारा पिताकी चिन्ता दूर न हुई, उस पुत्रका जन्म लेनेका क्या प्रयोजन ?॥ ४३-४४॥
सूत उवाच<br>निशम्येति वचस्तस्य पुत्रस्य शन्तनुर्नृपः।<br>लज्जमानस्तु मनसा तमाह त्वरितं सुतम्॥ ४५सूतजी बोले—अपने पुत्र गांगेयका वचन सुनकर महाराज शन्तनु मनमें लज्जित होते हुए उससे शीघ्र ही कहने लगे॥ ४५॥
राजोवाच<br>चिन्ता मे महती पुत्र यस्त्वमेकोऽसि मे सुतः।<br>शूरोऽतिबलवान्मानी संग्रामेष्वपराङ्मुखः॥ ४६<br>एकापत्यस्य मे तात वृथेदं जीवितं किल।<br>मृते त्वयि मृधे क्वापि किं करोमि निराश्रयः॥ ४७<br>एषा मे महती चिन्ता तेनाद्य दुःखितोऽस्म्यहम्।<br>नान्या चिन्तास्ति मे पुत्र यां तवाग्रे वदाम्यहम्॥ ४८राजा बोले—हे पुत्र! मुझे यही महान् चिन्ता है कि तुम मेरे इकलौते पुत्र हो। यद्यपि तुम बलवान्, स्वाभिमानी, रणस्थलमें पीठ न दिखानेवाले साहसी पुत्र हो तथापि केवल एक पुत्र होनेके कारण मुझ पिताका जीवन व्यर्थ है; क्योंकि यदि कहीं किसी समरमें तुम्हें अमरगति प्राप्त हो गयी तो मैं असहाय होकर क्या कर सकूँगा ? यही मुझे सबसे बड़ी चिन्ता लगी है; इसी कारण मैं आजकल दुःखित रहता हूँ। हे पुत्र! इसके अतिरिक्त मुझे दूसरी कोई चिन्ता नहीं है, जिसे मैं तुम्हारे सामने कहूँ॥ ४६-४८॥
सूत उवाच<br>तदाकर्ण्याथ गाङ्गेयो मन्त्रिवृद्धानपृच्छत।<br>न मां वदति भूपालो लज्जयाद्य परिप्लुतः॥ ४९सूतजी बोले—यह सुनकर गांगेयने वृद्ध मन्त्रियोंसे पूछा कि लज्जासे परिपूर्ण महाराज मुझे कुछ बता नहीं रहे हैं॥ ४९॥
वित्त वार्तां नृपस्याद्य पृष्ट्वा यूयं विनिश्चयात्।<br>सत्यं ब्रुवन्तु मां सर्वं तत्करोमि निराकुलः॥ ५०आपलोग राजाकी भावना जानकर सही एवं निश्चित कारण मुझे बताइये; मैं प्रसन्नतापूर्वक उसे सम्पन्न करूँगा॥ ५०॥
तच्छ्रुत्वा ते नृपं गत्वा संविज्ञाय च कारणम्।<br>शशंसुर्विदितार्थैस्तु गाङ्गेयस्तदचिन्तयत्॥ ५१<br>सहितस्तैर्जगामाशु दाशस्य सदनं तदा।<br>प्रेमपूर्वमुवाचेदं विनम्रो जाह्नवीसुतः॥ ५२यह सुनकर मन्त्रिगण राजाके पास गये और सब कारण सही-सही जानकर उन्होंने युवराज गांगेयसे आकर कह दिया। तब उनका अभिप्राय जानकर गांगेय विचार करने लगे। मन्त्रियोंके साथ गंगापुत्र देवव्रत उस निषादके घर शीघ्र गये और प्रेमके साथ विनम्र होकर यह कहने लगे॥ ५१-५२॥
गाङ्गेय उवाच<br>पित्रे देहि सुतां तेऽद्य प्रार्थयामि सुमध्यमाम्।<br>माता मेऽस्तु सुतेयं ते दासोऽस्म्यस्याः परन्तप॥ ५३गांगेय बोले—हे परन्तप! आप अपनी सुन्दरी कन्या मेरे पिताजीके लिये प्रदान कर दें—यही मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। आपकी ये कन्या मेरी माता हों और मैं इनका सेवक रहूँगा॥ ५३॥